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2 घंटे पहले
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पाकिस्तान में बगावत की नई लहर
पाकिस्तान इस समय एक गहरे संकट और अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों से उठ रही आजादी की मांग और विरोध प्रदर्शनों ने सरकार की नींद उड़ा दी है। PoK यानी पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर और बलूचिस्तान के अशांत इलाकों में मचे कोहराम के बाद, अब अशांति की आग उस शहर तक पहुंच गई है जो पाकिस्तानी सत्ता का असली केंद्र माना जाता है। यह शहर कोई और नहीं बल्कि रावलपिंडी है, जहां पाकिस्तानी सेना का मुख्यालय स्थित है। यहां की बिगड़ती स्थिति को देखते हुए, पाकिस्तानी सत्ता के गलियारों में हड़कंप मचा हुआ है और सेना प्रमुख आसिम मुनीर के लिए अपनी कुर्सी बचाना मुश्किल होता दिख रहा है।
रावलपिंडी में अनुच्छेद 245 का साया
पाकिस्तान के गृह मंत्रालय ने हाल ही में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और चौंकाने वाला सरकारी आदेश जारी किया है। इस आदेश के माध्यम से देश के सबसे संवेदनशील सैन्य केंद्र रावलपिंडी में संविधान के अनुच्छेद 245 को लागू कर दिया गया है। इसका सीधा सा अर्थ है कि अब रावलपिंडी की सड़कों पर कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी सीधे तौर पर सेना के हाथों में होगी। आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, इस पूरे क्षेत्र में आगामी 6 महीनों तक पाकिस्तानी सेना के 400 से अधिक हथियारबंद जवान तैनात रहेंगे। यह तैनाती किसी सामान्य सुरक्षा अभ्यास का हिस्सा नहीं है, बल्कि देश में संभावित तख्तापलट या बड़े पैमाने पर होने वाले गृहयुद्ध के डर का संकेत है।
आसिम मुनीर के गढ़ में सुरक्षा का घेरा
रावलपिंडी वही शहर है जहां पाकिस्तान का जनरल हेडक्वार्टर (GHQ) स्थित है। यहां भारी संख्या में सेना की तैनाती से यह स्पष्ट होता है कि सेनाध्यक्ष आसिम मुनीर और वर्तमान सरकार स्वयं को असुरक्षित महसूस कर रही है। सरकार ने सेना की 3 पूरी कंपनियां तैनात करने का फैसला किया है। आमतौर पर सेना की एक कंपनी में 100 से 150 सैनिक होते हैं, जिसके अनुसार रावलपिंडी की सड़कों पर लगभग 300 से 450 पूरी तरह से लैस और खतरनाक हथियारों से लैस सैनिक पहरा देंगे। सरकारी तंत्र भले ही इसे सामान्य कानून व्यवस्था का हिस्सा बता रहा हो, लेकिन हकीकत यह है कि सेना प्रमुख का अपना ही किला अब उनके नियंत्रण से बाहर जाता हुआ दिखाई दे रहा है। वे अब खुद को सुरक्षित रखने के लिए बंकरों और सैन्य घेरे का सहारा ले रहे हैं।
अनुच्छेद 245 क्यों लागू करना पड़ा?
पाकिस्तान का संविधान अनुच्छेद 245 के तहत सरकार को यह विशेष अधिकार देता है कि वह किसी नागरिक विद्रोह, दंगे या आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए सेना को सीधे नागरिक क्षेत्रों में तैनात कर सकती है। हालांकि, जब बात रावलपिंडी जैसे शहर की आती है, तो यह कदम बेहद गंभीर माना जाता है। पंजाब सरकार के गृह विभाग के अनुरोध पर जारी इस आदेश से यह साफ हो गया है कि रावलपिंडी की स्थानीय पुलिस और पैराम पुलिस और रेंजर्स अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह विफल साबित हुए हैं। अब यह शहर अगले 6 महीने के लिए एक बड़ी छावनी में तब्दील हो जाएगा, जहां हर गली में बंदूकधारी जवान नजर आएंगे।
400 जवानों की तैनाती के पीछे तीन मुख्य कारण
भले ही सरकारी फाइलों में इसे सुरक्षात्मक उपाय बताया गया हो, लेकिन विश्लेषक इसके पीछे तीन मुख्य और डरावने कारणों की ओर इशारा कर रहे हैं:
- अदियाला जेल और इमरान खान का प्रभाव: रावलपिंडी की अदियाला जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की लोकप्रियता कम होने के बजाय दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। उनकी पार्टी पीटीआई के कार्यकर्ता और समर्थक रावलपिंडी और इस्लामाबाद में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों की तैयारी में जुटे हैं। प्रशासन को यह डर सता रहा है कि प्रदर्शनकारी अदियाला जेल या सीधे सैन्य मुख्यालय पर धावा बोल सकते हैं।
- आसिम मुनीर के प्रति जनता का आक्रोश: नए डिफेंस एक्ट के जरिए जनरल आसिम मुनीर ने अपने पास जो असीमित अधिकार केंद्रित किए हैं, उसने पाकिस्तानी जनता के बीच भारी नाराजगी पैदा कर दी है। महंगाई, बदहाल अर्थव्यवस्था और सेना की तानाशाही के खिलाफ आम नागरिक ज्वालामुखी की तरह फट रहे हैं।
- सैन्य बगावत का खतरा: राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि इमरान खान का समर्थन केवल जनता तक सीमित नहीं है, बल्कि सेना के भीतर भी निचले स्तर के अधिकारी और जवान भी उनसे प्रभावित हो सकते हैं। आसिम मुनीर को शायद बाहरी खतरों से ज्यादा सेना के भीतर किसी संभावित आंतरिक बगावत का डर है, जिसे कुचलने के लिए वे इतने कड़े सुरक्षा इंतजाम कर रहे हैं।
लोकतंत्र के मुखौटे में मार्शल लॉ
अगले 6 महीनों के लिए रावलपिंडी को पूरी तरह से सैन्य पहरे में रखने का फैसला यह साबित करता है कि शहबाज शरीफ की सरकार केवल कागजों पर मौजूद है। जमीनी स्तर पर अब रावलपिंडी की बागडोर सीधे उन सैन्य आकाओं के पास चली गई है, जो बंकरों में बैठकर देश चला रहे हैं। विपक्षी दलों और मानवाधिकार संगठनों ने इस कदम की कड़ी आलोचना करते हुए इसे लोकतंत्र की हत्या बताया है। उनका तर्क है कि पाकिस्तान धीरे-धीरे पूरी तरह से मार्शल लॉ की ओर बढ़ रहा है, जहां सेना की बंदूक ही कानून है। इस स्थिति ने स्पष्ट कर दिया है कि पाकिस्तान में सत्ता का गलियारा अब बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रहा है।
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