शंघाई सहयोग संगठन के मंच पर पानी के लिए गिड़गिड़ाया पाकिस्तान, शी जिनपिंग के सामने भारत ने दिखाया सख्त रुख विश्व एक दिन पहले 12
शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन के दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सिंधु जल संधि का मुद्दा उठाकर अंतरराष्ट्रीय समर्थन बटोरने की कोशिश की, लेकिन भारत ने अपने कड़े रुख में कोई बदलाव नहीं किया है।

शंघाई सहयोग संगठन में शहबाज शरीफ की हताशा

भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल बंटवारे को लेकर चल रहा विवाद अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी पूरी तरह हावी दिखाई दे रहा है। शंघाई सहयोग संगठन यानी SCO के हालिया शिखर सम्मेलन के दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सिंधु जल संधि के मुद्दे को उठाकर दुनिया के सामने अपना दुखड़ा रोने की कोशिश की। दिलचस्प बात यह है कि इस दौरान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी वहां मौजूद थे और पाकिस्तान की इस गुहार को सुन रहे थे। हालांकि, भारत ने अपनी नीति और रुख में रत्ती भर भी नरमी नहीं दिखाई और पाकिस्तान की कोशिशें एक बार फिर बेअसर साबित हुईं।

पानी को राजनीतिक हथियार नहीं बनाने की अपील

अपने संबोधन के दौरान शहबाज शरीफ ने पानी को किसी भी क्षेत्र की लाइफलाइन बताते हुए अजीबोगरीब दलील दी। उन्होंने कहा कि साझा जल संसाधनों को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समझौतों के सम्मान की बात करते हुए कहा कि समझौतों का पालन उनकी भावना और शब्दों के अनुरूप होना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि शहबाज शरीफ का यह बयान सीधे तौर पर भारत द्वारा सिंधु के पानी पर लगाए गए कड़े प्रतिबंधों की प्रतिक्रिया है। पाकिस्तान ने 1960 की सिंधु जल संधि का हवाला देकर दुनिया को यह दिखाने की कोशिश की कि वह संधि का पालन कर रहा है, जबकि भारत ने इस पर पूरी तरह से चुप्पी साध ली है।

ट्रिब्यूनल को भारत की दो टूक

सिंधु जल संधि के विवाद को लेकर हेग स्थित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने एक आदेश दिया था, जिसे पाकिस्तान अपनी कूटनीतिक जीत बताने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान का कहना है कि यह ट्रिब्यूनल संधि के तहत विवादों को सुलझाने में सक्षम है। लेकिन भारत ने इस पूरे ट्रिब्यूनल और उसकी कार्यवाही को ही सिरे से खारिज कर दिया है। भारत का आधिकारिक स्टैंड बिल्कुल स्पष्ट है कि यह ट्रिब्यूनल अवैध रूप से बनाया गया है और इसका भारत के किसी भी हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट या फैसले पर कोई अधिकार नहीं है। भारत ने यह साफ कर दिया है कि वह ऐसे किसी भी आदेश को मानने के लिए बाध्य नहीं है जिसे उसने खुद मान्यता नहीं दी है।

भारत ने क्यों उठाया यह सख्त कदम

सिंधु के पानी को लेकर भारत का यह रुख अचानक नहीं बदला है।अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए भयावह आतंकी हमले में 26 मासूम लोगों की जान गई थी। इस घटना के बाद से भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ अपनी कूटनीतिक और रणनीतिक नीति में बड़ा बदलाव किया। सिंधु के पानी को रोकना इसी कड़ी का एक हिस्सा है। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक पाकिस्तान अपनी सरजमीं से पनप रहे आतंकवाद और आतंकी नेटवर्क के खिलाफ ठोस और भरोसेमंद कार्रवाई नहीं करता, तब तक पानी के मोर्चे पर कोई ढील नहीं दी जाएगी।

पीएम मोदी का आतंकवाद पर कड़ा प्रहार

शहबाज शरीफ द्वारा पानी का मुद्दा उठाने से ठीक एक दिन पहले, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने SCO के मंच पर आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक रुख को और कड़ा करने का आह्वान किया था। पीएम मोदी ने बिना किसी लाग लपेट के पहलगाम हमले का जिक्र किया और पाकिस्तान को उसकी असलियत दिखाई। उन्होंने दुनिया को संबोधित करते हुए कहा कि आतंकवाद के पूरे नेटवर्क, जिसमें इसकी फंडिंग, युवाओं की भर्ती, कट्टरपंथ का प्रचार और आतंकियों को सुरक्षित पनाहगाह देना शामिल है, के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई होनी चाहिए।

कूटनीतिक दबाव और पाकिस्तान की विफलता

शहबाज शरीफ का चीन और रूस जैसे देशों की मौजूदगी में पानी के मुद्दे को उठाना यह दर्शाता है कि पाकिस्तान इस समय कूटनीतिक रूप से कितना अकेला पड़ चुका है। सिंधु जल संधि उसके लिए केवल पानी का स्रोत नहीं बल्कि अस्तित्व की लड़ाई बन चुकी है। वहीं, भारत का इस पर अटल रहना यह साबित करता है कि अब 'आतंक और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते' की नीति पर नई दिल्ली पूरी तरह से कायम है। पाकिस्तान की बार-बार अंतरराष्ट्रीय मदद मांगने की कोशिशें भारत के इस दृढ़ संकल्प के आगे नाकाम साबित हो रही हैं।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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