पाकिस्तान का दोहरा चेहरा: 125 साल पुराने गुरुद्वारे को ढहाकर तोड़ा धार्मिक भावनाओं का भरोसा विश्व 2 घंटे पहले 3
पाकिस्तान में एक ओर ऐतिहासिक हिंदू नामों को बहाल करने का ढोंग रचा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर 125 साल पुराने गुरुद्वारा सिंह सभा को जमींदोज कर दिया गया है।

पाकिस्तान की सच्चाई आई सामने

पाकिस्तान हमेशा से अपनी छवि को सुधारने के लिए दुनिया के सामने बड़े-बड़े दावे करता रहा है। हाल ही में वहां के प्रशासन ने पुराने हिंदू और सिख विरासत से जुड़े स्थानों के नामों को फिर से बहाल करने की पहल शुरू की थी। इस दौरान कई गलियों और चौराहों के नाम बदलकर उन्हें पुराना स्वरूप देने का नाटक किया गया, जिसे सरकार ने सांस्कृतिक विरासत का सम्मान बताया। लेकिन, अब जो खबर सामने आई है उसने पाकिस्तान के इन दावों की पोल खोल दी है। पाकिस्तान के फारूकाबाद क्षेत्र में स्थित करीब 125 साल पुराने गुरुद्वारा सिंह सभा को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया गया है। यह गुरुद्वारा न केवल एक ऐतिहासिक इमारत था, बल्कि सिख समुदाय के लिए एक पवित्र और महत्वपूर्ण धार्मिक धरोहर भी माना जाता था।

गुरुद्वारे के विध्वंस की दर्दनाक कहानी

प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह ऐतिहासिक गुरुद्वारा सच्चा सौदा के बेहद करीब स्थित था। सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही तस्वीरों और वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि इस धार्मिक स्थल को किस तरह से निशाना बनाया गया। विध्वंस की इस प्रक्रिया में सबसे पहले गुरुद्वारे के पवित्र गुंबद को हटाया गया और बाद में पूरी इमारत को मलबे में बदल दिया गया। स्थानीय निवासियों का कहना है कि उन्होंने इस संवेदनशील मामले के बारे में संबंधित अधिकारियों को पहले ही सचेत किया था, लेकिन प्रशासन ने इस पर पूरी तरह से चुप्पी साधे रखी और कोई कार्रवाई नहीं की गई।

पुलिस की मौजूदगी में श्रद्धालुओं के साथ अन्याय

घटना की जानकारी मिलने के बाद पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी यानी PSGPC और आसपास के इलाकों में रहने वाले सिख श्रद्धालुओं का एक बड़ा समूह मौके पर पहुंचा। वहां मौजूद लोगों ने गुरुद्वारे को बचाने की पुरजोर कोशिश की। हालांकि, स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारी पुलिस बल की तैनाती के बावजूद इन श्रद्धालुओं को गुरुद्वारे के परिसर के भीतर कदम तक रखने की अनुमति नहीं दी गई। लाचार होकर सिख समुदाय के लोगों ने गुरुद्वारे के बाहर ही अरदास की और अपनी पीड़ा व विरोध दर्ज कराया। अभी तक इस पूरे विध्वंस कांड पर पाकिस्तान सरकार की ओर से कोई भी आधिकारिक प्रतिक्रिया या स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया है, जो उनकी मंशा पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करता है।

प्रतीकात्मक कदमों का क्या फायदा?

जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान की सरकार का हिंदू और सिख नामों को वापस लाने का कदम केवल एक प्रतीकात्मक ड्रामा है। यदि इन ऐतिहासिक स्थलों के नाम बदलकर उन्हें सांस्कृतिक रूप दिया भी जा रहा है, तो उनकी सुरक्षा सुनिश्चित न कर पाना उस ढोंग को बेनकाब करता है। अगर अल्पसंख्यक समुदायों की धार्मिक धरोहरें ही सुरक्षित नहीं हैं, तो ऐसे दिखावटी बदलावों का कोई अर्थ नहीं रह जाता। सोशल मीडिया पर भी जनता में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है। लोग अब मांग कर रहे हैं कि जो लोग इस विध्वंस के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए और पाकिस्तान में मौजूद अन्य सभी अल्पसंख्यकों की धरोहरों की रक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाएं।

भारत को नसीहत देने का दिखावा

यह घटना एक और महत्वपूर्ण पहलू की ओर इशारा करती है। पाकिस्तान के पूर्व राजनयिक अब्दुल बासित ने हाल ही में भारत के आंतरिक मामलों में दखल देते हुए विवादित बयान दिया था। उन्होंने भारतीय हिंदुओं को उन मस्जिदों पर अपना दावा न करने की नसीहत दी थी, जो कभी मंदिर हुआ करते थे। उन्होंने इसे नफरत फैलाने वाला कदम करार दिया था। अब सवाल यह उठता है कि क्या पाकिस्तान को खुद अपने गिरेबान में नहीं झांकना चाहिए? जहां एक तरफ वे भारत को धार्मिक सद्भाव के नाम पर ज्ञान देते हैं, वहीं दूसरी तरफ उनकी अपनी सरजमीं पर सिखों के पवित्र पूजा स्थलों को गिराया जा रहा है। दुनिया देख रही है कि पाकिस्तान के कथनी और करनी में कितना बड़ा अंतर है।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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