30 जून: विमानन इतिहास के वो 6 काले दिन, जिन्होंने बदल दी दुनिया की सुरक्षा नीतियां राष्ट्रीय राजनीति 2 महीने पहले 37
विमानन के इतिहास में 30 जून की तारीख बेहद दर्दनाक है, क्योंकि इस दिन हुए 6 बड़े हादसों ने एविएशन सेफ्टी को नए सिरे से परिभाषित करने के लिए मजबूर कर दिया। इन दुर्घटनाओं के बाद ही आज का आधुनिक एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम अस्तित्व में आया और FAA जैसी संस्थाओं का गठन हुआ।

विमानन जगत की एक भयावह तारीख

दुनिया भर के विमानन इतिहास के पन्नों को पलटें तो 30 जून की तारीख एक ऐसे कालखंड की तरह उभरती है, जिसे कोई भी याद नहीं रखना चाहेगा। 1951 से लेकर 2009 के बीच इसी दिन हुए 6 बड़े हवाई हादसों ने न केवल सैकड़ों निर्दोष लोगों की जान ली, बल्कि पूरी दुनिया को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आसमान में सुरक्षा के इंतजाम नाकाफी हैं। इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया कि पायलट की थकान, नेविगेशन की गलतियां, खराब मौसम और सैन्य अभ्यास के दौरान तालमेल की कमी कितनी घातक साबित हो सकती है। इन्हीं हादसों के बाद दुनिया भर में हवाई यातायात के नियमों को कड़ाई से लागू किया गया और सुरक्षा के मानकों को आधुनिक बनाया गया।

यूनाइटेड एयरलाइंस फ्लाइट 610: नेविगेशन में चूक का नतीजा

बात 30 जून 1951 की है, जब यूनाइटेड एयरलाइंस की फ्लाइट 610 सैन फ्रांसिस्को से शिकागो के लिए रवाना हुई थी। लेकिन यह विमान कभी अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच सका। कोलोराडो की लैरीमर काउंटी के पास यह विमान एक पहाड़ से टकराकर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। हादसे में विमान में सवार सभी 50 यात्रियों और चालक दल के सदस्यों की दर्दनाक मौत हो गई। जांच में खुलासा हुआ कि यह हादसा पूरी तरह से नेविगेशन में हुई एक चूक के कारण हुआ था। अंधेरे में कॉकपिट में बैठे पायलट ने संभवतः गलत रेडियो फ्रीक्वेंसी का चयन कर लिया था, जिस कारण उन्हें गलत दिशा का संकेत मिला और विमान पहाड़ की चोटियों के बीच जा घुसा।

ग्रैंड कैन्यन की वह दुर्घटना, जिसने बदल दिया इतिहास

30 जून 1956 का दिन एविएशन की दुनिया में एक बड़ा मोड़ लेकर आया। इस दिन ग्रैंड कैन्यन के ऊपर आसमान में यूनाइटेड एयरलाइंस की फ्लाइट 718 और ट्रांस वर्ल्ड एयरलाइंस की फ्लाइट 2 आपस में टकरा गईं। लॉस एंजिल्स से उड़ान भरने के कुछ ही मिनटों बाद हुए इस भीषण मिड-एयर कोलिजन में दोनों विमानों में सवार कुल 128 यात्रियों और क्रू मेंबर्स की जान चली गई। उस समय विमान 'विजुअल फ्लाइट रूल्स' यानी VFR के तहत उड़ रहे थे, जिसका अर्थ था कि पायलटों को खुद ही देखकर दूसरे विमानों से दूरी बनानी थी। बादलों की मौजूदगी और सीमित दृश्यता के कारण दोनों पायलट एक-दूसरे को नहीं देख सके। इस हादसे ने दुनिया को दिखा दिया कि आसमान में बढ़ता ट्रैफिक अब 'देखो और बचो' के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इसी घटना के बाद 1958 में अमेरिका में फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन (FAA) का गठन किया गया और आधुनिक एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम की नींव रखी गई।

एरोफ्लोट फ्लाइट 902: सैन्य और नागरिक उड़ानों का घातक टकराव

30 जून 1962 को सोवियत संघ में एक ऐसा हादसा हुआ, जिसने सिविल और मिलिट्री एयरस्पेस के बीच तालमेल की कमी को उजागर कर दिया। खबरोव्स्क से मास्को जा रही एरोफ्लोट की फ्लाइट 902 को क्रास्नोयार्स्क क्राय के पास एक मिसाइल ने निशाना बनाया। विमान में सवार सभी 84 लोगों की मौत हो गई। हालांकि शुरुआत में इसे कंट्रोल खोने की वजह से क्रैश बताया गया, लेकिन विमान के मलबे पर मिले निशान और छेद ने यह साबित कर दिया कि यह एक एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइल का शिकार हुआ था। यह मिसाइल पास ही चल रहे एक सैन्य अभ्यास के दौरान छोड़ी गई थी जो भटककर यात्री विमान से टकरा गई।

थाई एयरवेज की समुद्री आपदा

30 जून 1967 को थाई एयरवेज इंटरनेशनल की फ्लाइट 601 भीषण तूफान का शिकार हो गई। विमान हांगकांग के काई ताक एयरपोर्ट पर लैंडिंग की तैयारी कर रहा था, तभी वह खराब मौसम में फंस गया। रिपोर्ट्स के अनुसार, एयरपोर्ट से करीब 28 किमी दूर यह विमान समुद्र में जा गिरा। इस हादसे में 80 लोगों में से 24 लोगों ने अपनी जान गंवाई। जांच में पाया गया कि पायलट की गलती और तूफान की भयावह स्थिति इस हादसे का प्रमुख कारण थी।

एयरबस A330 का टेस्ट फ्लाइट हादसा

30 जून 1994 को विमानन जगत ने एक और झटका तब महसूस किया जब एयरबस इंडस्ट्री की टेस्ट फ्लाइट 129 टेकऑफ के तुरंत बाद क्रैश हो गई। यह एयरबस A330 मॉडल का पहला घातक हादसा था। जांच में पाया गया कि पायलट थकान का शिकार थे। थकान के कारण पायलट ने विमान को उसकी न्यूनतम गति से कम पर तेजी से ऊपर उठाने का प्रयास किया, जिससे विमान का संतुलन बिगड़ गया और वह स्टॉल हो गया। इसमें सवार सभी 7 लोगों की जान चली गई। इस हादसे के बाद पायलटों के ड्यूटी घंटों और आराम के नियमों को पूरी दुनिया में कड़ा कर दिया गया।

यमेनिया फ्लाइट 626: छोटी एयरलाइंस की सुरक्षा पर सवाल

30 जून 2009 को कोमोरोस द्वीपसमूह के पास हिंद महासागर में यमेनिया की फ्लाइट 626 क्रैश हो गई। प्रिंस सईद इब्राहिम इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरते समय हुए इस हादसे में 153 लोगों में से केवल एक 12 साल की बच्ची जीवित बच सकी। जांच से पता चला कि खराब मौसम के बीच पायलट की गलतियों ने विमान को सीधे समुद्र में उतार दिया था। इस घटना ने दुनिया भर की छोटी और कम बजट वाली एयरलाइंस के सुरक्षा मानकों पर गंभीर सवाल खड़े किए।

हादसों से मिले सबक और भविष्य की राह

इन 6 हादसों ने एविएशन इंडस्ट्री को सुरक्षा के प्रति बहुत कुछ सिखाया है। इसके बाद क्या-क्या बदलाव हुए, आइए जानते हैं:

  • आधुनिक एटीसी: 1956 के हादसे के बाद रडार ट्रैकिंग अनिवार्य की गई और आसमान को सेक्टरों में बांट दिया गया।
  • एफएए का गठन: अमेरिका में विमानन के कड़े नियमों को लागू करने के लिए फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन की स्थापना हुई।
  • पायलट ड्यूटी रूल्स: 1994 के हादसे के बाद पायलटों के ड्यूटी आवर्स और रेस्ट को लेकर वैश्विक नियम बने, ताकि थकान के कारण होने वाली गलतियां रुकें।
  • कोऑर्डिनेशन: सैन्य और नागरिक उड़ानों के बीच संचार के लिए प्रोटोकॉल बने ताकि मिसाइल हमलों जैसी घटनाएं न हों।
  • सिम्युलेटर ट्रेनिंग: पायलटों को खराब मौसम और आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए नियमित सिम्युलेटर ट्रेनिंग दी जाने लगी।
  • ब्लैक बॉक्स: हर विमान में फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर और कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर का होना अनिवार्य कर दिया गया।

आज अगर हम सुरक्षित तरीके से हवाई यात्रा कर पा रहे हैं, तो इसके पीछे कहीं न कहीं इन हादसों में खोई हुई उन सैकड़ों जिंदगियों का दर्दनाक सबक शामिल है। इन घटनाओं ने एयरक्राफ्ट के डिजाइन से लेकर एयर ट्रैफिक कंट्रोल तक हर क्षेत्र में क्रांति ला दी है।

करण मल्होत्रा पाबना के अंतरराष्ट्रीय संवाददाता हैं, जो अमेरिका, यूरोप और एशिया की खबरें रिपोर्ट करते हैं। वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर वे नजर रखते हैं। उनकी रिपोर्ट्स दुनिया की हलचल को पाठकों तक तेजी से पहुंचाती हैं।

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