सिंधु जल विवाद: गंभीर आर्थिक संकट के बीच द हेग में भारत के हिस्से का कानूनी खर्च भी उठा रहा पाकिस्तान विश्व 5 घंटे पहले 4
पाकिस्तान में आर्थिक तंगी के कारण सरकारी खर्चों और ईंधन में कटौती की जा रही है, लेकिन नीदरलैंड्स के द हेग में भारत के खिलाफ मुकदमेबाजी पर बेहिसाब खजाना लुटाया जा रहा है।

आर्थिक बदहाली के बीच अंतरराष्ट्रीय अदालत में भारी फिजूलखर्ची

एक तरफ जहां पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है और वहां की सरकार अपने अधिकारियों के लिए पेट्रोल का दैनिक कोटा तक आधा कर चुकी है, वहीं दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मुकदमेबाजी के नाम पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है। नीदरलैंड्स के द हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता अदालत में भारत के खिलाफ कानूनी लड़ाई जारी रखने के लिए पाकिस्तान न केवल अपनी जेब खाली कर रहा है, बल्कि बेहद अजीबोगरीब ढंग से भारत के हिस्से का बकाया बिल भी खुद ही भर रहा है। देश में बाढ़ राहत और जल प्रबंधन के लिए बजटीय आवंटन न के बराबर है, परंतु अदालत में भारत को घेरने की जिद में सरकारी खजाने को खाली किया जा रहा है।

बजट दस्तावेजों से खुली इस्लामाबाद की प्राथमिकताओं की पोल

पाकिस्तान के वित्त वर्ष 2026-27 के आधिकारिक बजट दस्तावेजों से सामने आए आंकड़ों ने वहां के नीति निर्माताओं की प्राथमिकताओं को बेनकाब कर दिया है। जल संसाधन विभाग के कुल 4.24 अरब पाकिस्तानी रुपए के बजट में से आधे से अधिक हिस्सा, यानी लगभग 2.18 अरब पाकिस्तानी रुपए, केवल 'पाकिस्तान मिशन फॉर इंडस वाटर्स' के नाम आवंटित कर दिए गए हैं।

इसके विपरीत, जिस देश में हर साल विनाशकारी बाढ़ आती है और आम जनता साफ पानी की बूंद-बूंद को तरसती है, वहां बाढ़ नियंत्रण के लिए केवल 12 लाख डॉलर की मामूली राशि रखी गई है। आंकड़ों की तुलना की जाए तो अपनी आवाम को बाढ़ की विभीषिका से बचाने के तय बजट की तुलना में 6 गुना से भी अधिक राशि द हेग की अदालत में वकीलों की फीस और अदालती खर्चों के लिए झोंक दी गई है।

भारत के इनकार के बाद भी खुद भरा करोड़ों का बिल

यह पूरा कानूनी विवाद जम्मू-कश्मीर में स्थित भारत की किशनगंगा और रतले पनबिजली परियोजनाओं के निर्माण से जुड़ा हुआ है। पाकिस्तान ने इन परियोजनाओं पर आपत्ति जताते हुए द हेग स्थित मध्यस्थता अदालत का रुख किया था। हालांकि, भारत का रुख इस मामले में शुरू से स्पष्ट रहा है। भारत इस अंतरराष्ट्रीय अदालत की अधिकारिता और कार्यवाही को स्वीकार नहीं करता है और इसमें कभी शामिल नहीं हुआ।

जब मध्यस्थता अदालत ने मुकदमे के संचालन के लिए भारत से उसके हिस्से की फीस मांगी, तो भारत ने भुगतान करने से साफ तौर पर इनकार कर दिया। इसके बावजूद पाकिस्तान ने इस निरर्थक केस को खींचने की खातिर करीब 50 करोड़ रुपए खुद ही अदालत में जमा करा दिए, जिसमें भारत के हिस्से का शुल्क भी शामिल था। इसके अलावा, निष्पक्ष विशेषज्ञ की कार्यवाही के संचालन के लिए भी पाकिस्तान अलग से 19.4 लाख डॉलर की रकम चुका चुका है। कानूनी जानकारों का मानना है कि जिस अदालत को भारत मानता ही नहीं, वहां भारत का बिल भरकर केस चलाना सिर्फ घरेलू राजनीति में अपनी नाकामी छिपाने का जरिया है।

लंदन के महंगे वकीलों और लॉ फर्मों पर बह रहा खजाना

द हेग में मुकदमे की पैरवी के लिए पाकिस्तान सरकार ने ब्रिटेन की कुछ सबसे महंगी और प्रतिष्ठित लॉ फर्मों का सहारा लिया है। इनमें ट्वेंटी एसेक्स और 3 वेरुलम बिल्डिंग्स जैसी नामचीन फर्मों के बेहद महंगे बैरिस्टर और तकनीकी विशेषज्ञों का भारी-भरकम अमला शामिल है। हालांकि पाकिस्तान के सरकारी बजट में इन वकीलों की व्यक्तिगत फीस का पृथक ब्योरा सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन ब्रिटिश अदालतों के 2026 के फीस ढांचे के अनुसार इनके रेट अत्यधिक ऊंचे हैं:

  • सेंट्रल लंदन के किसी वरिष्ठ वकील की सामान्य दर लगभग 65,000 रुपए प्रति घंटा होती है।
  • किसी स्थापित लॉ फर्म के सीनियर पार्टनर की दर 1 लाख रुपए प्रति घंटा से अधिक होती है।
  • किसी वरिष्ठ केसी की केवल केस स्वीकार करने की प्रारंभिक ब्रीफ फीस ही लगभग 1.5 करोड़ रुपए तक पहुंच जाती है।

यह केस अगस्त 2016 से लगातार चल रहा है। इतने वर्षों में पाकिस्तान की सरकारों ने विदेशी वकीलों, सलाहकारों और उनकी फाइव-स्टार मेहमाननवाजी पर कितने अरब रुपए लुटा दिए, इसका कोई ब्योरा पाकिस्तान की जनता को नहीं दिया गया है।

देश में कड़े बचत उपाय, पर वकीलों पर मेहरबानी

हाल ही में 17 सितंबर को पाकिस्तान सरकार ने देशव्यापी बचत अभियानों और कड़े नियमों का ऐलान किया था। देश को आर्थिक मंदी से उबारने के नाम पर कई सख्त कदम लागू किए गए थे:

  • सरकारी वाहनों के ईंधन (पेट्रोल एवं डीजल) के कोटे में 50% की कटौती कर दी गई।
  • सरकारी दफ्तरों में नए वाहनों, फर्नीचर और अन्य उपकरणों की खरीद पर पूरी तरह रोक लगा दी गई।
  • मंत्रियों, सांसदों और शीर्ष अधिकारियों के विदेश दौरों और सरकारी भोज आयोजनों पर प्रतिबंध लगाया गया।
  • कई बुनियादी विकास परियोजनाओं के बजट में भारी कटौती की गई।

पाकिस्तान की आम जनता को बिजली, पेट्रोल और चाय में कटौती करके 'कुर्बानी' देने की सलाह दी जा रही है, वहीं दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय अदालतों में वकीलों की भारी-भरकम फीस भरने के लिए खजाना बेझिझक इस्तेमाल हो रहा है।

आंतरिक जल संकट और घटती बांध क्षमता

विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान में पानी की किल्लत भारत की वजह से नहीं, बल्कि वहां के बदहाल जल प्रबंधन का नतीजा है। पाकिस्तान के चार सबसे बड़े बांधों, तरबेला, मंगला, चश्मा और वारसक की जल भंडारण क्षमता गाद जमने और रखरखाव न होने के कारण 29% तक घट चुकी है। इन घरेलू बुनियादी समस्याओं को दूर करने के बजाय सरकार अपनी विफलताओं का दोष भारत पर मढ़ने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानूनी लड़ाई का नाटक रच रही है।

खुद के बनाए कानूनी उलझाव में फंसा इस्लामाबाद

वर्ष 2025 में हुए पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल समझौते को स्थगित कर दिया था और किसी भी मध्यस्थता प्रक्रिया में भाग लेने से पूरी तरह दूरी बना ली थी। इसके बावजूद पाकिस्तान ऐसी अदालत में भारी धनराशि खर्च कर रहा है जिसके एकतरफा आदेश का व्यावहारिक रूप से कोई महत्व नहीं रह गया है।

मामले में 31 अगस्त 2026 को अदालत ने अपने अंतरिम आदेश में स्पष्ट किया था कि मुकदमे के कुल खर्चे और फीस का अंतिम बंटवारा केस का अंतिम फैसला सुनाते समय किया जाएगा। इसका सीधा अर्थ यह है कि फैसला आने तक पाकिस्तान को अपनी खस्ताहाल अर्थव्यवस्था के बीच इस खर्चीली मुकदमेबाजी का पूरा बोझ अकेले ही उठाना पड़ेगा।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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