पितृ पक्ष 2026: दशमी श्राद्ध की महिमा और सही मुहूर्त, जानें किन पूर्वजों के लिए है यह तिथि धर्म 5 घंटे पहले 4
पितृ पक्ष की दशमी तिथि पर उन पूर्वजों का तर्पण और श्राद्ध किया जाता है जिनका देहांत इसी तिथि को हुआ हो। इस लेख में जानें श्राद्ध से जुड़े जरूरी मुहूर्त और पालन किए जाने वाले नियम।

पितृ पक्ष 2026: दशमी श्राद्ध का महत्व

हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का समय पूर्वजों के प्रति सम्मान और श्रद्धा व्यक्त करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। ऐसी मान्यता है कि इस अवधि में हमारे पूर्वज सूक्ष्म रूप में धरती पर आते हैं और अपने वंशजों को सुख और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। जो लोग इन दिनों अपने पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म नहीं करते, वे पूर्वजों के असंतोष का कारण बन सकते हैं। पितरों की तृप्ति और उनकी आत्मा की शांति के लिए विधि-विधान से श्राद्ध करना अनिवार्य है। आज, यानी 5 अक्टूबर को पितृ पक्ष की दशमी तिथि का श्राद्ध मनाया जा रहा है। आइए जानते हैं कि इस दिन श्राद्ध कर्म के लिए शुभ मुहूर्त क्या है और किन पूर्वजों के निमित्त यह तिथि निर्धारित है।

दशमी श्राद्ध का शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार, आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि का प्रारंभ 5 अक्टूबर को भोर में 3 बजकर 53 मिनट पर हो चुका है। यह तिथि 6 अक्टूबर की रात 2 बजकर 7 मिनट तक प्रभावी रहेगी। श्राद्ध अनुष्ठान के लिए शास्त्रों में विशेष मुहूर्तों का उल्लेख मिलता है, जिनमें कुतुप और रौहिण काल सबसे अधिक महत्वपूर्ण माने जाते हैं। आज के दिन कुतुप मुहूर्त सुबह 11 बजकर 46 मिनट से शुरू होकर दोपहर 12 बजकर 33 मिनट तक रहेगा। इसके तुरंत बाद दोपहर 12 बजकर 33 मिनट से रौहिण मुहूर्त शुरू होगा जो दोपहर 1 बजकर 20 मिनट तक चलेगा। श्राद्ध की रस्में संपन्न करने के लिए कुतुप और रौहिण दोनों ही समय अत्यंत फलदायी माने जाते हैं।

दशमी तिथि पर किसका श्राद्ध होता है?

दशमी तिथि का श्राद्ध विशेष रूप से परिवार के उन दिवंगत सदस्यों को समर्पित होता है जिनका देहांत किसी भी महीने की दशमी तिथि को हुआ हो। इसे 'दसमी श्राद्ध' के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह तिथि उन पूर्वजों के लिए उपयुक्त है जिन्होंने अपना गृहस्थ जीवन सफलतापूर्वक व्यतीत किया हो और अपनी वंश परंपरा को आगे बढ़ाया हो। ऐसे में वानप्रस्थ आश्रम के अनुयायियों का श्राद्ध इसी दिन किया जाना श्रेष्ठ माना गया है। मान्यता है कि दशमी तिथि पर श्राद्ध करने से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति में सहायता मिलती है। हालांकि, यदि आपको अपने परिजन की मृत्यु की वास्तविक तिथि याद नहीं है, तो आप सर्वपितृ अमावस्या के दिन उनका श्राद्ध संपन्न कर सकते हैं।

श्राद्ध कर्म के दौरान पालन करने योग्य नियम

श्राद्ध की पूर्णता के लिए कुछ विशेष नियमों का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है:

  • श्राद्ध का भोजन तैयार होने के बाद पंचबलि का भोग अवश्य निकालें। यह भोग गाय, कौआ, कुत्ता, चींटी और देवताओं के निमित्त अर्पित किया जाता है।
  • भोजन की शुद्धि और सात्विकता का पूर्ण ध्यान रखें। ध्यान रहे कि श्राद्ध के भोजन में लहसुन और प्याज का उपयोग बिल्कुल न करें।
  • श्राद्ध अनुष्ठान संपन्न होने के पश्चात ब्राह्मण को आदरपूर्वक भोजन कराएं और उन्हें दान-दक्षिणा देकर आशीर्वाद प्राप्त करें।
  • तर्पण करते समय अपना मुख दक्षिण दिशा की ओर रखें, क्योंकि शास्त्रों में पितरों की दिशा दक्षिण ही मानी गई है।
प्रिया नायर पाबना की लाइफस्टाइल एवं फैशन एडिटर हैं, जो फैशन, ब्यूटी और लाइफस्टाइल ट्रेंड्स कवर करती हैं। रिश्तों, संस्कृति और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े विषयों पर भी वे लिखती हैं। उनका लेखन आधुनिक और भारतीय जीवनशैली का संतुलन पेश करता है।

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