चीन की 'ड्रैगन डिप्लोमेसी' का नया पैंतरा: पाकिस्तान के जरिए पश्चिम एशिया में घुसपैठ की कोशिश, अमेरिका की बढ़ी चिंता विश्व 4 महीने पहले 134
अमेरिकी थिंक टैंक की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन, पाकिस्तान को रणनीतिक मोहरे के रूप में इस्तेमाल कर पश्चिम एशिया और अफ्रीका के रक्षा बाजार में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है।

चीन अब केवल अपने हथियारों का निर्यात ही नहीं बढ़ा रहा है, बल्कि वह वैश्विक स्तर पर अपने रणनीतिक हितों को साधने के लिए एक नया और बड़ा गेम खेल रहा है। इस खेल में पड़ोसी देश पाकिस्तान उसका सबसे बड़ा माध्यम और मोहरा बनकर उभरा है। अमेरिका स्थित थिंक टैंक 'मिडिल ईस्ट फोरम' की एक हालिया रिपोर्ट ने इस बात का सनसनीखेज खुलासा किया है कि किस तरह चीन, पाकिस्तान का इस्तेमाल करके पश्चिम एशिया और अफ्रीकी देशों के रक्षा बाजार में अपनी पैठ मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

इस रणनीति का सबसे ताजा उदाहरण पाकिस्तान और लीबियाई नेशनल आर्मी के बीच होने वाला रक्षा सौदा है। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों पक्षों के बीच 4 अरब डॉलर से अधिक के बड़े रक्षा सौदे को लेकर बातचीत चल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस डील के पीछे असली रणनीति चीन की ही काम कर रही है, जो पाकिस्तान के कंधे पर रखकर पश्चिम एशिया में अपनी 'ड्रैगन डिप्लोमेसी' को आगे बढ़ा रहा है।

लीबिया के साथ महासौदे के पीछे बीजिंग का दिमाग

इस प्रस्तावित सैन्य समझौते के तहत पाकिस्तान, लीबियाई नेशनल आर्मी को 16 JF-17 लड़ाकू विमान, प्रशिक्षण विमान और अन्य आधुनिक सैन्य उपकरण बेचने की तैयारी में है। यह पूरा सौदा 4 अरब डॉलर से भी अधिक का है। अमेरिकी थिंक टैंक ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि इस सौदे के होने से लीबिया पर लगे संयुक्त राष्ट्र के हथियार प्रतिबंध बेहद कमजोर पड़ सकते हैं।

इतना ही नहीं, इस सौदे से लीबिया के भीतर चल रहे गृहयुद्ध और आंतरिक संघर्ष का सैन्य संतुलन पूरी तरह से बदल सकता है। इससे इस अशांत क्षेत्र में भू-राजनीतिक तनाव और अधिक गहरा होने की आशंका है। इस सौदे के पीछे पूरी तरह से चीनी तकनीक और रक्षा उद्योग काम कर रहा है, जिसे पाकिस्तान के जरिए लीबिया तक पहुंचाया जा रहा है।

चीन पर पाकिस्तान की बढ़ती सैन्य निर्भरता

हाल के वर्षों में इस्लामाबाद और बीजिंग के बीच रक्षा, सुरक्षा और खुफिया मामलों में असाधारण तालमेल देखा गया है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (एसआईपीआरआई) के आंकड़ों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2021 से 2024 के बीच पाकिस्तान ने जितने भी हथियार खरीदे, उनमें से 80 प्रतिशत से अधिक अकेले चीन से आयात किए गए थे। यह आंकड़ा साफ तौर पर दर्शाता है कि पाकिस्तान अपनी रक्षा जरूरतों के लिए किस हद तक चीन पर निर्भर हो चुका है और उसके रक्षा क्षेत्र में चीन की पकड़ कितनी मजबूत है।

यद्यपि पाकिस्तान आज भी अमेरिकी मूल के F-16 फाइटिंग फैल्कन लड़ाकू विमानों का संचालन करता है और समय-समय पर उसे अमेरिका से सैन्य सहायता भी मिलती रहती है, लेकिन उसकी रक्षा क्षमता का एक बहुत बड़ा हिस्सा अब पूरी तरह चीनी मूल के हथियारों पर आधारित हो चुका है। पाकिस्तान और चीन संयुक्त रूप से JF-17 लड़ाकू विमान का निर्माण करते हैं। अब पाकिस्तान इस विमान के साथ-साथ चीनी ड्रोन, HQ-9 वायु रक्षा प्रणाली और अन्य घातक उपकरणों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचने के लिए चीन के सहयोगी के रूप में काम कर रहा है।

पश्चिम एशिया और अफ्रीकी देशों पर नजर

अमेरिकी थिंक टैंक की रिपोर्ट में इस बात का भी विस्तार से जिक्र किया गया है कि पाकिस्तान किस तरह दुनिया के कई अन्य देशों के साथ रक्षा सौदों के लिए लगातार बातचीत कर रहा है। हाल के महीनों में पाकिस्तान ने जिन देशों के साथ अपनी रक्षा वार्ताओं को तेज किया है, उनमें प्रमुख हैं:

  • इराक
  • सऊदी अरब
  • लीबिया
  • मोरक्को
  • नाइजीरिया
  • सूडान
  • इथियोपिया
  • इंडोनेशिया
  • बांग्लादेश

चीनी मीडिया भी लगातार इस बात के दावे कर रहा है कि पाकिस्तान इनमें से कई देशों के साथ JF-17 लड़ाकू विमानों की डील फाइनल करने की दिशा में काम कर रहा है। उदाहरण के लिए, सऊदी अरब के साथ होने वाले संभावित सौदे में पाकिस्तान वित्तीय व्यवस्था या निवेश के बदले में उसे ये लड़ाकू विमान देने की पेशकश कर रहा है। हालांकि, अभी तक इस सौदे को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है क्योंकि चीनी हथियारों की गुणवत्ता, अमेरिकी प्रणालियों के साथ उनके तालमेल की कमी और वित्तीय पेचीदगियां इसमें बड़ी बाधाएं बनी हुई हैं।

चीन के लिए 'गेटवे' बना पाकिस्तान

इन तमाम तकनीकी और वित्तीय चुनौतियों के बावजूद, बीजिंग के लिए पाकिस्तान एक बेहद महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार यानी 'गेटवे' साबित हो रहा है। इसके जरिए चीन उन क्षेत्रों में अपनी पैठ बना रहा है जहां वह सीधे तौर पर सक्रिय नहीं हो पा रहा था।

पाकिस्तान द्वारा चीनी रक्षा प्रणालियों और हथियारों का यह वैश्विक प्रचार-प्रसार अंततः चीन की विशाल रक्षा-औद्योगिक ताकत को और मजबूत कर रहा है। अमेरिकी थिंक टैंक ने अपने निष्कर्ष में साफ कहा है कि चीन का अंतिम लक्ष्य पाकिस्तान को आगे रखकर पश्चिम एशिया के रक्षा बाजार में अपनी उपस्थिति बढ़ाना और अमेरिकी प्रभाव को चुनौती देना है। यह पूरी रणनीति बीजिंग की रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने की दिशा में एक बड़ा कदम है, जिससे अमेरिका की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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