भारत के चिकन नेक पर चीन की नजर, नेपाल के सीमावर्ती शहर में झोंके 300 मिलियन डॉलर चीन एक घंटा पहले 5
नेपाल के काकरभिट्टा शहर में चीन के भारी निवेश ने भारत की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास चीनी बुनियादी ढांचे का जाल बिछने के बाद अब भारत ने भी अपने रक्षा और कनेक्टिविटी के लिए मास्टर प्लान तैयार कर लिया है।

चीन की रणनीतिक घेराबंदी

भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे आमतौर पर चिकन नेक के नाम से जाना जाता है, सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह महज 22 किलोमीटर चौड़ा गलियारा भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को मुख्य भूमि से जोड़ता है। इसी रणनीतिक कमजोरी पर अब चीन की नजरें गड़ी हैं। चीन ने नेपाल के सीमावर्ती शहर काकरभिट्टा में 300 मिलियन डॉलर का बड़ा निवेश करके वहां सड़कों और पुलों का जाल बिछाना शुरू कर दिया है। यह कदम भारत की सुरक्षा के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है।

काकरभिट्टा पर चीन का शिकंजा

नेपाल का काकरभिट्टा शहर भौगोलिक रूप से भारतीय सीमा के बेहद करीब स्थित है। यहाँ चीन की सरकारी कंपनियों ने अपना पूरा प्रभाव जमा लिया है। चीन ने इस इलाके में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए 300 मिलियन डॉलर यानी लगभग 2500 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। काकरभिट्टा से लौकाही के बीच 95 किलोमीटर लंबे एशियन हाईवे कॉरिडोर के निर्माण में चीनी ठेकेदारों का दबदबा साफ नजर आता है। यद्यपि इस परियोजना को एशियन डेवलपमेंट बैंक से वित्तीय सहायता मिल रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर चीनी इंजीनियर, भारी मशीनें और तकनीकी विशेषज्ञ भारतीय सीमा के ठीक नजदीक तैनात हैं। यह निवेश महज व्यापारिक नहीं, बल्कि एक सोची-समझी कूटनीतिक चाल के रूप में देखा जा रहा है, जिससे काकरभिट्टा अब दोनों देशों के बीच एक खामोश साइलेंट वॉर का केंद्र बन गया है।

चीन के हमले के तीन मुख्य तरीके

चीन ने इस इलाके में अपनी पकड़ बनाने के लिए तीन स्तरों पर काम किया है:

  • बड़ी चीनी कंपनियों का वर्चस्व: चाइना स्टेट सेविंथ इंजीनियरिंग डिविजन और कोवेक-CRGEC जैसी कंपनियों के संयुक्त उपक्रम इस क्षेत्र में रतुवा, लोहंदरा और बकराहा जैसी नदियों पर बड़े-बड़े पुल तैयार कर रहे हैं।
  • रेलवे और हाईवे का जाल: चाइना रेलवे नंबर 2 इंजीनियरिंग ग्रुप पूर्वी नेपाल के ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर और हाईवे अपग्रेड प्रोजेक्ट्स में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
  • आड़ में अपनी पैठ: ईस्ट-वेस्ट हाईवे को फोर-लेन एशियन हाईवे बनाने के नाम पर चीन अपनी सरकारी कंपनियों के माध्यम से भारत की सीमा के बिल्कुल पास अपनी मौजूदगी दर्ज करा चुका है।

क्यों खतरनाक है यह ‘साइलेंट वॉर’?

सैन्य रणनीतिकारों का मानना है कि सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत की वह नस है, जिसे काट देने से पूर्वोत्तर भारत का संपर्क बाकी देश से टूट सकता है। काकरभिट्टा में निर्माण कार्य की आड़ में चीनी खुफिया एजेंसियों की मौजूदगी की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता है। सीमा के पास चीन का इतना मजबूत बुनियादी ढांचा खड़ा करना भारत की सुरक्षा व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती है। इसीलिए अब काकरभिट्टा में भारत और चीन की कूटनीतिक शक्तियां सीधे तौर पर आमने-सामने आ गई हैं।

भारत का मास्टर प्लान: चिकन नेक का विकल्प

चीन की इस घेराबंदी का जवाब देने के लिए भारत ने भी अपनी बिसात बिछा दी है। भारतीय रेलवे अब नेपाल के रास्ते एक नया रेल नेटवर्क तैयार कर रहा है ताकि चिकन नेक पर निर्भरता कम की जा सके। यह एक ऐतिहासिक कदम है जो आपात स्थिति में भारत की कनेक्टिविटी को सुरक्षित रखेगा। भारतीय रेलवे सिलीगुड़ी कॉरिडोर को बाईपास करने के लिए बिहार के जोगबनी से नेपाल के बिराटनगर होते हुए पश्चिम बंगाल के न्यू माल जंक्शन तक ट्रेन चलाने की योजना पर तेजी से काम कर रहा है।

रेलवे नेटवर्क के महत्वपूर्ण अपडेट्स

  • 190 किमी रूट को मंजूरी: नॉर्थईस्ट फ्रंटियर रेलवे ने बिराटनगर और न्यू माल जंक्शन के बीच 190 किलोमीटर लंबे रूट के लिए फाइनल लोकेशन सर्वे को हरी झंडी दे दी है।
  • गलगलिया-भद्रपुर सेक्शन: गलगलिया (बिहार) से भद्रपुर और कजाली बाजार (नेपाल) के बीच 12.5 किलोमीटर की नई रेल लाइन बिछाई जाएगी।
  • जोगबनी-बिराटनगर ब्रॉडगेज: इस परियोजना में 18.6 किलोमीटर हिस्सा भारत में और 13.15 किलोमीटर हिस्सा नेपाल की सीमा में आता है।
  • पूर्ण कार्य: बथनाहा (बिहार) से नेपाल कस्टम यार्ड के बीच 7.74 किलोमीटर का ट्रैक निर्माण पूरा हो चुका है, जिसे जल्द ही नेपाल सरकार अपने नियंत्रण में ले लेगी।

वर्तमान में भारत के मुख्य भूभाग से पूर्वोत्तर जाने वाली रेल गाड़ियां इस्लामपुर के अलुआबाड़ी रोड से गुजरती हैं। यह पूरा इलाका नेपाल और बांग्लादेश के बीच की 22 किलोमीटर की संकरी पट्टी में स्थित है। यदि युद्ध जैसी किसी आपात स्थिति में यह गलियारा बाधित होता है, तो भारत का पूर्वोत्तर से संपर्क टूट सकता है। इसी जोखिम को समाप्त करने के लिए भारतीय रेलवे ने बांग्लादेश और नेपाल के रास्ते कुल 14 नए रेलवे कनेक्टिविटी सर्वे की मंजूरी दी है।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

आपकी प्रतिक्रिया?

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!

फेसबुक वार्तालाप