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एक घंटा पहले
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विचारों
नेपाल आपदा की भयावह सच्चाई
नेपाल में ग्लेशियर के अचानक टूटने के कारण आई भीषण बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। इस प्राकृतिक आपदा में अब तक 469 लोगों के मरने की आधिकारिक पुष्टि हो चुकी है। इसके अलावा 1400 से भी ज्यादा लोग लापता बताए जा रहे हैं, जिनकी तलाश के लिए राहत और बचाव कार्य अभी भी जारी है। जैसे-जैसे समय बीत रहा है, मलबा हटने के साथ और शव बरामद किए जा रहे हैं। नेपाल पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक, चितवन से 178, नवलपरासी ईस्ट से 110, गोरखा से 44, नुवाकोट से 37 और धाडिंग से 33 शव मिल चुके हैं। इसी तरह, तनहुं से 28, नवलपरासी वेस्ट से 27 और रसुवा से 12 शव बरामद हुए हैं।
ISRO की सैटेलाइट तस्वीरों से हुआ खुलासा
इस आपदा के कारणों को लेकर शुरू से ही कयासों का दौर जारी था। कई लोग इसे भूकंप या किसी अन्य साजिश से जोड़कर देख रहे थे, लेकिन इसरो (ISRO) के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर द्वारा जारी तस्वीरों ने सब कुछ स्पष्ट कर दिया है। विश्लेषण से पता चला कि लगभग 5200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक ग्लेशियर का करीब दो-तिहाई हिस्सा अचानक टूटकर अलग हो गया। यह विशाल बर्फीला हिस्सा करीब 1.2 किलोमीटर नीचे लेंधे खोला नदी के कैचमेंट एरिया में आ गिरा।
तस्वीरों में क्या दिखा?
इसरो की ओर से साझा की गई तस्वीरों में आपदा से पहले और बाद की स्थिति साफ देखी जा सकती है:
- 24 अगस्त: सेंटिनल-2 सैटेलाइट द्वारा ली गई तस्वीर में ग्लेशियर पूरी तरह सुरक्षित और स्थिर दिखाई दे रहा था।
- 26 अगस्त: आपदा के बाद लैंडसैट-9 सैटेलाइट की तस्वीर में वहां एक बड़ा निशान (scar) दिखाई दिया, जहां से बर्फ का पहाड़ टूटा था।
इन तस्वीरों ने यह साबित कर दिया है कि यह कोई मामूली जलप्रलय नहीं, बल्कि ग्लेशियर के ढहने की एक बड़ी घटना थी।
क्या चीन इस आपदा को रोक सकता था?
सोशल मीडिया और कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया कि चीन ने नेपाल को ग्लेशियर टूटने की जानकारी देने में 45 मिनट की देरी की, जिससे नेपाल को अलर्ट होने का समय नहीं मिला। हालांकि, वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ इस बात से सहमत नहीं हैं कि चीन इस आपदा को रोकने में कोई बड़ी भूमिका निभा सकता था। ग्लेशियर का टूटना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, और इस विशेष घटना के लिए किसी बाहरी देश को जिम्मेदार ठहराना तथ्यात्मक नहीं है। हां, चेतावनी मिलने में देरी ने जरूर बचाव के प्रयासों को सीमित कर दिया था।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मलबे का बहाव
कैलगरी यूनिवर्सिटी के जियोमॉर्फोलॉजिस्ट डैनियल शुगर ने प्लैनेट लैब्स की तस्वीरों का अध्ययन कर बताया कि लगभग 200 वर्ग मीटर बर्फ सीधे घाटी की सतह पर गिरी। इतनी ऊंचाई से गिरने के कारण इसमें मौजूद गुरुत्वाकर्षण ऊर्जा ने अपना असर दिखाया और ठोस बर्फ के ब्लॉक टुकड़ों में बंट गए।
पृथ्वी विज्ञान न्यूजीलैंड के मुख्य वैज्ञानिक साइमन कॉक्स के अनुसार, यह घटना केवल बर्फ गिरने तक सीमित नहीं थी। गिरती हुई बर्फ अपने साथ चट्टानें, मिट्टी, पेड़ और भारी मात्रा में तलछट (sediment) लेकर नीचे आई। यही कारण है कि यह पानी की सामान्य बाढ़ न होकर मलबे का एक विनाशकारी प्रवाह (debris flow) बन गया।
लिक्विड कंक्रीट जैसी विनाशकारी शक्ति
सैन एंटोनियो स्थित टेक्सास विश्वविद्यालय के जल-वैज्ञानिक हातिम शरीफ ने इस बहाव की तुलना लिक्विड कंक्रीट से की है। उन्होंने बताया कि इस मलबे में मौजूद कीचड़ और भारी चट्टानें इतनी शक्तिशाली थीं कि वे अपने रास्ते में आने वाली गाड़ियों, इमारतों और बड़े पत्थरों को तिनके की तरह बहा ले गईं। इस पूरी प्रक्रिया को 'चेन रिएक्शन' माना जा रहा है। मलबे ने नदी का रास्ता रोककर प्राकृतिक बांध बनाया, जो बाद में टूट गया और पानी का वेग कई गुना बढ़ गया।
क्या इसे भूकंप समझा गया था?
इस आपदा की तीव्रता इतनी अधिक थी कि इसने आसपास की जमीन को भी हिला दिया। यह कंपन भूकंप मापने वाले यंत्रों (सिस्मिक इंस्ट्रूमेंट्स) पर भी दर्ज किया गया। शुरुआत में विशेषज्ञों ने इसे भूकंपीय गतिविधि माना, लेकिन बाद में सैटेलाइट डेटा और वैज्ञानिक विश्लेषण से पुष्टि हुई कि यह कंपन ग्लेशियर के ढहने और उसके कारण हुए तीव्र हिमस्खलन की वजह से था। भोटे कोशी-त्रिशूली कॉरिडोर के लिए यह आपदा अभूतपूर्व रही है, जिसने पूरे बुनियादी ढांचे को तहस-नहस कर दिया है।
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