होर्मुज संकट के बीच चीन की बड़ी चाल, खड़ा कर रहा 'समुद्री दैत्य', एक झटके में दूर होगी LNG की किल्लत
विश्व
14 घंटे पहले
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पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी ने दुनिया भर में तेल और गैस की आपूर्ति को लेकर बेचैनी पैदा कर दी है। इसी माहौल के बीच चीन ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक बड़ा दांव चलते हुए दुनिया का सबसे विशाल LNG कैरियर बनाने का काम शुरू कर दिया है। 2.71 लाख क्यूबिक मीटर क्षमता वाला यह 'समुद्री दैत्य' एक ही यात्रा में मौजूदा LNG जहाजों के मुकाबले 57 प्रतिशत अधिक गैस लेकर चल सकेगा। आइए जानते हैं इस जहाज से जुड़ी खास बातें।
क्यों खास माना जा रहा है यह प्रोजेक्ट
अमेरिका और इजरायल के खिलाफ ईरान के मोर्चे और होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही पर पैदा हुई अनिश्चितता ने दुनिया को यह अहसास कराया है कि तेल-गैस की सप्लाई कितनी संवेदनशील हो सकती है। समुद्री तेल कारोबार का बड़ा हिस्सा और LNG की अहम खेपें इसी रास्ते से होकर गुजरती हैं। होर्मुज की नाकेबंदी से एशिया और यूरोप के कई देशों में गैस की किल्लत खड़ी हो गई है। यही वजह है कि अब LNG ढोने की क्षमता बढ़ाना ऊर्जा सुरक्षा का अहम हिस्सा माना जाने लगा है, और चीन का यह नया जहाज इसी रणनीति की कड़ी बताया जा रहा है।
कितना विशाल है यह जहाज
नया LNG कैरियर 344 मीटर लंबा होगा और इसकी क्षमता 2,71,000 क्यूबिक मीटर LNG रहेगी। इसकी तुलना में आज दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक LNG जहाजों की क्षमता करीब 1,70,000 से 1,80,000 क्यूबिक मीटर होती है, जबकि एक आधुनिक गैस कैरियर औसतन करीब 174,000 क्यूबिक मीटर LNG लेकर चलता है।
इस हिसाब से चीन का यह जहाज मौजूदा मानक जहाजों के मुकाबले करीब 57 प्रतिशत अधिक LNG ढो सकेगा। यानी एक ही फेरे में ज्यादा गैस पहुंचाई जा सकेगी, जिससे परिवहन लागत घटेगी और सप्लाई चेन और प्रभावी बनेगी।
क्यों कहलाते हैं LNG जहाज 'क्राउन ज्वेल'
LNG कैरियर बनाना आज भी बेहद पेचीदा काम है। प्राकृतिक गैस को -162 डिग्री सेल्सियस पर तरल रूप में सुरक्षित बनाए रखना तकनीकी रूप से बड़ी चुनौती है। इसके लिए खास टैंक, उन्नत इंसुलेशन सिस्टम और अत्याधुनिक सुरक्षा तकनीक की जरूरत होती है। यही कारण है कि इसे शिपबिल्डिंग उद्योग का 'क्राउन ज्वेल' यानी सबसे प्रतिष्ठित जहाज माना जाता है।
रिपोर्ट के मुताबिक चीन के इस नए जहाज में NO96 Super+ मेम्ब्रेन कंटेनमेंट सिस्टम लगाया जाएगा, जो गैस को सुरक्षित रखने के साथ-साथ रिसाव और ऊर्जा की हानि को भी कम करेगा।
पर्यावरण के लिहाज से भी अहम
इस जहाज में डुअल-फ्यूल इंजन सिस्टम होगा, जिससे यह पारंपरिक ईंधन और LNG दोनों पर चल सकेगा। कंपनी का दावा है कि इससे ईंधन की खपत और कार्बन उत्सर्जन, दोनों में कमी आएगी। यह जहाज अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) के Tier-III पर्यावरण मानकों पर भी खरा उतरेगा।
ऐसे दौर में जब दुनिया हरित ऊर्जा की ओर बढ़ रही है, LNG को कोयले और तेल के मुकाबले अपेक्षाकृत साफ ईंधन माना जाता है। इसी वजह से LNG ढोने की क्षमता बढ़ना एनर्जी ट्रांजिशन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
समुद्र में बढ़ती चीन की ताकत
एक समय LNG जहाज निर्माण पर दक्षिण कोरिया और कुछ पश्चिमी कंपनियों का लगभग एकाधिकार हुआ करता था, लेकिन अब चीन इस क्षेत्र में तेजी से अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक LNG शिपबिल्डिंग बाजार में चीन की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है।
खबरों के मुताबिक हुडोंग-झोंगहुआ शिपबिल्डिंग कंपनी के पास इस समय करीब 60 LNG जहाजों के ऑर्डर हैं और उसके शिपयार्ड 2030 तक पूरी तरह बुक बताए जा रहे हैं। इससे साफ है कि चीन वैश्विक ऊर्जा कारोबार में अपनी भूमिका और मजबूत करना चाहता है।
होर्मुज संकट और LNG का भविष्य
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पश्चिम एशिया में तनाव यूं ही बना रहा तो LNG ढोने की क्षमता दुनिया के लिए और अधिक अहम हो जाएगी। यूरोप, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और भारत जैसे बड़े आयातक देशों को ऊर्जा सुरक्षा के लिए ज्यादा बड़े और ज्यादा कुशल LNG जहाजों की जरूरत पड़ेगी।
ऐसे में चीन का यह मेगा LNG कैरियर महज एक जहाज नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक ऊर्जा राजनीति और सप्लाई चेन की नई तस्वीर का प्रतीक माना जा रहा है। 2028 में इसकी पहली डिलीवरी होने के बाद यह दुनिया की LNG लॉजिस्टिक्स क्षमता को एक नया आयाम दे सकता है।
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