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एक घंटा पहले
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विचारों
पारंपरिक फसलों के चक्र से बाहर निकलकर आज के समय में बागवानी फसलों की तरफ रुख करना किसानों के लिए बेहद मुनाफे का सौदा साबित हो रहा है। फलों का राजा कहा जाने वाला आम, किसानों की किस्मत बदलने में बड़ी भूमिका निभा सकता है। यदि वैज्ञानिक और आधुनिक तकनीकों का सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए, तो आम की बागवानी से न केवल बंपर पैदावार हासिल की जा सकती है, बल्कि लागत में भी बड़ी कमी लाई जा सकती है। राजस्थान जैसे गर्म और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों की जलवायु भी आम की कई विशेष किस्मों के लिए बेहद अनुकूल मानी जाती है। कृषि विशेषज्ञ बजरंग सिंह के अनुसार, आम के पौधों के बेहतर विकास और अच्छी फसल के लिए 24 से 28 डिग्री सेल्सियस का तापमान सबसे आदर्श माना जाता है। जून से सितंबर के दौरान होने वाली मानसूनी बारिश और उसके बाद फूल आने व फल बनने के समय साफ और खुला मौसम इसकी बेहतर उत्पादकता के लिए बहुत जरूरी है।
कृषि विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि आम का बाग लगाने से पहले किसानों को अपनी जमीन की मिट्टी और वहां के जल निकास की व्यवस्था की अच्छे से जांच कर लेनी चाहिए। आम की खेती के लिए सबसे उत्तम बलुई दोमट मिट्टी को माना जाता है। इस तरह की मिट्टी में पानी का ठहराव नहीं होता और जड़ों का विकास बहुत तेजी से होता है। इसके साथ ही, मिट्टी का पीएच मान 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए, जो पौधों के स्वस्थ विकास के लिए एकदम अनुकूल है। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि बगीचे में पानी का जमाव न हो, क्योंकि जलभराव होने से पौधों की जड़ें सड़ने लगती हैं और पूरा बाग बर्बाद हो सकता है। इसलिए जल निकासी की सुगम व्यवस्था होना अनिवार्य है।
पौधों की रोपाई की वैज्ञानिक विधि और उचित दूरी
आम के नए पौधों को लगाने के लिए वर्षा ऋतु का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, पौधों की रोपाई करने से लगभग एक महीना पहले ही तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। इसके लिए किसानों को खेत में 1×1×1 मीटर आकार के गड्ढे खोद लेने चाहिए। सामान्य तौर पर जब पारंपरिक तरीके से बाग लगाया जाता है, तो पौधों के बीच की दूरी 10×10 मीटर रखी जाती है। लेकिन अगर किसान सघन बागवानी करना चाहते हैं या आम्रपाली जैसी बौनी किस्मों को लगाना चाहते हैं, तो इसके लिए 5×5 मीटर की दूरी वाली आधुनिक तकनीक अपनानी चाहिए। इससे कम जगह में अधिक पौधे लगाए जा सकते हैं।
खोदे गए गड्ढों को सीधे मिट्टी से भरने के बजाय उनमें पोषक तत्वों का सही मिश्रण डालना जरूरी है। रोपाई से पहले प्रत्येक गड्ढे में लगभग 25 किलो गोबर की सड़ी हुई खाद और उसके साथ 1 किलो सुपर फॉस्फेट को अच्छी तरह मिट्टी में मिलाकर भरना चाहिए। यह शुरुआती पोषण पौधों की जड़ों को मजबूत बनाने और शुरुआती विकास में बहुत सहायक होता है।
उन्नत किस्मों का चुनाव कर बढ़ाएं अपनी कमाई
क्षेत्र की जलवायु और बाजार की मांग को ध्यान में रखकर सही किस्म का चयन करना आम की खेती की सफलता की पहली सीढ़ी है। किसान अपनी सुविधा के अनुसार अगेती, मध्यम और पछेती किस्मों का चयन कर सकते हैं। विशेषज्ञ विभिन्न अवधियों के लिए निम्नलिखित किस्मों की सिफारिश करते हैं:
- अगेती किस्में: इनमें मुख्य रूप से बॉम्बे ग्रीन, तोतापुरी और केशर शामिल हैं, जिनकी बाजार में शुरुआती समय में काफी अच्छी मांग और कीमत मिलती है।
- मध्यम अवधि की किस्में: इस श्रेणी में लंगड़ा, दशहरी, मल्लिका और आम्रपाली जैसी बेहद लोकप्रिय और स्वादिष्ट किस्में आती हैं।
- पछेती किस्में: इस वर्ग में चौसा और फजली जैसी किस्में शामिल हैं, जो सीजन के अंत में बाजार में आती हैं।
इन पारंपरिक किस्मों के अतिरिक्त, राजस्थान की विशेष जलवायु को ध्यान में रखते हुए कई अन्य आधुनिक और अधिक उपज देने वाली किस्में भी विकसित की गई हैं। किसान अपने बगीचे में पूसा अरुणिमा, पूसा सूर्या, पूसा लालिमा, पूसा श्रेष्ठा, पूसा प्रतिभा, पूसा पीतांबर, दशहरी-51, अंबिका और अरुणिका जैसी उन्नत किस्मों को लगाकर अपनी आय को कई गुना बढ़ा सकते हैं।
खाद और पोषण का सही गणित
जैसे-जैसे आम के पौधों की उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे उन्हें अधिक पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। इसलिए उम्र के हिसाब से खाद की मात्रा का निर्धारण करना चाहिए।
- गोबर की खाद: पहले वर्ष में प्रति पौधा लगभग 15 किलो गोबर की खाद दी जानी चाहिए, जिसे धीरे-धीरे बढ़ाते हुए पांचवें वर्ष तक 75 किलो प्रति पौधा कर देना चाहिए।
- सुपर फॉस्फेट: पहले साल इसकी मात्रा 250 ग्राम होनी चाहिए, जिसे पांचवें साल तक बढ़ाकर 1 किलो प्रति पौधा कर देना चाहिए।
- यूरिया: पौधों को नाइट्रोजन की आपूर्ति के लिए पहले वर्ष 250 ग्राम यूरिया से शुरुआत करनी चाहिए और पांचवें वर्ष तक इसे बढ़ाकर 1.25 किलो कर देना चाहिए।
यूरिया के प्रयोग के समय का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। यूरिया की कुल निर्धारित मात्रा का आधा हिस्सा मार्च के महीने में (जब पौधों में फूल आ चुके हों) देना चाहिए और बाकी का आधा हिस्सा जून के महीने में देना चाहिए। इसके अलावा, यदि पौधों की पत्तियों में जिंक की कमी के लक्षण दिखाई दें, तो 0.3 प्रतिशत जिंक सल्फेट के घोल का छिड़काव करना बेहद फायदेमंद रहता है।
ड्रिप सिंचाई से पानी की बचत और कीटों से सुरक्षा
पानी की बचत और सीधे जड़ों तक नमी पहुंचाने के लिए ड्रिप इरिगेशन (टपक सिंचाई) तकनीक आम के बाग के लिए वरदान साबित हो रही है। बारिश के मौसम को छोड़कर, गर्मियों के दिनों में सप्ताह में कम से कम एक बार और सर्दियों के मौसम में लगभग 15 दिनों के अंतराल पर ड्रिप सिस्टम से सिंचाई करनी चाहिए। इस तकनीक से पानी सीधे पौधों की जड़ों के पास बूंद-बूंद करके गिरता है, जिससे वाष्पीकरण द्वारा पानी की बर्बादी नहीं होती और नमी लंबे समय तक बनी रहती है। इस वैज्ञानिक प्रबंधन को अपनाकर किसान प्रति हेक्टेयर 15 से 20 टन तक आम का बंपर उत्पादन आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।
इसके साथ ही, बाग की सुरक्षा के लिए कीटों और बीमारियों का समय पर प्रबंधन भी बेहद जरूरी है। आम की फसल को सबसे ज्यादा नुकसान मिली बग और फुदका जैसे हानिकारक कीट पहुंचाते हैं। इनसे बचाव के उचित उपाय समय पर किए जाने चाहिए। इसके अतिरिक्त, यदि बगीचे में चूर्णी फफूंद (पाउडरी मिल्ड्यू) का प्रकोप दिखाई दे, तो तुरंत घुलनशील गंधक का छिड़काव करना चाहिए। यदि पेड़ों के तनों या शाखाओं में छाल भक्षक कीट लग गए हों, तो उनके द्वारा बनाई गई सुरंगों के भीतर सीधे दवा पहुंचाकर उन्हें नियंत्रित किया जा सकता है। इन छोटी-छोटी लेकिन बेहद महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखकर किसान आम की खेती से अपनी आर्थिक स्थिति को बेहद मजबूत बना सकते हैं
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