मलक्का के मुहाने पर भारत की नई ताकत? चीन के 80% तेल रास्ते के करीब बन रहा सैन्य ठिकाना, 13000 करोड़ का दांव राष्ट्रीय राजनीति 59 मिनट पहले 4
अंडमान-निकोबार के दक्षिणी छोर पर ग्रेट निकोबार द्वीप समूह को नई पहचान देने की तैयारी है। चीन के लगभग 80 प्रतिशत कच्चे तेल के आवागमन वाले इस संवेदनशील समुद्री इलाके के पास भारत 13,000 करोड़ रुपए की लागत से संयुक्त उपयोग वाला हवाई अड्डा और नौसैनिक वायु स्टेशन बना रहा है।

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह भारत का सबसे दक्षिणी छोर है और सामरिक नजरिए से इसे बेहद अहम माना जाता है। यह इलाका मलक्का जलडमरूमध्य के बहुत करीब स्थित है। यही वह रणनीतिक स्थान है, जहां से चीन के लगभग 80 प्रतिशत कच्चे तेल और 70 प्रतिशत एलएनजी का आवागमन होता है। सैन्य और व्यावसायिक, दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण इस क्षेत्र को नई पहचान देने की दिशा में केंद्र सरकार बड़ी तैयारी कर रही है।

चार बड़ी परियोजनाओं का खाका

ग्रेट निकोबार द्वीप समूह (जीएनआई) के समग्र विकास की परिकल्पना के तहत केंद्र सरकार ने चार प्रमुख परियोजनाओं को इसमें शामिल किया है। इनमें अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट (आईसीटीपी), संयुक्त उपयोग वाला ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा एवं नौसैनिक एयर स्टेशन, टाउनशिप और पावर प्लांट शामिल हैं।

13,000 करोड़ का निवेश

रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, इन परियोजनाओं के तहत सरकार ने नौसेना और आम नागरिकों, दोनों के उपयोग के लिए एक हवाई अड्डा और रनवे बनाने की खातिर 13,000 करोड़ रुपए निवेश करने की योजना बनाई है। यह निवेश रक्षा मंत्रालय और नागरिक उड्डयन मंत्रालय मिलकर वहन करेंगे। परियोजना के पांच वर्षों में पूरा होने की उम्मीद है।

ग्रेट निकोबार द्वीप में प्रस्तावित इस संयुक्त उपयोग वाले ग्रीनफील्ड हवाई अड्डे और नौसैनिक वायु स्टेशन से इस क्षेत्र में भारत की निरंतर मौजूदगी और मजबूत होगी। इसके साथ ही सैन्य संसाधनों की आवाजाही, अभियानों को समर्थन, समुद्री मार्गों की निगरानी, संकट के समय त्वरित प्रतिक्रिया और अग्रिम क्षेत्रों में रसद बनाए रखने की क्षमता भी बढ़ेगी।

क्यों खास है यह समुद्री इलाका

ग्रेट निकोबार द्वीप समूह 6-डिग्री चैनल के पास स्थित है, जो अदन की खाड़ी से लेकर मलक्का जलडमरूमध्य तक फैले समुद्री व्यापार मार्ग का अहम हिस्सा है। यह क्षेत्र इस समुद्री मार्ग से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर है। दुनिया के कुल ऊर्जा व्यापार का करीब दो-तिहाई और कंटेनर परिवहन का लगभग आधा हिस्सा इसी संवेदनशील इलाके से होकर गुजरता है।

आईएनएस बाज की भूमिका

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की सुरक्षा के लिए भारतीय नौसेना का एयर स्टेशन आईएनएस बाज वर्ष 2012 से सक्रिय है। रक्षा अधिकारियों के मुताबिक, यह एयरफील्ड शुरुआत में 3,500 फीट लंबे रनवे के साथ शुरू हुआ था। बाद में जरूरत के अनुसार इसके विस्तार का काम जारी रहा। रनवे की लंबाई 3,500 फीट से बढ़ाकर 4,500 फीट कर दी गई, जबकि विस्तार योजना के तहत इसे 10,000 फीट तक बढ़ाने का प्रस्ताव था। हालांकि, इसके लिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण और समुद्री क्षेत्र के पुनर्भरण (रीक्लेमेशन) की जरूरत थी।

पांच विकल्पों में से चुनी गई गलाथिया खाड़ी

रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, ग्रीनफील्ड हवाई अड्डे की स्थापना के लिए आईएनएस बाज समेत पांच वैकल्पिक स्थलों का मूल्यांकन किया गया था। इस दौरान स्थलाकृति, हवाई नेविगेशन में संभावित बाधाओं, जनजातीय आबादी पर असर तथा वनस्पति एवं वन्यजीवों पर पड़ने वाले प्रभाव सहित कई मानकों को ध्यान में रखा गया। विस्तृत अध्ययन के बाद गलाथिया खाड़ी को इसके लिए सबसे उपयुक्त स्थान माना गया।

इसके अलावा आईएनएस बाज को ब्राउनफील्ड परियोजना के रूप में विकसित करने पर भी विचार हुआ, लेकिन कई व्यावहारिक सीमाओं के कारण इस विकल्प को छोड़ दिया गया। इस क्षेत्र के उत्तर में 80 मीटर से अधिक ऊंची पहाड़ियां हैं, जिनके चलते बड़े विमानों के सुरक्षित संचालन के लिए बड़े पैमाने पर पहाड़ी कटान और उथले समुद्री तट की ड्रेजिंग जरूरी होती।

साथ ही, भारतीय नौसेना का मौजूदा बुनियादी ढांचा छोटे रनवे के इर्द-गिर्द विकसित हो चुका है और कोड-4 श्रेणी के रनवे के लिए आवश्यक सुरक्षा मानक यहां उपलब्ध नहीं हैं। ऐसी स्थिति में मौजूदा सुविधाओं को हटाना पड़ता। इसके अलावा भविष्य में विस्तार की संभावनाएं भी सीमित थीं और यह स्थान अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के लिए जरूरी अवसंरचना को समायोजित करने में सक्षम नहीं था।

अधिकारियों का कहना है कि यदि आईएनएस बाज को ब्राउनफील्ड एयरपोर्ट के लिए चुना जाता तो जनजातीय आबादी, वनस्पति और वन्यजीवों पर अपेक्षाकृत अधिक असर पड़ता। यही वजह है कि नई परियोजना के तहत आईएनएस बाज से लगभग 30 किलोमीटर दूर ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट विकसित किया जाएगा।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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