अयोध्या में राम मंदिर का विवाद सुलझाने वाले थे चंद्रशेखर, लेकिन क्या राजीव गांधी ने इसीलिए गिरा दी थी सरकार? जानिए पूरा किस्सा उत्तर प्रदेश 2 महीने पहले 70
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की 100वीं जयंती के अवसर पर देश की राजनीति में एक बार फिर उनके ऐतिहासिक फैसलों और सियासी घटनाक्रमों की चर्चा तेज हो गई है।

उत्तर प्रदेश की सियासत और केंद्र की राजनीति में इस समय कई तरह के समीकरण बनते और बिगड़ते नजर आ रहे हैं। एक तरफ जहां विपक्षी दल एकजुट होने की कोशिशों में जुटे हैं, वहीं दूसरी तरफ इतिहास के कुछ अनसुने पन्ने एक बार फिर चर्चा का विषय बन गए हैं। साल 2026 पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की 100वीं जयंती का वर्ष है। देश की राजनीति में वर्तमान समय में दो मुख्य मुद्दों पर सबसे ज्यादा बहस हो रही है। पहला मुद्दा राम मंदिर में कथित दान की हेराफेरी का है, और दूसरा मुद्दा क्षेत्रीय पार्टियों में हो रही टूट-फूट का है, जैसे कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) और शिवसेना (UBT) में मची सियासी हलचल।

दिलचस्प बात यह है कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का राजनीतिक जीवन इन दोनों ही मुद्दों से बेहद गहराई से जुड़ा रहा है। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में 17 अप्रैल, 1927 को जन्मे चंद्रशेखर भारतीय राजनीति के एक ऐसे इकलौते नेता थे, जिन्होंने अपने जीवन में कभी भी किसी मंत्री या अन्य सरकारी पद की जिम्मेदारी नहीं संभाली और सीधे देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।

क्षेत्रीय दलों में टूट और चंद्रशेखर का इतिहास

आजकल जिस तरह से क्षेत्रीय पार्टियों में बिखराव देखने को मिल रहा है, वैसा ही एक बड़ा राजनीतिक उलटफेर चंद्रशेखर ने अपने दौर में किया था। जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) और शिवसेना (UBT) जैसी पार्टियों में टूट की खबरें आती हैं, तो इतिहास के पन्नों में दर्ज वह घटना याद आती है जब चंद्रशेखर ने विश्वनाथ प्रताप सिंह यानी वीपी सिंह के नेतृत्व वाले जनता दल के 63 सांसदों को तोड़कर एक नया दल बना लिया था। इसके बाद वे कांग्रेस के बाहरी समर्थन से देश के प्रधानमंत्री बने थे। उस समय राजीव गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने ही चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाया था, लेकिन बाद में कांग्रेस ने ही उनका समर्थन वापस लेकर सरकार को गिरा दिया था।

जब युवा चंद्रशेखर ने इंदिरा गांधी से कहा था- 'मैं कांग्रेस को तोड़ दूंगा'

राज्यसभा के उपसभापति और देश के वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश ने चंद्रशेखर के जीवन और उनके सफर पर एक बेहद लोकप्रिय किताब लिखी है। इस किताब में उल्लेख मिलता है कि साल 1965 में जब चंद्रशेखर पहली बार कांग्रेस में शामिल हुए थे, तब उनकी मुलाकात इंदिरा गांधी से हुई थी। उस समय देश में लाल बहादुर शास्त्री के नेतृत्व वाली सरकार काम कर रही थी और इंदिरा गांधी उसमें सूचना और प्रसारण मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रही थीं।

मुलाकात के दौरान इंदिरा गांधी ने चंद्रशेखर से एक सीधा सवाल पूछा था कि आखिर वे कांग्रेस में क्यों शामिल हुए हैं? इस पर चंद्रशेखर ने बहुत ही बेबाकी से जवाब दिया था कि वे कांग्रेस पार्टी को एक समाजवादी दिशा देना चाहते हैं। इस पर इंदिरा गांधी ने उनसे पूछा कि अगर वे अपने इस उद्देश्य में सफल नहीं हुए, तो उनका अगला कदम क्या होगा? तब चंद्रशेखर ने तुरंत जवाब दिया था:

"अगर मैं इसमें सफल नहीं हुआ, तो मैं कांग्रेस पार्टी को ही तोड़ने का प्रयास करूंगा।"

चंद्रशेखर का यह बेबाक और हैरान करने वाला जवाब सुनकर इंदिरा गांधी चौंक गईं और उन्होंने पूछा, "लेकिन ऐसा क्यों?" तब चंद्रशेखर ने कहा कि कांग्रेस अब एक ऐसे विशाल बरगद के पेड़ की तरह बन चुकी है, जिसके नीचे कोई भी नया पौधा या नई विचारधारा पनप नहीं सकती।

आगे चलकर साल 1969 में जब इंदिरा गांधी ने खुद पुराने कांग्रेस नेताओं से अलग होकर अपनी नई कांग्रेस पार्टी बनाने का फैसला किया, तो चंद्रशेखर ने इस काम में उनकी सबसे बड़ी मदद की थी। इस सियासी घटनाक्रम के बाद देश की राजनीति में इंदिरा गांधी को 'दुर्गा' और चंद्रशेखर को 'यंग तुर्क' के नाम से जाना जाने लगा।

अयोध्या विवाद को सुलझाने के बिल्कुल करीब थे चंद्रशेखर

इन दिनों देश में अयोध्या के राम मंदिर में कथित चंदा चोरी का मुद्दा गरमाया हुआ है। ऐसे समय में अयोध्या विवाद को लेकर चंद्रशेखर के दृष्टिकोण को समझना बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। देश की वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने चंद्रशेखर के साथ हुई अपनी एक पुरानी बातचीत का हवाला दिया है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री से एक बार यह सवाल पूछा था कि अगर 6 दिसंबर 1992 को, जब कारसेवकों द्वारा विवादित बाबरी ढांचे को गिराया गया था, उस समय वे देश के प्रधानमंत्री होते तो क्या करते?

इस सवाल पर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने बिना किसी संकोच के जवाब दिया था कि वे अपने कार्यकाल में ऐसा कभी भी नहीं होने देते। जब पत्रकार ने उनसे दोबारा पूछा कि यदि कारसेवकों को रोकने के लिए बल प्रयोग या सेना का सहारा लिया जाता, तो वहां हजारों की संख्या में लोग मारे जा सकते थे, तब भी चंद्रशेखर ने अपनी बात दोहराते हुए कहा कि वे किसी भी कीमत पर उस घटना को घटित नहीं होने देते।

चंद्रशेखर के साथ काम करने वाले तत्कालीन शीर्ष अधिकारियों, जिनमें कैबिनेट सचिव नरेश चंद्रा और बाद में विदेश सचिव की जिम्मेदारी संभालने वाले श्याम सरन शामिल थे, उनका भी यही मानना था कि चंद्रशेखर इस संवेदनशील मुद्दे पर बेहद कड़ा और समझौताविहीन रुख अपनाने के पक्ष में थे।

राजीव गांधी की चिंता और सरकार गिरने की असल वजह

इतिहासकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने चंद्रशेखर की सरकार को केवल जासूसी के विवाद के कारण ही नहीं गिराया था, बल्कि इसके पीछे एक बड़ी वजह यह भी थी कि चंद्रशेखर बातचीत के जरिए अयोध्या के इस जटिल विवाद को पूरी तरह सुलझाने के बेहद करीब पहुंच गए थे। वे विवादित स्थल पर राम मंदिर के निर्माण को लेकर एक बड़ा और ऐतिहासिक समझौता कराने में लगभग सफल हो चुके थे। इस समझौते के तहत विश्व हिंदू परिषद (VHP) को इस बात के लिए राजी कर लिया गया था कि भविष्य में वह काशी और मथुरा जैसे अन्य धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादित मुद्दों को दोबारा नहीं उठाएगी।

इस घटना के लगभग 36 साल बाद आज समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने जब राम मंदिर में दान की चोरी का मुद्दा उठाया, तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तुरंत मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि का मुद्दा उठाकर राजनीति को एक नया मोड़ दे दिया।

वरिष्ठ पत्रकार के अनुसार, चंद्रशेखर को इस बात का पूरा भान था कि उनकी अल्पमत सरकार के पास बहुत ज्यादा समय नहीं है। इसलिए उन्होंने नवंबर 1990 में देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के पहले ही दिन से इस मुद्दे पर काम शुरू कर दिया था। उन्होंने तुरंत विश्व हिंदू परिषद (VHP) और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी, दोनों ही पक्षों के प्रमुख नेताओं से सीधा संपर्क साधा और बातचीत का दौर शुरू किया।

उस समय कांग्रेस पार्टी के भीतर चल रही हलचलों और राजीव गांधी के सलाहकारों ने उन्हें आगाह किया था कि अगर चंद्रशेखर अपने इस प्रयास में सफल हो जाते हैं और अयोध्या विवाद का शांतिपूर्ण समाधान निकाल लेते हैं, तो उनकी लोकप्रियता पूरे देश में चरम पर पहुंच जाएगी। इसके साथ ही, कांग्रेस के भीतर भी उनकी स्वीकार्यता और पकड़ बेहद मजबूत हो जाएगी, क्योंकि वे पहले भी कांग्रेस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रह चुके थे और पार्टी के भीतर उनके चाहने वालों की एक बड़ी संख्या थी।

यही वह समय था जब हरियाणा पुलिस के दो सब-इनस्पेक्टर नई दिल्ली के 10 जनपथ (राजीव गांधी का निवास स्थान) के आसपास संदिग्ध परिस्थितियों में जासूसी करते हुए पकड़े गए थे। इस घटना को आधार बनाकर कांग्रेस ने चंद्रशेखर सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया, जिसके कारण यह ऐतिहासिक बातचीत बीच में ही रुक गई और उनकी सरकार गिर गई।

चंद्रशेखर के राजनीतिक सफर के कुछ महत्वपूर्ण पड़ाव

  • साल 1965: चंद्रशेखर पहली बार कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए और लाल बहादुर शास्त्री की सरकार में सूचना और प्रसारण मंत्री रहीं इंदिरा गांधी से मुलाकात की।
  • साल 1969: कांग्रेस में ऐतिहासिक विभाजन के समय इंदिरा गांधी का खुलकर साथ दिया और 'यंग तुर्क' के रूप में अपनी पहचान बनाई।
  • नवंबर 1990: वीपी सिंह की सरकार गिरने के बाद जनता दल के 63 सांसदों को साथ लेकर कांग्रेस के बाहरी समर्थन से देश के प्रधानमंत्री बने।
  • अयोध्या विवाद: प्रधानमंत्री बनते ही पहले दिन विश्व हिंदू परिषद (VHP) और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के साथ सीधे संवाद की शुरुआत की ताकि समझौते का सर्वमान्य रास्ता निकाला जा सके।
चेतन तिवारी पाबना के उत्तर प्रदेश संवाददाता हैं और राज्य की राजनीति, प्रशासन तथा जमीनी मुद्दों को कवर करते हैं। लखनऊ में रहते हुए वे जिलों से लेकर विधानसभा तक की खबरें संतुलित रिपोर्टिंग के साथ पाठकों तक पहुंचाते हैं। आम लोगों के मुद्दों और स्थानीय घटनाओं पर उनका खास फोकस रहता है।

आपकी प्रतिक्रिया?

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!

फेसबुक वार्तालाप