छत्तीसगढ़
2 घंटे पहले
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छत्तीसगढ़ के बस्तर का मौसम अब लीची की फसल के लिए मुफीद माना जा रहा है। यहां के महाविद्यालय में लीची को लेकर सफल शोध किया जा रहा है। इस शोध परियोजना के तहत चाइना लीची और अंबिका वन लीची का अच्छा उत्पादन लिया जा रहा है। अनुमान है कि यह शोध और तीन साल तक चलेगा, जिसके बाद किसानों को लीची की खेती के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा।
लीची की खेती को मुनाफे का सौदा माना जाता है। बाजार में इसका भाव हमेशा ऊंचा बना रहता है और लीची पसंद करने वाले लोग महंगा होने के बावजूद इसे खरीदकर खाते हैं। एक पौधा लगभग दो क्विंटल से अधिक उत्पादन देता है। ऐसे में यह खेती किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में मददगार साबित हो सकती है।
अंबिकापुर के बाद बस्तर में पहली बार फलन
जगदलपुर के उद्यानिकी कृषि वैज्ञानिक डॉ. हलदर के अनुसार छत्तीसगढ़ में अंबिकापुर के बाद पहली बार बस्तर में लीची का फलन हुआ है। लीची के ये पौधे अंबिकापुर से लाए गए थे और इनमें नौ साल बाद फल लगना शुरू हुआ है। यहां पांच किस्मों के पौधे लगाए गए हैं, जिनमें तीन किस्में बेहद अच्छी हैं। इनमें एक चाइना लीची और दूसरी अंबिका लीची है। नए पौधे तैयार करने के लिए गूटी विधि से ग्राफ्टिंग की जाती है।
लीची का पौधा लगाने की प्रक्रिया
डॉ. हलदर बताते हैं कि लीची का पौधा लगाने के लिए पहले एक मीटर बाय एक मीटर का गड्ढा खोदना चाहिए। इसमें पचास किलो गोबर खाद डालनी होती है। साथ ही 100:200:300 की मात्रा में नाइट्रोजन डाला जाना चाहिए। इसके एक महीने बाद इसमें पौधा लगाना चाहिए।
पौधा लगाते समय पुराने लीची के बाग की मिट्टी डालनी चाहिए, क्योंकि उसमें माइक्रोराइजा मौजूद रहता है। इसे आधा-आधा किलो की मात्रा में डालना चाहिए। पौधा लगने के बाद चार से पांच साल में फल आना शुरू हो जाता है, हालांकि बस्तर क्षेत्र में इसमें थोड़ा अधिक समय लग सकता है।
अभी किसानों के लिए उपलब्ध नहीं
बाजार में फिलहाल लीची 320 रुपये किलो के भाव पर बिक रही है। चूंकि यहां अभी शोध चल रहा है, इसलिए यह किसानों के लिए उपलब्ध नहीं है। यह शोध अभी और तीन-चार साल तक जारी रहेगा।
रोग और बचाव के उपाय
इस फसल में फल झड़ने की बीमारी आती है, जिससे बचाव के लिए प्लैनोफिक्स का छिड़काव किया जाता है। इसके लिए 15 लीटर की टंकी में पांच मिलीलीटर दवा मिलाकर दो हफ्ते के अंतराल पर स्प्रे करना चाहिए।
इसके अलावा कई बार फल फटने की समस्या भी सामने आती है। इसे रोकने के लिए माइक्रोन्यूट्रिएंट और बोरॉन का छिड़काव करना होता है, जिसे दो ग्राम प्रति लीटर की मात्रा में डाला जाता है।
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