जीएसटी कानून में होने जा रहा बड़ा बदलाव, टैक्स अधिकारियों से छिन सकता है गिरफ्तारी का अधिकार व्यापार एक घंटा पहले 5
जीएसटी परिषद की आगामी बैठक में कर कानूनों में बड़े बदलाव की तैयारी है, जिसके तहत गिरफ्तारी के लिए न्यायिक मंजूरी को अनिवार्य बनाया जा सकता है। इस सुधार के बाद अधिकारियों की मनमानी पर रोक लगने और कारोबारियों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

जीएसटी सुधार 3.0 की आहट

माल एवं सेवा कर यानी जीएसटी के कानून में एक बार फिर बड़े बदलावों की तैयारी पूरी हो चुकी है। जीएसटी परिषद, जो कि इस कर प्रणाली से जुड़े फैसलों की सर्वोच्च संस्था है, अब सुधारों के तीसरे चरण की ओर बढ़ रही है। जानकारी के अनुसार, परिषद की इसी सप्ताह होने वाली बैठक में कर अधिकारियों की शक्तियों और कानूनी प्रक्रियाओं की समीक्षा की जाएगी। माना जा रहा है कि इस बैठक में सबसे महत्वपूर्ण फैसला अधिकारियों के गिरफ्तारी के अधिकार को सीमित करने से जुड़ा हो सकता है। यदि यह प्रस्ताव पास होता है, तो कर अधिकारियों के लिए सीधे तौर पर गिरफ्तारी करना मुश्किल हो जाएगा और इसके लिए अदालत की अनुमति अनिवार्य कर दी जाएगी।

गिरफ्तारी के नियम होंगे सख्त

सूत्रों की मानें तो जीएसटी परिषद 7 अक्टूबर को होने वाली अपनी अहम बैठक में सुधारों के एक व्यापक पैकेज पर विचार कर सकती है। इस समय, केंद्रीय जीएसटी अधिनियम की धारा 69 के तहत कर आयुक्त की मंजूरी के बाद कर अधिकारी किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकते हैं। प्रस्तावित बदलावों के तहत, अधिकारियों से यह स्वविवेक वाली शक्ति वापस लेने की चर्चा चल रही है। अब कोई भी गिरफ्तारी केवल न्यायिक आदेश या अदालत की मंजूरी के बाद ही संभव हो पाएगी। यह कदम विशेष रूप से उन कारोबारियों के लिए बड़ी राहत लेकर आएगा जो अक्सर कर अधिकारियों द्वारा सीधे गिरफ्तारी की कार्रवाई के भय में रहते हैं।

अपराधों की सीमा और आपराधिक कार्रवाई में बदलाव

सुधारों के इस नए दौर में केवल गिरफ्तारी ही नहीं, बल्कि आपराधिक कार्रवाई शुरू करने की दहलीज को भी ऊंचा किया जा रहा है। वर्तमान में एक करोड़ रुपये से अधिक की कर चोरी या अनियमितता पर आपराधिक मुकदमा शुरू किया जा सकता है। इस सीमा को बढ़ाकर 5 करोड़ रुपये करने का प्रस्ताव है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मामूली वर्गीकरण, मूल्यांकन या इनपुट टैक्स क्रेडिट से जुड़े विवादों को आपराधिक श्रेणी से बाहर रखा जाए। अक्सर देखा गया है कि कारोबारी और कर अधिकारी एक ही लेनदेन को अलग-अलग नजरिए से देखते हैं, जिससे विवाद पैदा होते हैं। ऐसे में अब कानूनी प्रक्रियाओं का दायरा सीमित किया जाएगा ताकि साधारण विवादों के लिए किसी को जेल न जाना पड़े।

सुधारों के अन्य प्रमुख बिंदु

जीएसटी परिषद का लक्ष्य प्रशासन को सरल बनाना और अनुपालन लागत को कम करना है। सितंबर 2025 में जीएसटी दरों को तर्कसंगत बनाने के बाद, अब सरकार का पूरा ध्यान प्रवर्तन तंत्र को अधिक आनुपातिक बनाने पर है। प्रस्तावित पैकेज में शामिल अन्य बदलावों में शामिल हैं:

  • जीएसटी पंजीकरण प्रक्रिया को और अधिक सरल बनाना।
  • रिफंड की प्रक्रिया में तेजी लाना ताकि कारोबारियों का पैसा न फंसे।
  • इनपुट टैक्स क्रेडिट प्राप्त करने के नियमों में स्पष्टता लाना।
  • कारण बताओ नोटिस जारी करने और जुर्माने के मौजूदा नियमों में बदलाव करना।

यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इन सुधारों का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि सरकार टैक्स वसूली का अपना अधिकार खो देगी। कर चोरी करने वालों पर जुर्माना, ब्याज और टैक्स वसूली की कार्रवाई पहले की तरह जारी रहेगी। गंभीर धोखाधड़ी के मामलों में अदालत के माध्यम से सख्त कदम उठाए जाएंगे।

9 अपराधों की सूची होगी खत्म

जीएसटी के तहत सजा के प्रावधानों को लेकर भी बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। मौजूदा नियमों में अभियोजन से जुड़े 24 तरह के अपराधों में सजा का प्रावधान है। नए प्रस्ताव के अनुसार, इनमें से 9 अपराधों को पूरी तरह से सूची से हटाने की तैयारी है। शेष 11 अपराधों को मौजूदा स्वरूप में रखा जा सकता है। इसके अलावा, न्यूनतम सजा के प्रावधान को खत्म करने पर भी विचार हो रहा है ताकि अदालतें हर मामले में अनिवार्य कारावास की जगह जुर्माना लगाने का विकल्प चुन सकें। मध्यम श्रेणी के अपराधों में अधिकतम सजा को 3 साल से घटाकर 2 साल करने की भी योजना है।

करदाताओं के लिए राहत की नई उम्मीद

व्यापारिक समुदाय के लिए यह बदलाव किसी बड़ी जीत से कम नहीं है। यदि प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है, तो रिटर्न दाखिल करने में देरी, टैक्स के भुगतान में नकदी की कमी या वर्गीकरण के सामान्य विवादों में व्यापारी केवल ब्याज और जुर्माना भरकर गिरफ्तारी की तलवार से बच सकेंगे। सरकार का यह कदम आर्थिक अपराधों को गैर-आपराधिक बनाने के अपने व्यापक प्रयासों का हिस्सा है। अब देखना होगा कि 7 अक्टूबर की बैठक के बाद जीएसटी परिषद इन बदलावों पर क्या अंतिम फैसला लेती है, लेकिन यह स्पष्ट है कि जीएसटी कानून अब अधिक मित्रवत और न्यायसंगत होने की राह पर है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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