6 शुभ संयोगों के साथ आज मनाई जा रही है कृष्ण जन्माष्टमी, जानें पूजा का उत्तम मुहूर्त, महत्व, व्रत नियम और विशेष मंत्र धर्म एक घंटा पहले 4
भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पावन पर्व आज देश भर में बेहद हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इस वर्ष कृष्ण जन्माष्टमी पर 6 अत्यंत दुर्लभ और मंगलकारी योग बन रहे हैं, जिससे इस दिन की महिमा और पूजा का फल कई गुना बढ़ गया है।

भगवान विष्णु के पूर्ण अवतार और जगत के पालनहार भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पावन पर्व आज पूरे देश में अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और उमंग के साथ मनाया जा रहा है। घरों से लेकर मंदिरों तक, हर जगह बाल गोपाल के स्वागत की भव्य तैयारियां की गई हैं। हिंदू धर्म में कृष्ण जन्माष्टमी का बहुत बड़ा महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, द्वापर युग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में मध्यरात्रि के समय कंस के अत्याचारों का अंत करने के लिए भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में पृथ्वी पर अवतार लिया था। आज के दिन भक्तगण व्रत रखते हैं और मध्यरात्रि में ठीक 12:00 बजे भगवान के जन्म के समय विशेष आराधना करते हैं। इस दिन बाल गोपाल की विशेष पूजा-अर्चना, मनमोहक श्रृंगार, सुंदर झूला सजाने और उन्हें माखन-मिश्री का भोग लगाने की प्राचीन परंपरा है।

जन्माष्टमी व्रत का आध्यात्मिक महत्व और महिमा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जन्माष्टमी का व्रत रखने से मनुष्य को मानसिक और आध्यात्मिक शांति की प्राप्ति होती है। इस पावन अवसर पर श्रद्धालु सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेते हैं। अपनी शारीरिक क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार, कई लोग पूरे दिन निर्जला (बिना पानी के) व्रत रखते हैं, तो वहीं कुछ लोग फलाहार करके इस व्रत का पालन करते हैं। दिनभर का समय प्रभु की भक्ति, भजन-कीर्तन, धार्मिक कथाओं के श्रवण और उनके पवित्र मंत्रों के जाप में व्यतीत किया जाता है। मध्यरात्रि में भगवान के जन्म के पश्चात पूजा और आरती संपन्न करके ही व्रत का पारण किया जाता है। भक्त अपने परिवार के कल्याण, सुख-समृद्धि, संतान की उन्नति और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा के प्रवेश के लिए बाल गोपाल से प्रार्थना करते हैं। उन्हें झूले में बैठाकर प्यार से झुलाने की परंपरा हर भक्त के मन को असीम आनंद से भर देती है।

जन्माष्टमी 2026 की तिथि और रोहिणी नक्षत्र का समय

पंचांग के अनुसार, इस वर्ष भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत 3 और 4 सितंबर की दरमियानी रात को 2:30 बजे से हो रही है। यह तिथि अगले दिन यानी 5 सितंबर को रात 12:30 बजे तक बनी रहेगी। उदयातिथि और मध्यरात्रि में अष्टमी तिथि के संयोग के कारण जन्माष्टमी का यह पावन पर्व आज, 4 सितंबर 2026 दिन शुक्रवार को पूरे देश में मनाया जा रहा है। इसके साथ ही, इस विशेष दिन पर रोहिणी नक्षत्र रात को 11 बजकर 04 मिनट तक रहेगा। इस समयावधि में श्रद्धालु पूरे विधि-विधान और निष्ठा के साथ भगवान द्वारकाधीश की आराधना कर सकते हैं।

इस बार बन रहे हैं ये 6 अद्भुत और शुभ संयोग

ज्योतिषीय गणना के अनुसार, साल 2026 की जन्माष्टमी बेहद खास मानी जा रही है क्योंकि आज के दिन ब्रजमंडल सहित देश भर में एक साथ 6 अत्यंत दुर्लभ और शुभ संयोगों का निर्माण हो रहा है। इस दिन बन रहे शुभ योगों का विवरण इस प्रकार है:

  • श्रीकृष्ण जयंती योग: यह योग जन्माष्टमी के दिन पूजा और व्रत के महत्व को कई गुना बढ़ा देता है।
  • हर्षण योग: इस योग में की गई पूजा मन में प्रसन्नता और कार्यों में सफलता लेकर आती है।
  • हंसराज योग: गुरु देव बृहस्पति के अपनी उच्च राशि में विराजमान होने के कारण इस महान योग का निर्माण हो रहा है।
  • मालव्य राजयोग: दैत्यगुरु शुक्र के अपनी उच्च राशि में स्थित होने से यह सुंदर राजयोग बन रहा है।
  • बुधादित्य योग: सिंह राशि में सूर्य और बुध की युति होने से इस अत्यंत शुभ योग का निर्माण हो रहा है।
  • नवपंचम राजयोग: यह राजयोग भी आज के दिन को ज्योतिषीय दृष्टि से बेहद कल्याणकारी बना रहा है।

मान्यता है कि इन शुभ और दुर्लभ योगों में व्रत रखकर पूरे विधि-विधान से कन्हैया की पूजा-अर्चना करने से जातकों की कुंडली के सभी प्रकार के दोष दूर होते हैं और ग्रहों के अशुभ प्रभावों में भारी कमी आती है।

प्रातःकाल से ऐसे शुरू करें पूजा की तैयारी

जन्माष्टमी के दिन सुबह के समय से ही पूजा की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। सबसे पहले प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और स्वच्छ पीले या लाल रंग के वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूरे घर और विशेष रूप से पूजा स्थल की अच्छी तरह से साफ-सफाई करें। अब पूजा घर में एक लकड़ी की साफ चौकी स्थापित करें और उस पर पीला या लाल रंग का कपड़ा बिछाएं। इस चौकी पर बाल गोपाल या लड्डू गोपाल की सुंदर प्रतिमा को विराजमान करें। घी का दीपक जलाकर भगवान का ध्यान करें और हाथ में जल व अक्षत लेकर अपनी सामर्थ्य के अनुसार व्रत का संकल्प लें। पूरे दिन मन ही मन प्रभु के नाम का स्मरण करें, उनके मधुर भजनों को सुनें और कन्हाई की लीलाओं का पाठ करें। व्रत रखने वाले लोग अपने स्वास्थ्य और पारिवारिक नियमों के अनुसार फलाहारी भोजन का सेवन कर सकते हैं।

व्रत के दौरान सात्विकता और खान-पान के नियम

जन्माष्टमी के पावन दिन पर विचारों, व्यवहार और खान-पान में पूर्ण सात्विकता बनाए रखना आवश्यक माना गया है। जो श्रद्धालु फलाहार रहकर व्रत कर रहे हैं, वे अपने भोजन में फल, गाय का दूध, ताजा दही, मखाना, साबूदाना और कुट्टू या सिंघाड़े के आटे से तैयार सात्विक व्यंजनों को शामिल कर सकते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों की अपनी विशेष परंपराएं होती हैं, इसलिए अपने घर के वरिष्ठ सदस्यों के मार्गदर्शन और रीति-रिवाजों के अनुसार ही व्रत के नियमों का पालन करना चाहिए।

मध्यरात्रि को इस विधि से करें भगवान श्रीकृष्ण का पूजन

जन्माष्टमी के त्योहार में मध्यरात्रि यानी रात के ठीक 12:00 बजे भगवान के प्राकट्य के समय की जाने वाली महापूजा का सबसे अधिक महत्व होता है। पूजन की सही और सरल विधि निम्नलिखित है:

  • रात के 12:00 बजते ही लड्डू गोपाल को एक बड़े पात्र में रखकर सबसे पहले दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बने पंचामृत से स्नान कराएं।
  • पंचामृत स्नान के बाद उन्हें गंगाजल और स्वच्छ जल से अच्छी तरह पवित्र करें।
  • इसके बाद कन्हैया को मखमली सुंदर वस्त्र पहनाएं और फिर उनका मुकुट, मोरपंख, नन्ही बांसुरी, वैजयंती माला और मनमोहक आभूषणों से अनुपम श्रृंगार करें।
  • ठाकुर जी के मस्तक पर चंदन और अक्षत का तिलक लगाएं, उन्हें ताजे सुगंधित फूल और तुलसी दल अर्पित करें। ध्यान रहे कि कान्हा की पूजा में तुलसी दल का होना अनिवार्य है।
  • अब बाल गोपाल को उनके प्रिय माखन-मिश्री, पंचामृत, ऋतु फल, तरह-तरह की मिठाइयों अथवा धनिए की पंजीरी का प्रेमपूर्वक भोग लगाएं।
  • धूप और घी का दीपक जलाकर श्रद्धापूर्वक श्रीकृष्ण की आरती उतारें। शंख की ध्वनि और घंटियों की मधुर आवाज के साथ आनंदपूर्वक भगवान का जन्मोत्सव मनाएं।

जन्माष्टमी 2026 पूजा का सबसे उत्तम मुहूर्त

शास्त्रों के अनुसार, कन्हाई के जन्म की पूजा हमेशा निशीथ काल यानी मध्यरात्रि के समय की जाती है। इस वर्ष पूजा का सबसे उत्तम और फलदायी समय इस प्रकार है:

निशिता काल (मध्यरात्रि) पूजा का शुभ समय: रात 11:57 बजे से रात 12:43 बजे तक

पूजा की कुल अवधि: 45 मिनट

पूजन के समय इन विशेष बातों का रखें ध्यान

जन्माष्टमी की पूजा करते समय कुछ महत्वपूर्ण सावधानियां बरतनी बेहद जरूरी होती हैं ताकि आपकी पूजा निर्विघ्न रूप से संपन्न हो सके:

  • पूजा स्थल और घर की स्वच्छता का पूरा ध्यान रखें। पूजा में इस्तेमाल होने वाली सभी सामग्रियां पूर्णतः शुद्ध और ताजी होनी चाहिए।
  • भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित किए जाने वाले किसी भी भोग में तुलसी का पत्ता (तुलसी दल) रखना न भूलें, क्योंकि तुलसी के बिना कन्हाई भोग स्वीकार नहीं करते हैं।
  • पूजा और व्रत के दौरान अपने मन को शांत और एकाग्र रखें। किसी भी प्रकार के क्रोध, विवाद, चुगली या नकारात्मक विचारों से खुद को दूर रखें और केवल प्रभु भक्ति में लीन रहें।

दिनभर के शुभ चौघड़िया मुहूर्त पर एक नजर

आज के दिन अलग-अलग समय पर विभिन्न प्रकार के शुभ चौघड़िया मुहूर्त रहेंगे, जिनमें आप अपनी सुविधानुसार पूजा और शुभ कार्य कर सकते हैं:

  • लाभ चौघड़िया: सुबह 7:35 बजे से 9:10 बजे तक
  • अमृत चौघड़िया: सुबह 9:10 बजे से 10:45 बजे तक
  • शुभ चौघड़िया: दोपहर 12:20 बजे से 1:55 बजे तक
  • निशीथ काल मुहूर्त: रात 11:57 बजे से 12:43 बजे तक

इन दिव्य मंत्रों के जाप से प्रसन्न होंगे बाल गोपाल

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए भक्तों को निम्नलिखित मंत्रों का जाप श्रद्धापूर्वक करना चाहिए:

महामंत्र (हरे कृष्ण महामंत्र):

हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे।
हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे॥

द्वादशाक्षर मंत्र:

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥

कष्ट निवारक मंत्र:

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणतक्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः॥

कृष्ण गायत्री मंत्र:

ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो कृष्णः प्रचोदयात्॥

मूल मंत्र / बीज मंत्र:

ॐ क्लीं कृष्णाय नमः॥ या ॐ कृष्णाय नमः॥
देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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