कोटा: ट्रॉली, लिफ्ट और एस्केलेटर के दौर में घटा कुलियों का काम, आमदनी पर गहराया संकट राजस्थान एक महीने पहले 17
कोटा रेलवे स्टेशन पर आधुनिक सुविधाओं के बढ़ते इस्तेमाल से यात्री खुद ही अपना सामान ले जाने लगे हैं, जिससे कुलियों की आय में भारी गिरावट आई है। श्रमिकों ने रोजगार सुरक्षा, ग्रुप-डी में समायोजन और बेहतर चिकित्सा सुविधाओं की मांग उठाई है।

रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों की सहूलियत के लिए लगेज ट्रॉली, एस्केलेटर, लिफ्ट और दूसरी आधुनिक सुविधाओं का दायरा लगातार बढ़ाया जा रहा है। इन इंतजामों ने जहां यात्रियों को बड़ी राहत दी है, वहीं स्टेशन पर बरसों से कुली का काम करने वाले लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट और गहरा होता जा रहा है।

खुद सामान ले जाने लगे यात्री

स्टेशन पर कार्यरत कुलियों का कहना है कि पहले यात्रियों का भारी सामान प्लेटफॉर्म से बाहर तक पहुंचाने का काम उन्हें नियमित रूप से मिल जाता था और इससे परिवार का खर्च आसानी से निकल आता था। लेकिन अब ज्यादातर यात्री ट्रॉली, लिफ्ट और एस्केलेटर का सहारा लेकर अपना सामान खुद ही लेकर निकल जाते हैं। इसी वजह से कुलियों की कमाई में लगातार गिरावट दर्ज हो रही है।

'अब कुली कम, पूछताछ केंद्र ज्यादा'

करौली के रहने वाले महेश, जो कई वर्षों से कुली का काम कर रहे हैं, बताते हैं कि अब उनका काम कुली का कम और पूछताछ केंद्र का ज्यादा हो गया है। यात्री उनसे ट्रेन, प्लेटफॉर्म और दूसरी जानकारियां तो लेते हैं, मगर सामान खुद ही उठाकर चले जाते हैं। उनके मुताबिक पहले की तुलना में कोटा में विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों की संख्या में भी बदलाव आया है, जिससे काम और घट गया है।

दिनभर में मुश्किल से एक-दो ग्राहक

कुलियों के अनुसार अब पूरे दिन में बमुश्किल एक-दो ग्राहक ही मिल पाते हैं। इसके चलते उनकी दैनिक आय घटकर 200 से 300 रुपये तक रह गई है। कई बार हालात ऐसे बन जाते हैं कि परिवार का भरण-पोषण करना तक मुश्किल हो जाता है।

श्रमिकों का कहना है कि करीब सात-आठ साल पहले तक स्टेशन पर लिफ्ट और एस्केलेटर जैसी सुविधाएं नहीं थीं। उस दौर में यात्रियों को सामान उठवाने के लिए कुलियों की जरूरत पड़ती थी और उनका काम बेहतर चलता था। लेकिन नए स्टेशन भवन और आधुनिक सुविधाओं के विस्तार के बाद उनका रोजगार बुरी तरह प्रभावित हुआ है।

उन्होंने यह भी बताया कि पहले बिहार और पश्चिम बंगाल की कई लंबी दूरी की ट्रेनों का ठहराव स्टेशन पर ज्यादा समय तक रहता था, जिससे सामान ढोने का काम मिल जाता था। अब परिस्थितियां बदलने के साथ आमदनी और भी कम हो गई है।

आधुनिक सुविधाओं से सिमटा रोजगार

स्टेशन पर कार्यरत एक अन्य कुली ने बताया कि वर्ष 2010 से इस पेशे में होने के बावजूद उनकी मासिक आय 10 से 12 हजार रुपये से ज्यादा नहीं हो पाती। इसमें से कमरे का किराया, भोजन और बाकी खर्च निकालने के बाद बचत लगभग न के बराबर रह जाती है।

ग्रुप-डी में समायोजन की मांग

कुलियों ने सरकार और रेलवे प्रशासन से मांग की है कि वर्ष 2008 की तर्ज पर उन्हें रेलवे के ग्रुप-डी पदों में समायोजित किया जाए। उनका कहना है कि पहले कुछ कुलियों को ग्रुप-डी में शामिल किया गया था, लेकिन आज भी कई ऐसे कुली हैं जो वर्षों से स्टेशन पर सेवा दे रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने बेहतर चिकित्सा सुविधाएं मुहैया कराने की भी मांग रखी है।

श्रमिकों का मानना है कि आधुनिक सुविधाएं यात्रियों के लिए जरूरी हैं, मगर उनके रोजगार और भविष्य की सुरक्षा के लिए भी ठोस कदम उठाए जाने चाहिए, ताकि बरसों से स्टेशन की पहचान बने ये मेहनतकश सम्मानजनक जीवन जी सकें।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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