भारत
एक घंटा पहले
8
विचारों
कोच्चि में दिया गया विवादित बयान
केरल के कोच्चि शहर में हाल ही में आयोजित हब्बुल रसूल कॉन्फ्रेंस के दौरान ग्रैंड मुफ्ती शेख अबूबकर अहमद ने महिलाओं के संबंध में एक ऐसी टिप्पणी की है जिसने सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। उन्होंने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि महिलाओं का स्थान केवल उनके घर तक ही सीमित होना चाहिए और उन्हें सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भागीदारी से बचना चाहिए। शेख अबूबकर ने तर्क दिया कि यदि महिलाओं को सार्वजनिक क्षेत्रों में आने की अनुमति दी गई, तो इससे समाज में भारी तबाही हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि इस्लाम में पर्दा प्रथा को अनिवार्य करने का मुख्य उद्देश्य इसी खतरे को टालना था। उनके अनुसार, यह विचार पिछले 100 वर्षों से धार्मिक विद्वानों द्वारा साझा किया जाता रहा है ताकि महिलाओं की गरिमा को सुरक्षित रखा जा सके और उन्होंने दावा किया कि कुरान में भी इसी तरह के दिशा-निर्देश दिए गए हैं।
IUML की प्रतिक्रिया
इस बयान के सामने आने के बाद राज्य की राजनीति में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कांग्रेस की प्रमुख सहयोगी पार्टी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग यानी IUML ने इन टिप्पणियों का बचाव किया। सुन्नी मुस्लिम विद्वान कांथापुरम ए.पी. अबूबकर मुसलियार के इस रुख को पार्टी ने एक विद्वतापूर्ण विचार करार दिया। जब पत्रकारों ने इस विषय पर IUML के राज्य अध्यक्ष पनाक्कड़ सादिक अली शिहाब थंगल से सवाल किया, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि वे इस मामले पर और अधिक चर्चा नहीं करना चाहते। उन्होंने कहा कि मुसलियार एक ज्ञानी विद्वान हैं और उन्होंने जो कहा वह उनकी विद्वता का हिस्सा है।
जब थंगल से यह पूछा गया कि क्या आज के आधुनिक दौर में महिलाओं को वाकई घर की चारदीवारी के भीतर ही रहना चाहिए, तो उन्होंने इसे सुरक्षा से जोड़कर देखा। थंगल ने कहा कि मुसलियार की चिंता संभवतः मौजूदा परिस्थितियों को लेकर थी जहां महिलाओं को अक्सर निशाना बनाया जाता है। उन्होंने यह तर्क दिया कि हो सकता है कि धर्मगुरु इसी चिंता के कारण संयम बरतने की बात कह रहे हों। उन्होंने स्वीकार किया कि सामाजिक मुद्दों पर हर व्यक्ति की अपनी अलग राय हो सकती है और समाज में ऐसे मतभेदों के बावजूद सभी को मिलकर काम करने की आवश्यकता है।
CPI(M) की तीखी आलोचना
धार्मिक नेता के इस बयान का कड़ा विरोध करते हुए वरिष्ठ CPI(M) नेता पी. जयराजन ने मोर्चा खोला है। उन्होंने सार्वजनिक जीवन से महिलाओं को बाहर रखने की सोच को लोकतंत्र के लिए हानिकारक बताया। सोशल मीडिया पर अपनी बात रखते हुए जयराजन ने कहा कि हालांकि प्रत्येक नागरिक को अपनी धार्मिक आस्था को मानने और व्यक्त करने का पूरा अधिकार प्राप्त है, लेकिन जब इसी आस्था का इस्तेमाल यह तय करने के लिए किया जाता है कि महिलाओं को कैसे रहना चाहिए और क्या करना चाहिए, तो उस पर लोकतांत्रिक बहस होना अनिवार्य है।
पी. जयराजन ने स्पष्ट रूप से कहा कि महिलाओं की आजादी, उनकी समानता और सार्वजनिक जीवन में उनकी सक्रिय भागीदारी को सुनिश्चित करना एक लोकतांत्रिक समाज का सबसे बुनियादी कर्तव्य है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी धार्मिक मान्यता को महिलाओं के अधिकारों और उनकी स्वतंत्रताओं को सीमित करने का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भले ही लोग अपनी धार्मिक मान्यताओं को सुरक्षित रखना चाहें, लेकिन वे इस प्रक्रिया में समाज की महिलाओं के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन नहीं कर सकते। उन्होंने इस पूरी विचारधारा की आलोचना करते हुए इसे बदलते युग में अनुचित करार दिया।
Comments
0 comment