टोलोलिंग की जीत: कारगिल युद्ध का वह निर्णायक मोड़ जिसने पलट दी पूरी जंग की दिशा राष्ट्रीय राजनीति 3 घंटे पहले 3
जून 1999 में 2 राजपूताना राइफल्स ने द्रास की 15,000 फीट ऊंची टोलोलिंग चोटी पर भीषण मुश्किलों के बीच तिरंगा फहराया। मेजर विवेक गुप्ता समेत कई वीरों के बलिदान से मिली इस जीत ने श्रीनगर-लेह हाईवे को सुरक्षित किया और कारगिल युद्ध का रुख बदल दिया।

कारगिल युद्ध की जिन लड़ाइयों ने पूरे संग्राम की दिशा तय की, उनमें टोलोलिंग की लड़ाई का स्थान सबसे ऊपर है। जून 1999 में भारतीय सेना की 2 राजपूताना राइफल्स ने बेहद दुर्गम पहाड़ियों, दुश्मन की लगातार गोलाबारी और लगभग नामुमकिन दिखती परिस्थितियों के बीच अदम्य साहस दिखाकर टोलोलिंग चोटी पर कब्जा किया। इस विजय ने श्रीनगर-लेह हाईवे को सुरक्षित किया और भारतीय सेना के मनोबल को नई बुलंदियों तक पहुंचा दिया।

द्रास की 15,000 फीट ऊंची चुनौती

मई 1999 में भारतीय सेना के सामने जो सबसे बड़ी चुनौती खड़ी थी, वह थी द्रास की 15,000 फीट ऊंची टोलोलिंग चोटी। इस चोटी पर पाकिस्तानी सेना की नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री के सैनिकों ने मजबूत कंक्रीट और पत्थरों के बंकर बनाकर अपनी स्थिति बेहद मजबूत बना ली थी। ऊंचाई का लाभ उठाते हुए दुश्मन भारी हथियारों, मशीन गनों और स्नाइपर्स के साथ पूरी तरह सुरक्षित बैठा था।

भारतीय सैनिकों को इन ठिकानों तक पहुंचने के लिए बिल्कुल खुली और खड़ी चट्टानों पर चढ़ाई करनी पड़ रही थी। हालात इतने जोखिम भरे थे कि ऊपर बढ़ने का हर कदम मौत को चुनौती देने जैसा था, फिर भी जवानों का हौसला तनिक भी नहीं डगमगाया।

रणनीतिक धुरी थी टोलोलिंग

टोलोलिंग महज एक चोटी नहीं, बल्कि द्रास की रणनीतिक धुरी थी। यहीं से पाकिस्तानी सैनिक श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग पर नजर रखे हुए थे और लगातार उस पर गोलाबारी कर रहे थे। इस गोलाबारी से भारतीय सेना की सप्लाई लाइन खतरे में पड़ गई थी, इसीलिए इस चोटी को वापस लेना बेहद जरूरी हो गया था।

शुरुआती कोशिशें और भारी नुकसान

इस खतरे को खत्म करने के लिए 18 ग्रेनेडियर्स और 1 नागा रेजीमेंट ने कई साहसिक प्रयास किए, लेकिन दुश्मन की सटीक स्थिति का अंदाजा न होने के कारण उन्हें भारी नुकसान झेलना पड़ा। कई बहादुर अफसर और जवान दुश्मन की मशीन गनों का निशाना बनकर शहीद हो गए, जिससे शुरुआती दौर में सेना को कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

नई रणनीति और 2 राजपूताना राइफल्स

इन शुरुआती असफलताओं के बाद सेना ने नई रणनीति बनाई और मिशन की जिम्मेदारी 2 राजपूताना राइफल्स को सौंपी गई। बटालियन के कमांडर कर्नल रवींद्रनाथ ने मोर्चा संभाला। उन्होंने इलाके का बारीकी से अध्ययन किया, जवानों में नया जोश भरा और दुश्मन को उखाड़ फेंकने की आक्रामक योजना तैयार की।

कर्नल रवींद्रनाथ अच्छी तरह जानते थे कि दिन में हमला आत्मघाती साबित हो सकता है, इसलिए उन्होंने रात के अंधेरे में चढ़ाई का फैसला किया। जवानों को कड़ाके की ठंड, बर्फीली हवाओं और दुर्गम रास्तों के बीच बिना कोई आवाज किए दुश्मन के बंकरों तक पहुंचना था, जो अपने आप में अद्भुत साहस की मिसाल था।

12 जून की रात तोपों की गर्जना

12 जून की शाम जैसे ही अंधेरा छाया, भारतीय तोपखाने ने भीषण प्रहार शुरू कर दिया। बोफोर्स समेत 100 से ज्यादा तोपों से हजारों गोले दुश्मन के ठिकानों पर बरसाए गए। इस गोलाबारी का मकसद दुश्मन के बंकरों को कमजोर करना और उन्हें भीतर छिपने पर मजबूर करना था, ताकि भारतीय सैनिक आगे बढ़ सकें।

मेजर विवेक गुप्ता की वीरगति

तोपखाने की आड़ में मेजर विवेक गुप्ता के नेतृत्व में चार्ली कंपनी ने अंतिम चढ़ाई शुरू की। चोटी के करीब पहुंचते ही दुश्मन ने भारी फायरिंग शुरू कर दी। दो गोलियां लगने के बावजूद मेजर विवेक गुप्ता पीछे नहीं हटे, बल्कि पहले बंकर पर धावा बोलकर तीन दुश्मनों को मार गिराया और अपनी कंपनी की जीत सुनिश्चित करते हुए वीरगति प्राप्त की।

आमने-सामने की भीषण लड़ाई

जब भारतीय जवान चोटी पर पहुंच गए तो तोपों की गोलाबारी रोक दी गई और आमने-सामने की भीषण लड़ाई छिड़ गई। अंधेरे में सैनिकों ने संगीनों, छुर्रों और नंगे हाथों से दुश्मन का सामना किया। नायक दिगेंद्र कुमार ने पांच गोलियां लगने के बाद भी दुश्मन के मुख्य बंकर को ग्रेनेड से उड़ा दिया और कई दुश्मनों को ढेर कर दिया।

13 जून की सुबह फहराया तिरंगा

पूरी रात चले इस संघर्ष के बाद आखिरकार 13 जून 1999 की सुबह विजय की किरण लेकर आई। 2 राजपूताना राइफल्स के जवानों ने टोलोलिंग पर तिरंगा फहरा दिया। कर्नल रवींद्रनाथ का विजय संदेश पूरे देश के लिए गर्व का क्षण था, और वहां मिले पाकिस्तानी सैनिकों के सबूतों ने दुनिया के सामने सच्चाई उजागर कर दी।

युद्ध का सबसे बड़ा मोड़

टोलोलिंग की जीत कारगिल युद्ध का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुई। तीन हफ्तों की निराशा के बाद मिली इस सफलता ने भारतीय सेना में नया आत्मविश्वास भर दिया। इससे श्रीनगर-लेह हाईवे सुरक्षित हो गया और आगे चलकर इसी जीत की नींव पर टाइगर हिल तथा अन्य महत्वपूर्ण चोटियों पर भी तिरंगा लहराया गया।

टोलोलिंग की यह गाथा उन वीरों के साहस और बलिदान की अमर मिसाल है, जिन्होंने अपने खून से युद्ध का पासा पलट दिया। देश हमेशा इन शहीदों के शौर्य को नमन करता रहेगा और उनकी वीरता की यह कहानी आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेगी।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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