राजस्थान
एक घंटा पहले
2
विचारों
एक सदी से कायम है यह अनूठी परंपरा
देशभर में मोहर्रम के मौके पर ताजिया जुलूस निकालने की परंपरा सदियों पुरानी है, लेकिन राजस्थान के करौली जिले में एक ऐसी जगह है जहां करीब 100 साल से ताजिया नहीं निकाला गया है। हैरानी की बात यह है कि ऐसा किसी प्रशासनिक आदेश या प्रतिबंध के कारण नहीं, बल्कि दोनों समुदायों की आपसी समझ और भाईचारे के चलते हुआ है। आज भी करौली में मोहर्रम का त्योहार इसी शांतिपूर्ण तरीके से मनाया जाता है और इसे सांप्रदायिक सौहार्द का एक बड़ा उदाहरण माना जाता है।
क्यों बंद करना पड़ा ताजिया जुलूस
इस फैसले के पीछे की कहानी बेहद पुरानी और रोचक है। स्थानीय मुस्लिम समुदाय के बुजुर्ग हाफिज खलील के अनुसार, पुराने समय में करौली शहर में भी धूमधाम से ताजिया जुलूस निकाला जाता था। लेकिन लगभग एक सदी पहले एक ऐसी स्थिति बनी जिसने इस परंपरा को बदलने पर मजबूर कर दिया। उन दिनों रामलीला बाजार में ताजिया जुलूस और रामलीला का आयोजन एक ही समय पर होने के कारण दोनों समुदायों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई थी।
राजदरबार में हुआ था समाधान
विवाद को बढ़ता देख मामला तत्कालीन राजदरबार के समक्ष पहुंचा। स्थिति को संभालने के लिए दोनों समुदायों के प्रमुख प्रतिनिधियों के बीच लंबी बातचीत हुई। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य शहर की शांति और सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखना था। लंबी चर्चा के बाद सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि भविष्य में किसी भी तरह के तनाव से बचने के लिए शहर में ताजिया जुलूस नहीं निकाला जाएगा। दोनों पक्षों ने शांति और सौहार्द को प्राथमिकता देते हुए इसे खुशी-खुशी स्वीकार किया।
सामाजिक सहमति का अनूठा उदाहरण
इतिहासकारों का मानना है कि यह फैसला किसी सरकारी दवाब का परिणाम नहीं था, बल्कि यह समाज के लोगों की आपसी सूझबूझ और विश्वास की जीत थी। इस एक निर्णय ने करौली को सांप्रदायिक एकता के मामले में पूरे देश के लिए एक मिसाल बना दिया। यही कारण है कि आज इतने दशक बीत जाने के बाद भी करौली में मोहर्रम के दौरान ताजिया जुलूस की तैयारी नहीं की जाती है। स्थानीय लोग आज भी अपने पूर्वजों द्वारा लिए गए इस फैसले का पूरी निष्ठा से पालन करते हैं। करौली की यह परंपरा आज के दौर में भी समाज को एक साथ मिलकर रहने और आपसी मतभेदों को संवाद से सुलझाने की बड़ी सीख देती है।
Comments
0 comment