करौली की देसी कली का जलवा: महंगे पेंट को पछाड़कर 250 रुपये में घर को दे रही है नई चमक राजस्थान एक घंटा पहले 5
दिवाली के मौके पर राजस्थान के करौली में महंगी पेंटिंग सामग्री के बीच पारंपरिक देसी कली की मांग जोर पकड़ रही है। बेहद कम खर्च में दीवारों को आकर्षक और चमकदार बनाने के कारण ग्रामीण और शहरी, दोनों ही इलाकों में इसे पहली पसंद माना जा रहा है।

दिवाली पर क्यों बरकरार है देसी कली का क्रेज

जैसे-जैसे दिवाली का त्यौहार नजदीक आ रहा है, बाजारों में घरों को सजाने और संवारने के लिए रंग-रोगन की हलचल बढ़ गई है। आज के आधुनिक दौर में जहां बाजार तरह-तरह के महंगे ब्रांडेड डिस्टेंपर और आधुनिक पेंट से भरे पड़े हैं, वहीं राजस्थान के करौली जिले में एक पुरानी परंपरा आज भी जीवित है। यहाँ लोग अपने घरों की दीवारों को नया और आकर्षक रूप देने के लिए आज भी देसी कली पर भरोसा जता रहे हैं। यह विकल्प न केवल बजट के अनुकूल है, बल्कि इसे लगाने के बाद घरों में आने वाली सफेदी और चमक लाजवाब होती है।

महंगे पेंट के मुकाबले भारी बचत

रंगाई-पुताई के खर्चों पर गौर करें तो देसी कली एक बहुत ही किफायती सौदा साबित होती है। बाजार में उपलब्ध डिस्टेंपर की एक बाल्टी खरीदने पर उपभोक्ताओं को लगभग 1,000 रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं। इसके विपरीत, यदि कोई व्यक्ति अपनी दीवारों की पुताई के लिए देसी कली का चुनाव करता है, तो वही कार्य मात्र 250 रुपये के आसपास के बजट में पूरा हो जाता है। यही कारण है कि करौली के कई परिवार हर साल दिवाली के अवसर पर अपने घरों की दीवारों को कली से चमकाना ही पसंद करते हैं।

कैसे किया जाता है कली का विशेष उपयोग

स्थानीय निवासी और पेंट के जानकार बताते हैं कि कली को इस्तेमाल करने का तरीका भी काफी पारंपरिक और प्रभावी है। कई बार लोग इसे और भी अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए इसमें नीला रंग और फेविकोल का मिश्रण करते हैं। हालांकि, इस पुताई की चमक और मजबूती काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि मिश्रण को किस अनुपात में तैयार किया गया है और दीवार की स्थिति कैसी है। सही तरीके से लगाने पर यह दीवारों को एक ऐसी सफेदी प्रदान करती है जो देखने में काफी आकर्षक लगती है।

ग्रामीण इलाकों और पुरानी हवेलियों की पसंद

कली का इस्तेमाल केवल शहरी घरों तक ही सीमित नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी झोपड़ियों और कच्चे मकानों की पुताई के लिए कली का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है। इसके अलावा, करौली की पुरानी हवेलियों और पारंपरिक मकानों में तो आज भी कली का ही डंका बजता है। पुरानी पीढ़ी और बड़े घरों के मालिक इसे आधुनिक विकल्पों की तुलना में अधिक तरजीह देते हैं, क्योंकि यह उनके घर के मूल स्वरूप को बनाए रखने में मदद करती है।

कीट-पतंगों से भी मिलती है राहत

देसी कली का एक और बड़ा फायदा है, जो इसे केवल सौंदर्य तक सीमित नहीं रखता। स्थानीय व्यापारी गोवर्धन गुप्ता के अनुसार, कली की तासीर और उसमें मौजूद रसायनों की वजह से घरों में मच्छर, मक्खियों और अन्य कीटनाशकों का प्रकोप काफी हद तक कम हो जाता है। यही एक प्रमुख वजह है कि ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग स्वास्थ्य और साफ-सफाई के दृष्टिकोण से भी इसे सबसे ज्यादा महत्व देते हैं।

व्यापारियों का क्या है कहना

करौली के जाने-माने रंग व्यापारी राजू बंसल बताते हैं कि आज के दौर में जब हर तरफ आधुनिक उत्पादों का बोलबाला है, उसके बावजूद देसी कली की डिमांड में कोई कमी नहीं आई है। वे बताते हैं कि त्योहारों के समय बड़ी संख्या में ग्राहक कली खरीदने के लिए आते हैं। बंसल के मुताबिक, डिस्टेंपर और कली की कीमत में जो भारी अंतर है, वह आम आदमी के लिए सबसे बड़ा आकर्षण है। महज 250 रुपये खर्च करके घर की कायापलट हो जाना इस कली की उपयोगिता को सिद्ध करता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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