गांव की बेटियों ने थामी उद्यमिता की राह, IIT कानपुर के केंद्र से बनीं सफल बिजनेस वुमन, उत्पाद विदेशों तक पहुंचे उत्तर प्रदेश 2 घंटे पहले 3
आईआईटी कानपुर के रंजीत सिंह रोजी शिक्षा केंद्र से जुड़ी ग्रामीण महिलाएं बैग, हस्तशिल्प, परिधान और पॉटरी जैसे उत्पाद तैयार कर आत्मनिर्भर बन रही हैं, जिनकी बाजार में अच्छी मांग है और आय भी बढ़ी है।

कभी घर की चारदीवारी और गांव की सीमाओं तक बंधी रहने वाली कई छात्राएं और महिलाएं आज अपने हुनर के बल पर एक नई पहचान गढ़ रही हैं। इसकी सबसे मजबूत मिसाल आईआईटी कानपुर के रंजीत सिंह रोजी शिक्षा केंद्र से जुड़ी वे महिलाएं हैं, जिन्होंने न केवल आधुनिक कौशल सीखा, बल्कि रोजगार और उद्यमिता की दिशा में भी कदम बढ़ा दिए। कानपुर, कानपुर देहात, कालपी और फर्रुखाबाद के कई गांवों से आने वाली ये महिलाएं यहां तरह-तरह के बैग, हस्तशिल्प, परिधान, पॉटरी और दूसरे उत्पाद बना रही हैं। बाजार में इन उत्पादों को बेहतर पहचान मिल रही है और कई महिलाओं की आमदनी में भी इजाफा हुआ है।

सीखने का अवसर मिला तो बदल गई जिंदगी

बैजुंठपुर गांव की संतोषी बताती हैं कि गांव की लड़कियों के लिए बाहर निकलकर कुछ अलग करना कभी आसान नहीं रहा। मगर केंद्र से जुड़ने के बाद उन्हें नया हुनर सीखने को मिला और नौकरी के जरिए आमदनी भी हुई। आज वह खुद उत्पाद तैयार कर रही हैं और उनके बनाए सामान को कानपुर के साथ-साथ दूसरे शहरों में भी सराहा जा रहा है।

इसी तरह सुक्खापुरवा की रेखा ने पहले कंप्यूटर का प्रशिक्षण लिया और इसके बाद रोजी शिक्षा केंद्र से जुड़ गईं। कुछ समय नौकरी करने के बाद उन्होंने डिजाइन पर आधारित उत्पाद बनाने शुरू किए। आज वह डिजाइनरों के साथ मिलकर काम कर रही हैं और अपने हुनर से कमाई कर रही हैं।

डिजाइनरों के सहयोग से उत्पादों को नई पहचान

केंद्र की सबसे खास बात यह है कि यहां बनने वाले उत्पादों को और बेहतर तथा आकर्षक बनाने के लिए देश के नामी डिजाइनरों की मदद ली जा रही है। सामान्य दिखने वाले उत्पादों को नया डिजाइन और आधुनिक स्वरूप दिया जाता है, जिससे बाजार में उनकी मांग बढ़ जाती है।

केंद्र से जुड़ी पूजा बताती हैं कि सरकारी प्रदर्शनियों में उनके उत्पादों को खूब प्रशंसा मिली। एक प्रदर्शनी में तो कुछ ही दिनों में पूरा स्टॉक बिक गया। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा और अब वह खुद को एक सफल उद्यमी के रूप में देखती हैं।

रोजगार के साथ दूसरों को भी दे रहीं प्रशिक्षण

नानकारी की पूजा तिवारी पहले सिलाई का काम किया करती थीं। केंद्र से जुड़ने के बाद उन्होंने आधुनिक मशीनों पर विभिन्न प्रकार के बैग बनाना सीखा। आज उन्हें लगातार ऑर्डर मिल रहे हैं। इतना ही नहीं, वह गांव की दूसरी लड़कियों को भी प्रशिक्षण देकर उन्हें रोजगार से जोड़ रही हैं।

केंद्र की संस्थापक रीता सिंह कहती हैं कि उनका मकसद ऐसी महिलाओं और छात्राओं को आत्मनिर्भर बनाना है, जिनमें प्रतिभा तो भरपूर है, मगर अवसर नहीं मिल पाते। सरकारी योजनाओं, नाबार्ड और ओडीओपी जैसी पहलों के जरिए भी महिलाओं को लाभ पहुंचाया जा रहा है।

बिठूर के कुम्हारों को भी मिल रहा फायदा

रोजी शिक्षा केंद्र से बिठूर क्षेत्र के 100 से अधिक कुम्हार भी जुड़े हुए हैं। ये कारीगर मिट्टी से पॉटरी और दूसरे उत्पाद तैयार कर रहे हैं। इनके उत्पादों की बिक्री के लिए बाजार मुहैया कराया जा रहा है और कई सरकारी योजनाओं के तहत टूलकिट तथा अन्य सुविधाएं भी दी जा रही हैं।

ग्रामीण महिलाओं और कारीगरों की यह कामयाबी बताती है कि सही मार्गदर्शन और मौका मिलने पर गांवों की प्रतिभाएं भी बड़े संस्थानों तक पहुंचकर अपनी अलग पहचान बना सकती हैं। आईआईटी कानपुर का यह प्रयास आज कई परिवारों की जिंदगी संवारने का काम कर रहा है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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