उत्तर प्रदेश
एक महीने पहले
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विचारों
कानपुर की औद्योगिक नींव का अनसुना इतिहास
जब भी कानपुर के औद्योगिक विकास की चर्चा होती है, तो दिमाग में सबसे पहले चमड़ा उद्योग और विशाल टेक्सटाइल मिलों की तस्वीर आती है। हालांकि, ऐतिहासिक दस्तावेज कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। कानपुर की औद्योगिक पहचान की असली शुरुआत किसी मिल से नहीं, बल्कि एक सोडा वाटर फैक्ट्री से हुई थी। करीब दो सौ साल पहले ब्रिटिश शासन के दौरान 1830 में तत्कालीन कॉनपुर में एक सोडा वाटर मैन्युफैक्ट्री और डिस्पेंसरी की नींव रखी गई थी। यह फैक्ट्री शहर की पहली संगठित औद्योगिक इकाई के रूप में दर्ज की गई है।
कलकत्ता ईस्ट इंडिया गजट में छपा था पहला विज्ञापन
इस उद्योग का सबसे ठोस प्रमाण 9 फरवरी 1830 को प्रकाशित 'कलकत्ता ईस्ट इंडिया गजट' में मिलता है। उस समय अखबार में छपा विज्ञापन कानपुर का पहला औद्योगिक विज्ञापन माना जाता है। इस विज्ञापन के अनुसार, Bathgate, Porteous & Co. नाम की ब्रिटिश कंपनी ने इस प्लांट का संचालन किया था। कंपनी ने सार्वजनिक तौर पर घोषणा की थी कि उनकी 'मिनरल वाटर मैन्युफैक्ट्री, कॉनपुर' पूरी तरह से अपना उत्पादन शुरू कर चुकी है और इसकी गुणवत्ता की निगरानी सीधे कंपनी के एक साझेदार द्वारा की जा रही है।
दवाइयों और सोडा का अनूठा मेल
इस फैक्ट्री का कामकाज केवल सोडा तक सीमित नहीं था। कंपनी के विज्ञापन से यह जानकारी मिलती है कि वहां कई तरह के उत्पाद तैयार किए जाते थे, जिनमें शामिल थे:
- डबल एरेटेड सोडा वाटर
- मैग्नीशिया
- चेल्टनहम वाटर
- अन्य एरेटेड मिनरल वाटर
कंपनी का दावा था कि उनके उत्पाद कलकत्ता में निर्मित उत्पादों के स्तर के ही थे। इसके अलावा, उसी परिसर के भीतर एक डिस्पेंसरी भी चलाई जाती थी। वहां स्थानीय निवासियों के लिए ताजा दवाइयां, विभिन्न प्रकार की पेटेंट मेडिसिन और आधुनिक चिकित्सा उपकरण उपलब्ध कराए जाते थे। उस दौर में यह सुविधा उत्तर भारत में अपनी तरह की एक आधुनिक पहल मानी जाती थी।
री-यूज की परंपरा और वितरण प्रणाली
दिलचस्प बात यह है कि करीब दो सौ साल पहले भी आधुनिक पर्यावरण और रिसाइकल की सोच वहां मौजूद थी। विज्ञापन के मुताबिक, सोडा वाटर अलग-अलग आकारों की बोतलों में मिलता था और खाली बोतल वापस करने पर ग्राहकों को उनकी रकम लौटा दी जाती थी। इस तरह बोतलों का पुन: उपयोग (री-यूज) किया जाता था। कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया था कि डिस्पेंसरी के जरिए दवाइयां और अन्य सामान हमेशा स्टॉक में रहेगा। शहर से बाहर के ऑर्डर के लिए कंपनी ने नाव, कुली या बैलगाड़ी जैसे उपलब्ध परिवहन साधनों का उपयोग करने की बात कही थी, जिससे पता चलता है कि उस समय भी कानपुर से दूसरे क्षेत्रों में व्यापार का विस्तार था।
औद्योगिक विकास की ओर बढ़ता कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि 1830 में स्थापित यह सोडा वाटर फैक्ट्री कानपुर के सुनियोजित औद्योगिक विकास की पहली महत्वपूर्ण कड़ी बनी। इस छोटी सी शुरुआत ने आगे चलकर शहर के लिए औद्योगिक द्वार खोल दिए। इसके बाद कानपुर में बड़े पैमाने पर अन्य औद्योगिक इकाइयां लगने लगीं:
- 1859 में हारनेस फैक्ट्री की स्थापना।
- 1862 में एल्गिन मिल की शुरुआत।
- 1873 में म्योर मिल की स्थापना।
- 1876 में प्रसिद्ध लाल इमली मिल की नींव।
इन इकाइयों ने कानपुर को देश के अग्रणी औद्योगिक केंद्रों में बदल दिया। हालांकि आज समय बदल चुका है और शहर का स्वरूप काफी आधुनिक हो गया है, लेकिन 1830 की वह छोटी सी सोडा वाटर फैक्ट्री आज भी कानपुर के इतिहास में एक महत्वपूर्ण विरासत के रूप में अंकित है। इसी नींव ने आगे चलकर कानपुर को कपड़ा, चमड़ा, इंजीनियरिंग और एमएसएमई उद्योगों के क्षेत्र में देशभर में एक विशिष्ट पहचान दिलाई।
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