एक प्रणाम कई परिणाम बदल देता है, जस्टिस संजय करोल ने फेयरवेल पर पटना के अनुभव साझा किए राष्ट्रीय राजनीति एक घंटा पहले 3
सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त हो रहे जस्टिस संजय करोल ने अपने विदाई समारोह में पटना में बिताए अपने कार्यकाल को याद करते हुए जीवन और न्याय के गहरे सबक साझा किए।

पटना से मिले जीवन के अनमोल सबक

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्त हो रहे जस्टिस संजय करोल ने अपने फेयरवेल संबोधन के दौरान अपने न्यायिक करियर की यादें ताजा कीं। इस दौरान उन्होंने विशेष रूप से पटना में बिताए गए अपने समय का जिक्र किया। जस्टिस करोल के अनुसार, पटना ने उन्हें सिखाया कि एक छोटा सा सम्मान या 'प्रणाम' किस तरह से विपरीत परिस्थितियों और परिणामों को बदलने की क्षमता रखता है। उन्होंने कहा कि उनके लिए यह महज एक कहावत नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक तरीका रहा है। उन्होंने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि एक जज के रूप में उनका अनुभव सिर्फ कानूनी फाइलों और अदालती कार्यवाही तक सीमित नहीं था, बल्कि यह मानवीय संवेदनाओं को समझने का भी सफर था।

कुर्सी और जिम्मेदारी के बीच का अंतर

अपने विदाई भाषण में जस्टिस करोल ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया, 'क्या आप कुर्सी पर बैठे हैं या आप पर कुर्सी बैठी है?' उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायाधीश के पद पर आसीन होना केवल सत्ता का उपयोग करना नहीं है, बल्कि उस पद की मर्यादा और जिम्मेदारी को पूरी तरह से निभाने का नाम है। उन्होंने कहा कि पटना में रहते हुए उन्हें यह गहराई से समझ आया कि कानून के दायरे में रहकर भी आम आदमी की आवाज को कैसे सुना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि एक न्यायाधीश को हमेशा यह याद रखना चाहिए कि वह संविधान और आम नागरिकों के भरोसे का संरक्षक है। यह जिम्मेदारी उनके लिए अधिकार से कहीं अधिक बड़ी रही है।

अदालत में इंसान को देखना जरूरी

जस्टिस करोल ने जोर देकर कहा कि न्यायाधीश भगवान नहीं होते। उनसे यह अपेक्षा करना कि उनका हर फैसला शत-प्रतिशत सही होगा, व्यावहारिक नहीं है। लेकिन, एक न्यायाधीश के पास हमेशा यह अवसर होता है कि वह याचिका के पन्नों के पीछे छिपे हुए उस इंसान को देख सके, जो न्याय की उम्मीद लेकर आया है। उन्होंने बताया कि केवल कानूनी दलीलें सुनना ही काफी नहीं है, बल्कि उस व्यक्ति की पीड़ा और उसकी परिस्थितियों को समझना भी न्याय प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा है। उन्होंने अपने 40 साल के न्यायिक सफर के अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि कैसे हर मामला उनके लिए एक नई सीख लेकर आया।

संविधान केवल अदालती दस्तावेज नहीं

जस्टिस करोल के अनुसार, संविधान केवल अदालत की अलमारी में रखी हुई कोई किताब नहीं है। उन्होंने एक सरल लेकिन प्रभावी उदाहरण देते हुए कहा कि चौराहे पर तैनात एक कांस्टेबल की सीटी और उसकी लाठी में भी संविधान की आवाज छिपी होती है। उन्होंने कहा कि संविधान की असली परीक्षा हमारे रोजमर्रा के व्यवहार में होती है। हम समाज में किसी कमजोर या बेजुबान व्यक्ति के साथ कैसा बर्ताव करते हैं, यही संवैधानिक जिम्मेदारी की सबसे बड़ी कसौटी है। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे संविधान को केवल एक सरकारी दस्तावेज न मानकर उसे अपने आचरण का हिस्सा बनाएं।

युवा वकीलों के लिए विशेष संदेश

अपने विदाई भाषण में उन्होंने युवा वकीलों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि उन्हें अदालत में बेंच के सामने कभी डरना नहीं चाहिए। उन्होंने कहा, 'बेंच से डरिए मत'। जो अधिवक्ता अदालत में खड़े होकर अपनी बात रखते हैं, चाहे उनकी प्रस्तुति में सादगी हो या वे पूरी तरह से सटीक न भी बोल पाएं, वे न्यायिक व्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने युवा वकीलों को सलाह दी कि वे हमेशा निष्पक्ष रहकर अपनी तैयारी करें और पेशे में शिष्टाचार को सर्वोपरि रखें। उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था की मजबूती युवा वकीलों की ईमानदारी और उनके आत्मविश्वास पर टिकी हुई है।

बिना किसी पछतावे की विदाई

जस्टिस करोल ने 1986 में एक युवा वकील के तौर पर सुप्रीम कोर्ट के कोर्टरूम नंबर-1 में अपने प्रवेश से लेकर न्यायाधीश बनने तक की यात्रा को अत्यंत भावुकता के साथ याद किया। उन्होंने अपने सभी सहयोगियों, कोर्ट स्टाफ, बार के सदस्यों और अपने परिवार का हृदय से आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि वह इस गौरवपूर्ण सफर से बिना किसी पछतावे के विदा ले रहे हैं। उन्होंने अंत में कहा कि संविधान और आम लोगों की सेवा करने का अवसर मिलना उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान है। उन्होंने कहा कि वे उस जिम्मेदारी को पूरा करने में हमेशा अपनी पूरी निष्ठा के साथ जुड़े रहे।

न्याय में विनम्रता और माफी का स्थान

जस्टिस करोल ने एक और महत्वपूर्ण बात कही कि न्याय प्रक्रिया में विनम्रता अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि हम सभी अपने निजी जीवन में भी कई बार 'जज' की भूमिका निभाते हैं। किसी को माफ करना, किसी की प्रतिक्रिया पर तुरंत आवेश में न आना और दूसरे के साथ सम्मानजनक व्यवहार करना भी न्याय का ही एक स्वरूप है। उन्होंने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि हर व्यक्ति को अपने निर्णयों में संवेदनशीलता को शामिल करना चाहिए। इस प्रकार, उन्होंने अपने विदाई संदेश को कानून और मानवता के एक सुंदर मिश्रण के रूप में प्रस्तुत किया, जो भविष्य के सभी न्यायाधीशों और वकीलों के लिए एक प्रेरणा है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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