यूपी पुलिस पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा प्रहार, बोले जज - बेहतर है कि पुलिस विभाग को ही बंद कर दिया जाए राष्ट्रीय राजनीति 3 घंटे पहले 6
उत्तर प्रदेश पुलिस की जांच कार्यप्रणाली पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद तीखी नाराजगी जताई है। एक मामले में एफआईआर में जानबूझकर आरोपी का नाम न लिखने पर कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसी पुलिस से बेहतर है कि इसे खत्म कर दिया जाए और सभी जांच सीबीआई को सौंप दी जाए।

यूपी पुलिस की कार्यशैली पर सर्वोच्च अदालत की कड़ी टिप्पणी

उत्तर प्रदेश पुलिस की जांच प्रक्रिया और कानून व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार 30 सितंबर को बेहद तल्ख तेवर अपनाए। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच एक आपराधिक मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसके दौरान पुलिस द्वारा अपनाए गए जांच के तरीके को देखकर अदालत का पारा चढ़ गया। कोर्ट ने दो टूक शब्दों में कहा कि यदि पुलिस की कार्यप्रणाली ऐसी ही रही, तो आम जनता का तंत्र पर से विश्वास पूरी तरह खत्म हो जाएगा।

क्या है पूरा मामला और क्यों भड़के जज?

विवाद की जड़ एक ऐसी एफआईआर है, जिसमें शिकायतकर्ता ने आरोपी को खुद मौके पर पकड़कर पुलिस के सुपुर्द किया था। इसके बावजूद एफआईआर दर्ज करते समय पुलिस ने आरोपी का नाम लिखने के बजाय उसे अज्ञात करार दे दिया। कोर्ट ने इस गंभीर अनियमितता पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब आरोपी को शिकायतकर्ता ने पकड़ा था और पुलिस को सौंपा था, तो एफआईआर में उसे अज्ञात क्यों दिखाया गया? अदालत ने साफ तौर पर कहा कि यह किसी सोची-समझी साजिश या एजेंडे का हिस्सा प्रतीत होता है।

जांच में 'कवर अप' के आरोपों पर कोर्ट की नाराजगी

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस के अधिकारियों को फटकार लगाते हुए कहा कि किसी के आदेश का पालन करना एक अलग बात है, लेकिन किसी मामले को पूरी तरह से मोड़ देना या उसे छिपाने की कोशिश करना बेहद गंभीर है। कोर्ट ने जांच की प्रक्रिया को लेकर 'कवर अप जॉब' जैसे कड़े शब्दों का प्रयोग किया। कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए टिप्पणी की कि ऐसी स्थिति में तो बेहतर होगा कि उत्तर प्रदेश पुलिस को ही भंग कर दिया जाए और राज्य के सभी मामलों की जांच केंद्रीय जांच एजेंसी यानी CBI को सौंप दी जाए। हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यह उनकी मौखिक टिप्पणी थी, न कि कोई अंतिम आदेश।

एफआईआर में नाम का खेल

सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि शिकायतकर्ता ने जब खुद मोटरसाइकिल सवार आरोपी को पकड़ा था, तब पुलिस ने उसे अज्ञात लोगों की श्रेणी में रखा। बाद में जब मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा और रिपोर्ट मांगी गई, तब जाकर पुलिस के दस्तावेजों में उस व्यक्ति का नाम 'तुषार' के रूप में सामने आया। इतना ही नहीं, बाद में उस आरोपी को जांच में क्लीन चिट दे दी गई, जिस पर कोर्ट ने गहरा संदेह व्यक्त किया। कोर्ट ने जानना चाहा कि जिस व्यक्ति को मौके पर पकड़ा गया, उसे एफआईआर में अज्ञात क्यों लिखा गया और बाद में उसका नाम कैसे जुड़ा और फिर उसे क्लीन चिट कैसे मिली?

पुलिस के हलफनामे पर कोर्ट का असंतोष

उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए गए जवाब या हलफनामे से भी अदालत संतुष्ट नजर नहीं आई। बेंच ने इसे 'पूरी तरह प्रेरणाहीन' करार दिया। कोर्ट ने संबंधित पुलिस अधिकारी को अगली सुनवाई के दौरान व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया है। अदालत का कहना है कि पुलिस को एक बेहतर और तथ्यपरक हलफनामा तैयार करना होगा, जिसमें यह स्पष्ट करना होगा कि इस पूरी प्रक्रिया के दौरान नियमों की अनदेखी क्यों की गई।

मोटरसाइकिल की नंबर प्लेट और संदिग्ध बदलाव

मामले की गंभीरता तब और बढ़ गई जब शिकायतकर्ता ने कोर्ट को बताया कि जिस मोटरसाइकिल को पुलिस ने घटना के बाद जब्त किया था, उस पर उस समय कोई नंबर प्लेट मौजूद नहीं थी। लेकिन बाद में की गई जांच में उसी मोटरसाइकिल का रजिस्ट्रेशन नंबर सामने आ गया। कोर्ट ने इस विसंगति को लेकर भी पुलिस से कड़ा स्पष्टीकरण मांगा है। अदालत जानना चाहती है कि जांच के विभिन्न चरणों में रिकॉर्ड में इस तरह के बदलाव क्यों किए गए और इसके पीछे असली वजह क्या थी।

जनता का भरोसा कैसे कायम रहेगा?

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि पुलिस का काम निष्पक्ष जांच करना होता है, न कि किसी पक्ष को बचाने का एजेंडा चलाना। न्यायाधीशों ने तीखे लहजे में पूछा कि जब पुलिस खुद इस तरह की संदिग्ध कार्रवाई करेगी, तो राज्य का आम नागरिक उन पर भरोसा कैसे करेगा? कोर्ट ने कहा कि हर काम में एक विशेष एजेंडा दिखाई देना पुलिस बल की विश्वसनीयता पर बड़ा सवालिया निशान लगाता है।

अगली सुनवाई की अहमियत

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने राज्य की पूरी पुलिस व्यवस्था को भंग करने या सभी केस सीबीआई को सौंपने का कोई औपचारिक या अंतिम आदेश जारी नहीं किया है। कोर्ट ने फिलहाल संबंधित अधिकारी को जवाब देने का एक और मौका दिया है। आगामी सुनवाई में यह तय होगा कि क्या उत्तर प्रदेश पुलिस इन गंभीर सवालों का संतोषजनक जवाब दे पाती है या फिर मामला और अधिक जटिल मोड़ ले सकता है। 30 सितंबर को हुई यह सुनवाई उत्तर प्रदेश पुलिस की जांच कार्यप्रणाली के लिए एक बड़ा सबक मानी जा रही है।

चेतन तिवारी पाबना के उत्तर प्रदेश संवाददाता हैं और राज्य की राजनीति, प्रशासन तथा जमीनी मुद्दों को कवर करते हैं। लखनऊ में रहते हुए वे जिलों से लेकर विधानसभा तक की खबरें संतुलित रिपोर्टिंग के साथ पाठकों तक पहुंचाते हैं। आम लोगों के मुद्दों और स्थानीय घटनाओं पर उनका खास फोकस रहता है।

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