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3 घंटे पहले
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चंबल की बंदूकों के शोर के बीच बदली तकदीर की कहानी
मध्य प्रदेश का चंबल इलाका दशकों से बीहड़ों, बागी तेवरों और पुलिस फाइलों में दर्ज डकैतों की कहानियों के लिए चर्चा में रहा है। जब भी इस क्षेत्र का नाम लिया जाता है, तो लोगों के जेहन में बंदूकों की गूंज और खौफनाक अपराधों की तस्वीरें उभरने लगती हैं। लेकिन हाल के वर्षों में इस बदनाम बीहड़ की आबोहवा में बड़ा बदलाव आया है। अब यहां से बंदूकों की गूंज नहीं, बल्कि सफलता की गूंज सुनाई दे रही है। इसी मिट्टी से एक ऐसी प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। यह कहानी है देव प्रभाकर सिंह तोमर की, जिनके दादा कभी पुलिस के सरकारी रिकॉर्ड में 'बागी' या डकैत दर्ज थे, लेकिन आज उनके पोते ने देश की सबसे कठिन परीक्षा पास कर ली है।
देव प्रभाकर सिंह तोमर ने साबित कर दिया है कि अतीत चाहे जैसा भी हो, इंसान अपनी मेहनत और इरादों के दम पर अपना भविष्य खुद लिख सकता है। चंबल के बीहड़ों के संघर्षों से निकलकर उन्होंने पहले देश के प्रतिष्ठित संस्थान से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की, फिर विदेश में लाखों रुपये के पैकेज वाली नौकरी की। लेकिन जब देश के लिए कुछ करने का जज्बा जागा, तो उन्होंने आलीशान जिंदगी को अलविदा कह दिया और भारत लौट आए।
दादा की बागी छवि और पिता का कड़ा संघर्ष
देव प्रभाकर सिंह तोमर की सफलता के पीछे पीढ़ियों का लंबा संघर्ष और बदलाव की एक बड़ी दास्तान छिपी है। उनके दादा का सरकारी अधिकारियों के साथ कुछ गंभीर वैचारिक मतभेद और तीखे विवाद हो गए थे। इसी टकराव के कारण वह व्यवस्था की नजरों में बागी बन गए और सरकारी रिकॉर्ड में उन्हें डकैत के रूप में दर्ज कर दिया गया। उस दौर में उनके परिवार को भारी सामाजिक और आर्थिक तंगहाली का सामना करना पड़ा था। हालात इतने बदतर थे कि कई बार परिवार को दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए भी कड़ा संघर्ष करना पड़ता था।
लेकिन इस दलदल से बाहर निकलने का बीड़ा देव के पिता ने उठाया। उन्होंने पुश्तैनी गांव छोड़ने का बड़ा फैसला किया और मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में आकर बस गए। ग्वालियर में उन्होंने दिन-रात एक करके पढ़ाई की और मेहनत के दम पर एक सरकारी शिक्षक की नौकरी हासिल की। पिता की इस नौकरी से परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार होने लगा और बच्चों की शिक्षा का रास्ता साफ हुआ।
स्कूली शिक्षा और अंग्रेजी माध्यम की चुनौतियां
पिता के शिक्षक बनने के बाद देव प्रभाकर की शुरुआती पढ़ाई-लिखाई शुरू हुई। उनकी शुरुआती शिक्षा मध्य प्रदेश बोर्ड के स्कूल से हुई थी। हालांकि, बाद में बेहतर भविष्य के लिए उनका दाखिला सीबीएसई (CBSE) बोर्ड के स्कूल में करा दिया गया। अचानक हिंदी माध्यम से पूरी तरह अंग्रेजी माध्यम के माहौल में आने के कारण उन्हें शुरुआती दिनों में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। भाषा के इस बदलाव से सामंजस्य बिठाने में उन्हें कड़ी मशक्कत करनी पड़ी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी लगन से हर बाधा को पार कर लिया।
स्कूल के दिनों में जब उनके सहपाठियों ने देश के सबसे बड़े इंजीनियरिंग संस्थानों यानी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) के बारे में चर्चा की, तो देव के मन में भी वहां जाने का सपना पलने लगा। यहीं से उनके जीवन को एक नई दिशा मिली और उन्होंने कड़ी मेहनत शुरू कर दी।
IIT रोपड़ से नीदरलैंड और फिर भारत वापसी
अपनी असाधारण प्रतिभा और अटूट लगन के दम पर देव प्रभाकर ने अपने पहले ही प्रयास में जेईई (JEE) परीक्षा पास कर ली। उन्हें देश के प्रतिष्ठित संस्थान IIT रोपड़ में दाखिला मिला, जहां से उन्होंने सफलतापूर्वक बीटेक (BTech) की डिग्री हासिल की। इसके बाद उनकी प्रतिभा को देखते हुए नीदरलैंड की बहुराष्ट्रीय कंपनी फिलिप्स में उनकी शानदार नौकरी लग गई।
विदेश की आलीशान सुख-सुविधाओं और लाखों रुपये के सालाना पैकेज के बीच भी देव प्रभाकर का मन शांत नहीं था। उन्हें हमेशा अपनी मिट्टी और समाज के लिए कुछ करने की कमी खलती रहती थी। देश सेवा की इसी तड़प के कारण उन्होंने आखिरकार नीदरलैंड की अपनी आरामदायक और मोटी नौकरी को लात मार दी और भारत वापस लौट आए। भारत लौटने के बाद उन्होंने दिल्ली का रुख किया और देश की सबसे कठिन मानी जाने वाली यूपीएससी (UPSC) परीक्षा की तैयारी में जुट गए। दिल्ली में रहने और अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए उन्होंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का काम भी किया।
दो असफलताओं के बाद IRTS अधिकारी बनने का गौरव
यूपीएससी (UPSC) का यह सफर देव प्रभाकर के लिए आसान नहीं था। उन्हें शुरुआती दो प्रयासों में असफलता का मुंह देखना पड़ा। लेकिन एक सच्चे योद्धा की तरह उन्होंने इस हार से सबक लिया और दोगुनी ताकत के साथ अपनी कमियों को दूर करने में जुट गए। उनकी इस अथक मेहनत का फल उन्हें तीसरे प्रयास में मिला।
UPSC 2025 की परीक्षा में देव प्रभाकर सिंह तोमर ने ऑल इंडिया रैंक 629 हासिल की। उनकी इस शानदार सफलता ने उनके पूरे परिवार और चंबल क्षेत्र का नाम रोशन कर दिया। उनका चयन इंडियन रेलवे ट्रैफिक सर्विस (IRTS) के लिए हुआ है। वर्तमान में वह रेल मंत्रालय के तहत देश के विकास और रेलवे व्यवस्था को बेहतर बनाने में अपनी महत्वपूर्ण सेवाएं दे रहे हैं।
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