30 साल के पिंटू की अनोखी कलाकारी, सीमेंट से बनाई मूर्तियों की बिहार से झारखंड तक है भारी मांग बिहार एक महीने पहले 76
पटना के पिंटू कुमार मिट्टी के बजाय सीमेंट से मूर्तियां बनाकर अपनी अलग पहचान बना चुके हैं, जिनकी मांग अब बिहार से निकलकर झारखंड तक पहुंच गई है।

कला के जरिए बनाई अलग पहचान

किसी भी कला में अगर इंसान निपुण हो जाए तो वह उसे समाज में एक नई और खास पहचान दिला देती है। आज हम आपको पटना जिले के मसौढ़ी प्रखंड के कादिरगंज गांव के रहने वाले 30 वर्षीय पिंटू कुमार की कहानी बताने जा रहे हैं। पिंटू ने अपनी मेहनत और हुनर के दम पर सीमेंट से मूर्ति बनाने की कला को एक अलग ऊंचाई पर पहुंचाया है। उन्होंने बारहवीं कक्षा तक पढ़ाई की है, लेकिन पढ़ाई के बाद उन्होंने अपनी पुश्तैनी कला को ही अपना करियर चुना। आज उनकी बनाई मूर्तियों की मांग केवल बिहार के विभिन्न जिलों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि पड़ोसी राज्य झारखंड तक भी फैली हुई है।

सीमेंट की मूर्तियों में विशेषज्ञता

पिंटू का गांव जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। वहां कई घरों में मूर्ति बनाने का काम होता है, लेकिन पिंटू का काम अन्य कलाकारों से बिल्कुल अलग और निराला है। आमतौर पर आसपास के 15 घरों में लोग मिट्टी की प्रतिमाएं बनाते हैं, लेकिन पिंटू मिट्टी के साथ-साथ सीमेंट की मूर्तियों को गढ़ने में भी महारत हासिल कर चुके हैं। उनके कार्य की यही खासियत उन्हें बाजार में अन्य कारीगरों से अलग खड़ा करती है। वे सीमेंट से छोटी प्रतिमाओं के साथ-साथ 10 फुट तक की बड़ी और भव्य मूर्तियां भी बेहद कुशलता से तैयार करते हैं। उनके पास अभी भी 2 फीट से लेकर 5 फीट तक की कई मूर्तियां तैयार अवस्था में मौजूद रहती हैं, जो उनकी मेहनत को दर्शाती हैं।

पीढ़ियों से चला आ रहा काम

पिंटू के अनुसार, मूर्ति बनाने का यह काम उनके परिवार में दादाजी के समय से चला आ रहा है। यह उनकी पुश्तैनी कला है जिसे उन्होंने आगे बढ़ाया है। उन्होंने बताया कि पहले उनके दादाजी, फिर उनके पिताजी और अब वह खुद इस कला को संभाल रहे हैं। इस हुनर ने उन्हें समाज में एक खास पहचान दी है। पिंटू ने बताया कि उनके गांव में कुल 15 घर हैं जहां लोग मिट्टी की मूर्तियां बनाते हैं, जबकि उनके समेत कुल 2 घर ऐसे हैं जहां सीमेंट की मूर्तियों का निर्माण होता है। वे सुबह होते ही अपने काम में जुट जाते हैं और देर रात तक प्रतिमाओं को आकार देने का काम करते हैं। उनके काम की प्रशंसा आसपास के क्षेत्रों के साथ-साथ पटना, गयाजी, औरंगाबाद और अरवल जैसे जिलों में भी हो रही है, जहां से उन्हें लगातार आर्डर मिलते रहते हैं।

परिवार का मिलता है पूरा सहयोग

बचपन से ही मूर्ति कला से जुड़े रहने के कारण पिंटू का पूरा ध्यान इसी काम पर केंद्रित रहा। इसी वजह से उनकी औपचारिक शिक्षा 12वीं तक ही पूरी हो सकी। हालांकि, आज वे अपने इस हुनर के जरिए हर महीने 35,000 रुपए तक की कमाई कर लेते हैं। इस काम में उन्हें न केवल अपनी मेहनत लगानी पड़ती है, बल्कि उनके परिवार के अन्य सदस्य भी काम में उनका पूरा सहयोग करते हैं। मूर्तियों की फिनिशिंग का काम भी पिंटू खुद ही पूरी बारीकी के साथ करते हैं ताकि कलाकृति जीवंत दिखे।

मूर्तियों की मांग और आपूर्ति

पिंटू की बनाई मूर्तियों की मांग पूरे साल बनी रहती है। विशेष रूप से धार्मिक अनुष्ठानों, नई मूर्तियों की स्थापना और विभिन्न सार्वजनिक आयोजनों के समय उनके पास आर्डर की कतार लग जाती है। ग्राहक अपनी पसंद और जरूरत के अनुसार मूर्तियां बनवाने के लिए उनके पास पहुंचते हैं। अपने गांव से निकलकर झारखंड तक पहुंच चुकी उनकी कला आज क्षेत्र के अन्य युवाओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन गई है। सीमेंट की मजबूती और कला की बारीकियों के मेल ने पिंटू को न केवल आर्थिक रूप से संबल प्रदान किया है, बल्कि एक कुशल कारीगर के रूप में भी स्थापित किया है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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