जापान का ऐतिहासिक अंतरिक्ष मिशन: मंगल के चंद्रमा फोबोस से मिट्टी लाएगा MMX यान, खुलेगा ब्रह्मांड का बड़ा राज भारत एक घंटा पहले 2
जापान की स्पेस एजेंसी JAXA मंगल के चंद्रमा फोबोस से मिट्टी के नमूने लाने के लिए एक साहसी मिशन की तैयारी कर रही है। यह मिशन सौरमंडल के इतिहास और मंगल के उपग्रहों की उत्पत्ति से जुड़े अनसुलझे रहस्यों को सुलझाने में मददगार साबित होगा।

जापान रचने जा रहा है अंतरिक्ष इतिहास

अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में जापान एक बार फिर वैश्विक स्तर पर अपनी तकनीकी धाक जमाने को तैयार है। जापान की आधिकारिक स्पेस एजेंसी, जिसे जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी यानी JAXA के नाम से जाना जाता है, अब एक अत्यंत महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम कर रही है। यह मिशन किसी अन्य ग्रह की कक्षा में मौजूद चंद्रमा की सतह से मिट्टी और धूल के नमूने सीधे धरती पर लाने का है। यह विश्व का अपनी तरह का पहला मिशन होगा, जो मंगल के चंद्रमा फोबोस की मिट्टी को सुरक्षित वापस पृथ्वी पर लाएगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन नमूनों के प्रयोगशाला परीक्षण से न केवल मंगल ग्रह के अतीत का पता चलेगा, बल्कि सौरमंडल में जीवन की शुरुआत और चंद्रमाओं के बनने की प्रक्रिया पर भी नई रोशनी पड़ेगी।

क्या है जापान का महत्वाकांक्षी MMX मिशन

इस पूरे मिशन को आधिकारिक तौर पर मार्टियन मून्स एक्सप्लोरेशन यानी MMX के नाम से संबोधित किया जा रहा है। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य मंगल के चंद्रमा फोबोस तक एक अत्याधुनिक अंतरिक्ष यान को भेजना है। वहां पहुंचने के बाद, यान फोबोस की सतह का व्यापक अध्ययन करेगा और वापसी की यात्रा शुरू करने से पहले वहां की मिट्टी के नमूने संग्रहित करेगा। JAXA की योजना के अनुसार, इस पूरे मिशन को लॉन्च करने के लिए शक्तिशाली H-3 रॉकेट का उपयोग किया जाएगा। समय-सीमा की बात करें तो, यह यान साल 2027 के अगस्त महीने के आसपास मंगल के करीब पहुंचने की उम्मीद है और लगभग 2031 तक नमूनों को लेकर वापस धरती पर लौट आएगा। इस मिशन में केवल जापान ही नहीं, बल्कि फ्रांस और जर्मनी का संयुक्त रूप से विकसित इडेफिक्स रोवर भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इसके अलावा, अमेरिका और यूरोप की प्रमुख अंतरिक्ष एजेंसियां भी उपकरणों की तकनीक और संचार व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में सहयोग कर रही हैं।

मंगल के चंद्रमा और उनकी पहेली

मंगल ग्रह के दो प्राकृतिक चंद्रमा हैं, जिन्हें फोबोस और डीमोस कहा जाता है। इन दोनों की भौतिक बनावट काफी अनियमित है और देखने में ये आलू के आकार के लगते हैं। यदि हम इनकी तुलना हमारी पृथ्वी के एकमात्र चंद्रमा से करें, तो आकार के मामले में ये दोनों ही बहुत छोटे हैं। फोबोस मंगल ग्रह के काफी करीब स्थित है और एक दिन के भीतर ही यह मंगल के तीन चक्कर पूरे कर लेता है। वहीं दूसरी ओर, डीमोस मंगल से अपेक्षाकृत अधिक दूरी पर स्थित है। वैज्ञानिकों के लिए आज भी ये दोनों चंद्रमा एक अबूझ पहेली बने हुए हैं, क्योंकि इनकी उत्पत्ति कैसे हुई और इनकी संरचना में क्या कुछ खास है, यह अभी भी शोध का विषय है। यही वजह है कि उनकी मिट्टी का गहन अध्ययन अंतरिक्ष विज्ञान के भविष्य के लिए बेहद जरूरी माना जा रहा है।

क्या है चंद्रमाओं के अस्तित्व का रहस्य

ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो 1960 के दशक से अब तक मंगल ग्रह के लिए दर्जनों मिशन भेजे जा चुके हैं, लेकिन इसके चंद्रमा आज भी रहस्य के घेरे में हैं। ग्रीक पौराणिक कथाओं में फोबोस और डीमोस को डर और आतंक का प्रतीक माना गया है, जो युद्ध के देवता एरेस के पुत्र हैं। रोचक बात यह है कि रोमन संस्कृति में एरेस का समकक्ष मंगल है। फोबोस पर लैंडिंग करने की रूस ने भी पूर्व में कई कोशिशें की थीं, लेकिन वे सभी नाकाम रहीं, जिनमें 2011 में किया गया प्रयास भी शामिल है। फोबोस और डीमोस की उत्पत्ति के संबंध में वैज्ञानिकों के बीच दो प्रमुख सिद्धांत प्रचलित हैं। पहला सिद्धांत यह कहता है कि किसी विशाल खगोलीय पिंड के मंगल से टकराने के बाद जो मलबा निकला, उसी से इन दोनों चंद्रमाओं का निर्माण हुआ। यदि यह सिद्धांत सही है, तो फोबोस की मिट्टी में मंगल के पदार्थ के अंश निश्चित रूप से मिलेंगे। दूसरा सिद्धांत यह है कि ये चंद्रमा असल में क्षुद्रग्रह (एस्टेरॉयड) हैं, जो सौरमंडल के किसी अन्य क्षेत्र से आकर मंगल के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव में फंस गए और उसकी परिक्रमा करने लगे। MMX मिशन इन दोनों संभावनाओं की स्पष्ट जांच कर पाएगा।

मिट्टी इकट्ठा करने की अनोखी तकनीक

मिशन का लक्ष्य फोबोस की सतह से कम से कम 10 ग्राम मिट्टी के नमूने एकत्र करना है। इसके लिए दो वैज्ञानिक तकनीकों का सहारा लिया जाएगा। पहली तकनीक में अमेरिकी उपकरण का इस्तेमाल होगा, जो दबाव वाली गैस की मदद से सतह की धूल को एक सुरक्षित कंटेनर में भर देगा। दूसरी तकनीक के तहत जापानी उपकरण मिट्टी के भीतर लगभग दो सेंटीमीटर गहराई तक जाकर नमूने जुटाएगा। इन नमूनों को एक विशेष कैप्सूल में रखा जाएगा। इस कैप्सूल की बनावट ऐसी है कि जब यह पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करेगा, तो भीषण गर्मी और घर्षण से अंदर मौजूद नमूनों को सुरक्षित रखा जा सके। निर्धारित योजना के अनुसार, यह कैप्सूल ऑस्ट्रेलिया की जमीन पर उतरेगा, जहां से इन्हें सुरक्षित रूप से जापान लाया जाएगा।

फोबोस पर उतरने की चुनौतियां

फोबोस पर उतरना किसी भी अन्य खगोलीय पिंड की तुलना में बहुत कठिन है, क्योंकि वहां का गुरुत्वाकर्षण बल पृथ्वी की तुलना में लगभग 2,000 गुना कम है। कम गुरुत्वाकर्षण वाली सतह पर यान को स्थिर रखना वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी चुनौती है। उतरते समय यान के लड़खड़ाने का खतरा बना रहता है, इसीलिए MMX के लैंडिंग मॉड्यूल में झटके सोखने वाले चार मजबूत पैरों वाला सिस्टम लगाया गया है। यहां तक कि रोवर को भी इस तरह से डिजाइन किया गया है कि यदि वह कम गुरुत्वाकर्षण में पलट भी जाए, तो वह खुद को फिर से सीधा कर सके।

मानव मिशन के लिए क्यों जरूरी है यह अभियान

यह मिशन केवल वैज्ञानिक जिज्ञासा तक सीमित नहीं है। अमेरिका, चीन और दुनिया के अन्य उन्नत देश मंगल पर भविष्य में मानव मिशन भेजने की दिशा में काम कर रहे हैं। ऐसे में यह समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि क्या मंगल के चंद्रमाओं का उपयोग भविष्य में मानव अभियानों के लिए एक पड़ाव, बेस स्टेशन या संचालन केंद्र के रूप में किया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि जून 2025 में जापान की एक निजी कंपनी आईस्पेस द्वारा भेजा गया लैंडर चंद्रमा पर उतरते समय दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। उस मिशन को विफल घोषित करना पड़ा था क्योंकि कंट्रोलर्स के तमाम प्रयासों के बावजूद लैंडर से संपर्क पूरी तरह टूट गया था। उस अनुभव से सीख लेते हुए MMX मिशन की सफलता जापान के लिए एक बड़ी उपलब्धि साबित होगी।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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