जयपुर में चिकित्सा का चमत्कार: महज 7.5 किलो वजनी 4 साल की बच्ची का सफल लिवर ट्रांसप्लांट राजस्थान एक घंटा पहले 3
जयपुर के महात्मा गांधी अस्पताल में डॉक्टरों की टीम ने 4 साल की एक बच्ची का सफल लिवर ट्रांसप्लांट कर नया जीवन दिया है। बेहद कम वजन और आनुवंशिक बीमारी से जूझ रही बच्ची के लिए उसकी मां ने लिवर का हिस्सा दान किया।

राजस्थान में चिकित्सा इतिहास की एक नई उपलब्धि

राजधानी जयपुर स्थित महात्मा गांधी अस्पताल में चिकित्सा विज्ञान ने एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। यहां विशेषज्ञों की एक टीम ने 4 साल की एक बच्ची का सफल लिवर ट्रांसप्लांट किया है। इस ऑपरेशन की सबसे बड़ी चुनौती बच्ची का बेहद कम वजन था, जो केवल 7.5 किलो था। चिकित्सा जानकारों के अनुसार, यह उपलब्धि राजस्थान में अब तक की सबसे कम उम्र की सॉलिड ऑर्गन ट्रांसप्लांट प्राप्तकर्ता के रूप में दर्ज की गई है। यह सर्जरी न केवल चुनौतीपूर्ण थी, बल्कि इसने एक गंभीर आनुवंशिक बीमारी से जूझ रही बच्ची को नया जीवन दिया है।

दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी से लड़ रही थी बच्ची

बच्ची जिस गंभीर समस्या का सामना कर रही थी, उसे चिकित्सा भाषा में प्रोग्रेसिव फैमिलियल इंट्राहेपेटिक कोलेस्टासिस के नाम से जाना जाता है। महात्मा गांधी अस्पताल के सेंटर फॉर डाइजेस्टिव साइंसेज के चेयरमैन, प्रोफेसर और एचपीबी सर्जरी व लिवर ट्रांसप्लांटेशन विभागाध्यक्ष डॉ. नैमिष एन मेहता ने इस बीमारी की गंभीरता को समझाते हुए बताया कि यह एक आनुवंशिक विकार है। इसमें लिवर शरीर में बनने वाले पित्त यानी बाइल को ठीक तरह से बाहर नहीं निकाल पाता है। परिणामस्वरूप, बाइल साल्ट शरीर में जमा होने लगते हैं, जो धीरे-धीरे लिवर को अंदर से पूरी तरह नष्ट कर देते हैं।

इस बीमारी के कारण बच्ची का शारीरिक विकास लगभग थम चुका था। उसे शरीर में असहनीय खुजली होती थी, जिसके चलते वह रात भर सो नहीं पाती थी। लगातार पीलिया और लिवर में सिरोसिस विकसित हो जाने के कारण उसकी स्थिति दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी। लंबे समय से उसके माता-पिता इलाज की आस में विभिन्न अस्पतालों के चक्कर काट रहे थे। जब बच्ची की स्थिति नाजुक हो गई, तो डॉक्टरों ने लिवर ट्रांसप्लांट को ही उसके बचने का एकमात्र रास्ता माना।

मां का बलिदान और चुनौती भरी सर्जरी

बेटी की जान बचाने के लिए उसकी मां आगे आईं और स्वेच्छा से अपने लिवर का एक हिस्सा उसे दान करने का निर्णय लिया। डॉ. नैमिष एन मेहता ने स्वीकार किया कि 7.5 किलो वजन वाली बच्ची में ट्रांसप्लांट करना बहुत जोखिम भरा कार्य था। बच्ची की लिवर से जुड़ी रक्त वाहिनियां बहुत ही सूक्ष्म थीं, जिन्हें आपस में जोड़ने के लिए टीम को अत्याधुनिक माइक्रोसर्जिकल तकनीक का सहारा लेना पड़ा। इस दौरान बाल के समान बारीक धागों से टांके लगाए गए, ताकि रक्त वाहिनियां सही ढंग से जुड़ सकें।

इसके अलावा, बच्ची के शरीर में रक्त की मात्रा बहुत कम थी, जिसके कारण सर्जरी के दौरान थोड़ी सी भी लापरवाही या अधिक रक्तस्राव जानलेवा साबित हो सकता था। डोनर यानी मां से लिए गए लिवर का सही आकार काटना और उसे बच्ची के छोटे से शरीर में पूरी तरह से व्यवस्थित करना डॉक्टरों के लिए बड़ी परीक्षा थी।

आईसीयू में गहन निगरानी और सफल रिकवरी

सफलतापूर्वक सर्जरी होने के बाद भी खतरा टला नहीं था। इसके लिए अस्पताल के पीडियाट्रिक आईसीयू ने बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पीडियाट्रिक आईसीयू निदेशक डॉ. रूप शर्मा और उनकी विशेषज्ञ टीम ने बच्ची की गहन देखभाल की जिम्मेदारी उठाई। उनकी टीम ने निरंतर बच्ची के सांस लेने की गति, रक्त संचार, संक्रमण के खतरे और पोषण पर बारीकी से नजर रखी।

ट्रांसप्लांट के बाद मिली सूचना के मुताबिक, बच्ची अब स्वस्थ है और उसका नया लिवर सामान्य रूप से काम कर रहा है। उसकी पुरानी शिकायत जैसे तेज खुजली अब पूरी तरह खत्म हो गई है और उसका खानपान भी सामान्य हो गया है। डॉक्टरों को पूरी उम्मीद है कि बीमारी के कारण रुका हुआ उसका शारीरिक विकास अब तेजी से होगा और वह भविष्य में एक सामान्य जीवन जी सकेगी। अस्पताल प्रशासन ने भी इस उपलब्धि पर पूरी टीम की प्रशंसा की है।

टीम और विशेषज्ञता का योगदान

महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी के चेयरपर्सन डॉ. विकास चंद्र स्वारंकर ने पूरी मेडिकल टीम को बधाई दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि संस्थान वयस्कों के साथ-साथ अब बच्चों के लिए भी विश्वस्तरीय लिवर ट्रांसप्लांट सुविधाएं प्रदान कर रहा है। डॉ. नैमिष एन मेहता के कुशल नेतृत्व में अब तक अस्पताल में 8 पीडियाट्रिक लिवर ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक संपन्न किए जा चुके हैं।

इस जटिल प्रक्रिया में योगदान देने वाली टीम में शामिल प्रमुख सदस्य निम्नलिखित हैं:

  • एचपीबी सर्जरी और ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ: डॉ. विनय कुमार महला, डॉ. देवेंद्र चौधरी और डॉ. अनिल कुमार गुप्ता।
  • पीडियाट्रिक इंटेंसिविस्ट: डॉ. रूप शर्मा और डॉ. दिव्या चौधरी।
  • पीडियाट्रिक गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट: डॉ. गौरव अग्रवाल।
  • एनेस्थीसिया विशेषज्ञ: डॉ. गौरव गोयल और डॉ. कौशल बघेल।

इन विशेषज्ञों के अलावा, ऑपरेशन थिएटर के पूरे स्टाफ और सहयोगी नर्सों ने भी इस मिशन को सफल बनाने में अपना योगदान दिया। 4 साल की बच्ची की यह कहानी साहस और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के मेल का एक बेहतरीन उदाहरण है, जिसने एक परिवार को खुशियां वापस लौटाई हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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