ISRO का निजीकरण नहीं होगा, एजेंसी ने अफवाहों को नकारा, साझा किया 2035 और 2040 का बड़ा रोडमैप राष्ट्रीय राजनीति एक घंटा पहले 5
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने स्पष्ट किया है कि उसके निजीकरण की खबरें पूरी तरह से आधारहीन हैं और वह भविष्य के बड़े मिशनों पर काम जारी रखेगा। एजेंसी ने भारत की स्पेस इकोनॉमी को 2033 तक 44 बिलियन डॉलर तक ले जाने के लिए प्राइवेट कंपनियों के साथ तालमेल बिठाने की रणनीति स्पष्ट की है।

अफवाहों पर इसरो ने लगाई लगाम

हाल ही में सोशल मीडिया पर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के निजीकरण और उसके अस्तित्व को लेकर कई तरह की भ्रामक जानकारियां फैल रही थीं। इन अफवाहों में दावा किया जा रहा था कि इसरो की भूमिका कम की जा रही है और उसे किसी निजी कंपनी को बेचने की तैयारी है। इन दावों ने लोगों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा कर दी थी। हालांकि, अब इसरो ने खुद सामने आकर इन सभी दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। स्पेस एजेंसी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि न तो इसरो बिक रहा है और न ही उसकी ताकत या दबदबा कम होने वाला है। भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम इसरो के नेतृत्व में ही आगे बढ़ता रहेगा और एजेंसी भविष्य के महत्वाकांक्षी मिशनों के लिए पूरी तरह तैयार है।

एक्स पर दिया करारा जवाब

इसरो ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर इन बेबुनियाद खबरों की धज्जियां उड़ाते हुए कहा कि इस तरह की चर्चाओं में कोई सच्चाई नहीं है। इसरो भारत के अंतरिक्ष अभियानों का मुख्य आधार बना रहेगा। एजेंसी ने साफ किया है कि निजीकरण की बातें पूरी तरह से मनगढ़ंत हैं। इसरो का काम काज पहले की तरह ही चलेगा, बल्कि आने वाले समय में यह और भी बड़े लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करने जा रहा है। सरकार एक ऐसे इसरो-केंद्रित राष्ट्रीय अंतरिक्ष इकोसिस्टम का निर्माण कर रही है, जो भारत को वैश्विक स्तर पर अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक महाशक्ति के रूप में स्थापित करेगा।

काम का बंटवारा और नई रणनीति

वास्तव में सरकार की योजना इसरो की कार्यप्रणाली में बदलाव की है, ताकि वह नई और कठिन तकनीकों पर अपना पूरा ध्यान लगा सके। इसरो की रणनीति के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • तकनीकी हस्तांतरण: जो प्रौद्योगिकियां इसरो पहले ही पूरी तरह से विकसित और प्रमाणित कर चुका है, जैसे कि सामान्य उपग्रह और पुराने लॉन्च व्हीकल, उनका बड़े पैमाने पर उत्पादन अब निजी कंपनियों, स्टार्टअप्स और सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा किया जाएगा।
  • सीमित भूमिका में विस्तार: सामान्य कार्यों को निजी क्षेत्र को सौंपने से इसरो के वैज्ञानिकों के पास नई और अत्याधुनिक शोध के लिए अधिक समय और संसाधन उपलब्ध होंगे।
  • सुरक्षा और स्वायत्तता: राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित महत्वपूर्ण और संवेदनशील परियोजनाओं की जिम्मेदारी पूरी तरह से सरकार और इसरो के हाथों में ही बनी रहेगी।

भविष्य के महाप्लान: 2035 और 2040

अब इसरो का मुख्य उद्देश्य ऐसी तकनीकों पर काम करना है जो अभी तक भारत के लिए चुनौती बनी हुई हैं। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:

  • भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन: इसरो का लक्ष्य 2035 तक देश का अपना अंतरिक्ष स्टेशन तैयार करना है।
  • चंद्र मिशन: वर्ष 2040 तक भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित उतारने का महात्वाकांक्षी लक्ष्य रखा गया है।
  • डीप स्पेस एक्सप्लोरेशन: मंगल और शुक्र ग्रह जैसे सुदूर अंतरिक्ष मिशनों और भविष्य के लिए जरूरी री-यूजेबल लॉन्च व्हीकल तकनीक पर एजेंसी काम कर रही है।

स्पेस इकोनॉमी का 44 बिलियन डॉलर का लक्ष्य

भारत की स्पेस इकोनॉमी का विस्तार तेजी से हो रहा है। वर्तमान में यह 8.4 बिलियन डॉलर की है, जिसे 2033 तक 44 बिलियन डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इतने बड़े लक्ष्य को केवल इसरो के मौजूदा संसाधनों से हासिल करना चुनौतीपूर्ण है, इसलिए निजी क्षेत्र की भागीदारी अनिवार्य है। साल 2020 में जहां देश में बहुत कम अंतरिक्ष स्टार्टअप थे, वहीं आज इनकी संख्या बढ़कर 450 से अधिक हो गई है। यह स्पष्ट है कि निजी कंपनियां इसरो का स्थान नहीं ले रही हैं, बल्कि वे एक सहयोगी की भूमिका में आकर भारत को अंतरिक्ष के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों पर ले जाने का काम कर रही हैं। यह साझेदारी भारत को एक वैश्विक स्पेस सुपरपावर बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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