नेपाल में प्रलय: मलबे और कीचड़ के बीच देवदूत बनी भारतीय सेना, अत्यंत कठिन परिस्थितियों में चलाया जा रहा रेस्क्यू ऑपरेशन विश्व एक दिन पहले 5
नेपाल में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन के बाद मची तबाही के बीच भारतीय सेना के जवान नेपाली सुरक्षा बलों के साथ मिलकर बेहद खतरनाक और जोखिम भरे इलाकों में लगातार राहत एवं बचाव अभियान चला रहे हैं।

पड़ोसी देश नेपाल इस समय प्रकृति के भीषण प्रकोप का सामना कर रहा है। यहाँ आई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन ने तबाही के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं, जिससे जान गंवाने वाले लोगों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रही है। आपदा प्रभावित क्षेत्रों में स्थिति इस कदर विकट हो चुकी है कि अब तक 1 हजार से ज्यादा लोगों की मौत की पुष्टि की जा चुकी है। इस भयावह प्राकृतिक आपदा के बाद लोगों की जान बचाने के लिए युद्ध स्तर पर रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया जा रहा है। इस महा-अभियान में नेपाल के करीब 20 हजार जवान और 20 से ज्यादा हेलीकॉप्टर दिन-रात जुटे हुए हैं। हालांकि, स्थिति अभी भी नियंत्रण से बाहर है क्योंकि मलबे और कीचड़ के नीचे अब भी 5 हजार से अधिक लोग लापता बताए जा रहे हैं। लापता लोगों को ढूंढने के लिए नेपाल की सेना, पुलिस और सशस्त्र बल अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं। इस संकट की घड़ी में भारतीय सेना के जांबाज जवान भी देवदूत बनकर नेपाली फौज के साथ कंधे से कंधा मिलाकर इस बेहद कठिन रेस्क्यू ऑपरेशन को अंजाम दे रहे हैं।

भूगोलीय विषमताओं के कारण रेस्क्यू ऑपरेशन में आ रहीं बाधाएं

नेपाल में जारी राहत कार्यों में सबसे बड़ी चुनौती वहां की अत्यंत जटिल और संवेदनशील भौगोलिक स्थिति बनी हुई है। हिमालय की दुर्गम पर्वत श्रृंखलाओं के बीच बसे नेपाल में चारों तरफ केवल खड़ी पहाड़ियां और गहरी संकरी घाटियां हैं, जिससे बचाव दल को कदम-कदम पर दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। विशेष रूप से रसुवा और नुवाकोट जैसे पहाड़ी जिले, जो त्रिशूली और भोटे कोशी नदियों की बेहद तंग घाटियों में स्थित हैं, वहां हालात सबसे ज्यादा नाजुक हैं।

बाढ़ के बाद इन संकरी घाटियों के दोनों ओर मौजूद खड़ी ढलानें बेहद अस्थिर हो गई हैं और वहां लगातार लैंडस्लाइड हो रहा है। ऐसे संवेदनशील माहौल में राहत सामग्री पहुंचाने और घायलों को एयरलिफ्ट करने के लिए हेलीकॉप्टर का उपयोग करना भी जान जोखिम में डालने जैसा है। पहाड़ी ढलानों और मलबे से पटे होने के कारण हेलीकॉप्टर को लैंड कराने के लिए समतल जगह ही नहीं मिल पा रही है। स्थिति इतनी गंभीर है कि प्रभावित इलाके पूरी तरह से नो लैंडिंग जोन में तब्दील हो चुके हैं।

लांगथांग और चिलिमे जैसे क्षेत्रों में अब ऐसा कोई भी मजबूत या पक्का स्ट्रक्चर नहीं बचा है, जहां हेलीकॉप्टर को सुरक्षित उतारा जा सके। जिन मैदानी या समतल हिस्सों में थोड़ी जगह बची भी है, वहां लगभग 10 से 15 फीट तक दलदली कीचड़ जमा हो चुका है। ऐसे अत्यधिक जोखिम भरे हालातों में हेलीकॉप्टर के पायलटों को हवा में ही मशीन को स्थिर रखना पड़ता है और सेना के वीर जवान रस्सियों के सहारे नीचे जमीन पर उतर रहे हैं। इस जानलेवा खतरे के बावजूद बचाव कार्य की गति बढ़ाने के लिए पहले इस्तेमाल किए जा रहे 14 हेलीकॉप्टरों की संख्या को बढ़ाकर अब सेना और निजी ऑपरेटरों द्वारा 16 से 20 हेलीकॉप्टर्स कर दिया गया है।

सुरंगों के भीतर भारतीय सेना का साहसिक अभियान

भारतीय सेना न केवल हवाई मार्ग से बल्कि जमीन के भीतर चल रहे सबसे खतरनाक ऑपरेशनों में भी अग्रणी भूमिका निभा रही है। भारतीय सेना की एक विशेष 24 सदस्यीय टनल रेस्क्यू टीम नेपाल में तैनात की गई है, जो दो अलग-अलग यूनिटों में विभाजित होकर काम कर रही है। भारतीय सैनिक वर्तमान में नेपाल के चिलिमे और लांगटांग हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट साइटों पर नेपाली सेना के साथ संयुक्त रूप से टनल रेस्क्यू ऑपरेशन चला रहे हैं।

सुरंगों के भीतर बचाव कार्य की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मलबे और गाद के कारण सुरंगों के अंदर मिट्टी इस कदर ठसाठस भर गई है, जैसे किसी ट्यूब के भीतर टूथपेस्ट भरा हो। ड्रोन की मदद से स्थिति का जायजा लेने वाले विशेषज्ञों ने भी इस बात की पुष्टि की है। काठमांडू में मौजूद प्रवक्ता और पब्लिक डिप्लोमेसी डिवीजन के प्रमुख लोक बहादुर छेत्री ने बताया कि जमीन के नीचे चल रहे इस तरह के अति-संवेदनशील और उच्च जोखिम वाले ऑपरेशनों को सुरक्षित रूप से पूरा करने के लिए लक्षित अंतर्राष्ट्रीय तकनीकी विशेषज्ञता का सहारा लिया जा रहा है।

इसके अतिरिक्त, भारत की ओर से नेपाल को बेली ब्रिज की निरंतर आपूर्ति की जा रही है ताकि बाढ़ में नष्ट हो चुके पुलों की जगह इन्हें तुरंत स्थापित कर संपर्क मार्गों को दोबारा बहाल किया जा सके। भारत अब तक 4 अलग-अलग खेपों के जरिए नेपाल को 68.5 टन से अधिक की भारी राहत और बचाव सामग्री भेज चुका है।

फॉरेंसिक विशेषज्ञों और डॉक्टरों की टीम नेपाल रवाना

प्राकृतिक आपदा की इस विभीषिका के बीच नेपाल के सामने एक और गंभीर संकट खड़ा हो गया है। इतने बड़े पैमाने पर मिल रहे शवों को सुरक्षित रखने के लिए नेपाल के पास पर्याप्त संख्या में 'फ्रीजर यूनिट्स' उपलब्ध नहीं हैं। इसके अलावा, शवों की शिनाख्त सुनिश्चित करने के लिए तत्काल आवश्यक DNA टेस्टिंग किट्स की भी वहां भारी कमी महसूस की जा रही है।

इस गंभीर मानवीय संकट को देखते हुए भारत सरकार ने तुरंत नेपाल की सहायता के लिए कदम बढ़ाए हैं। भारत ने विशेष रूप से DNA प्रोफाइलिंग और फॉरेंसिक जांच के काम में मदद करने के लिए 18 से 19 फॉरेंसिक विशेषज्ञों और डॉक्टरों की एक उच्च स्तरीय टीम को नेपाल भेजा है, जो वहां के स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर इस चुनौतीपूर्ण कार्य को पूरा करने में जुटी हुई है।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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