FCRA संशोधन बिल को लेकर फैल रही अफवाहों पर अमेरिका में भारतीय राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने दी सफाई, जानिए क्या है हकीकत भारत एक घंटा पहले 2
भारत सरकार द्वारा प्रस्तावित FCRA संशोधन बिल को लेकर चल रही गलतफहमियों पर अमेरिका में भारतीय राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने विस्तार से स्पष्टीकरण दिया है। उन्होंने साफ किया कि यह बिल किसी धर्म को निशाना नहीं बनाता, बल्कि पारदर्शिता और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक आवश्यक कदम है।

FCRA संशोधन बिल पर जारी है चर्चा

भारत सरकार इन दिनों संसद में फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन अमेंडमेंट बिल, जिसे संक्षिप्त में FCRA संशोधन बिल के नाम से जाना जाता है, लाने की प्रक्रिया में जुटी है। इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य विदेश से प्राप्त होने वाले धन का प्रबंधन बेहतर बनाना और इसके उपयोग में पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। हालांकि, इस प्रस्तावित बिल के सामने आते ही कई तरह की भ्रामक जानकारियां और अफवाहें भी सोशल मीडिया व अन्य मंचों पर तैरने लगी हैं। इन अफवाहों के कारण न केवल भारत में बल्कि विदेशों में रह रहे लोगों के बीच भी चिंता का माहौल है, और कुछ ईसाई संगठनों ने भी इस पर अपनी असहमति जताई है। इन परिस्थितियों को देखते हुए अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने इस मुद्दे पर चुप्पी तोड़ी है और बिल से जुड़ी सच्चाइयों को विस्तार से रखा है।

मिथक और हकीकत की पड़ताल

अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के माध्यम से इस विषय पर स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन अमेंडमेंट बिल 2026 को लेकर मीडिया और नागरिक समाज के बीच कई तरह की गलतफहमियां मौजूद हैं। उन्होंने मिथक बनाम हकीकत के जरिए यह बताया है कि असल में यह कानून क्या है। उन्होंने कई पोस्ट की एक श्रृंखला के जरिए बताया कि कैसे यह बिल देश के हित में काम करेगा।

दुनिया भर में मौजूद है ऐसा कानून

अक्सर यह दावा किया जाता है कि भारत अन्य देशों से बिल्कुल अलग हटकर ऐसा कानून ला रहा है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। हालांकि, हकीकत यह है कि विदेशी धन के नियमन के लिए ऐसा कानून दुनिया के कई देशों में पहले से ही प्रभावी है। अमेरिका में 1938 से FARA और 2010 से FATCA जैसा कानून मौजूद है। इसी प्रकार, ऑस्ट्रेलिया ने 2018 में, कनाडा ने 2024 में और यूनाइटेड किंगडम ने जुलाई 2025 में अपनी योजनाएं लागू की हैं। यूरोपीय संघ भी इसी दिशा में कानून बना रहा है। राजदूत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह बिल किसी खास धर्म या समुदाय को लक्षित नहीं करता। यह कानून हर उस संगठन पर समान रूप से लागू होता है, चाहे उनका धर्म, पंथ या विचारधारा कुछ भी हो। धार्मिक शिक्षा, पूजा स्थलों का रखरखाव और अन्य सभी आस्था-आधारित कल्याणकारी गतिविधियों के लिए विदेशी चंदा पहले की तरह ही प्राप्त किया जा सकेगा।

एनजीओ की संपत्ति और सुरक्षा का सच

एक बड़ी अफवाह यह है कि यह नया कानून विदेशी दान पर निर्भर एनजीओ की संपत्तियों को जब्त करने के लिए तैयार किया गया है। इसमें अस्पताल, स्कूल, धार्मिक स्थल और चैरिटेबल संस्थानों के नाम लिए जा रहे हैं। वास्तविकता यह है कि भारत हमेशा से अंतरराष्ट्रीय भागीदारी का स्वागत करता रहा है। कानून यह सुनिश्चित करता है कि विदेशी चंदा एक कानूनी ढांचे के भीतर आए और उसका उपयोग सही तरीके से हो। यदि किसी संस्थान का पंजीकरण रद्द या सरेंडर होता है, तो उसका विदेशी चंदा और उससे निर्मित संपत्ति राज्य सरकार के नियंत्रण में जाने का प्रावधान वर्ष 2010 से ही मौजूद है। यह कोई नई बात नहीं है। 2026 का बिल इन संपत्तियों की सुरक्षा के लिए एक स्पष्ट प्राधिकरण और तरीका निर्धारित करता है। यदि कोई संगठन दोबारा पंजीकरण करवाता है, तो सभी संपत्तियां और फंड वापस कर दिए जाते हैं। पूजा स्थलों की स्थिति में, यदि कोई संपत्ति किसी ऐसे संगठन से जुड़ी है जिसका पंजीकरण रद्द हुआ है, तो उस संपत्ति को उसी धर्म के किसी अन्य FCRA पंजीकृत संगठन को दे दिया जाता है ताकि धार्मिक कार्य बिना बाधा के चलते रहें।

एनजीओ के काम पर नहीं पड़ेगा नकारात्मक प्रभाव

यह भी कहा जा रहा है कि इस बिल के कारण एनजीओ और चैरिटेबल संगठनों के कामकाज पर बुरा असर पड़ेगा, लेकिन आंकड़े कुछ और ही बयां करते हैं। भारत में आने वाला विदेशी धन कम नहीं हुआ है, बल्कि उसमें निरंतर बढ़ोतरी देखी गई है। साल 2010-11 में पंजीकृत संगठनों को लगभग 1.2 बिलियन डॉलर का विदेशी फंड मिला था, जो 2024-25 तक बढ़कर 2.67 बिलियन डॉलर हो गया है। भारत में 3 मिलियन से अधिक एनजीओ काम कर रहे हैं, जिनमें से केवल 14,450 के पास ही FCRA पंजीकरण है। स्पष्ट है कि अधिकांश नागरिक समाज संगठन इस अधिनियम के दायरे से बाहर हैं। FCRA किसी भी संस्थान को विदेशी अनुदान, मानवीय मदद या रिसर्च ग्रांट लेने से नहीं रोकता है। केवल तीन शर्तें जरूरी हैं- सही तरीके से पंजीकरण, निर्धारित प्रक्रिया से धन प्राप्त करना और उसका पूरा हिसाब-किताब या रिपोर्ट देना।

राष्ट्रीय सुरक्षा का है मामला

राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने साफ किया कि FCRA विदेशी मदद को रोकने का साधन नहीं है। यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए उठाया गया है, जो दुनिया भर की लोकतांत्रिक सरकारों का एक स्वीकृत हिस्सा है। भारत में पहला FCRA कानून 1976 में आया था, जिसे 2010 में और अधिक आधुनिक बनाया गया। वर्ष 2016 और 2018 में किए गए बदलावों ने इसे और प्रभावी बनाया, और 2026 का यह बिल उसी विकासवादी प्रक्रिया का हिस्सा है। अंततः, यह कानून पारदर्शिता लाने और प्रशासन को बेहतर बनाने के लिए है। यह उन सभी संगठनों के लिए मददगार है जो नियमों का पालन करते हुए स्वास्थ्य, शिक्षा और आपदा राहत जैसे क्षेत्रों में विदेशी फंड के जरिए जनकल्याण का कार्य कर रहे हैं।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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