धान की फसल में पत्तियों का पीला पड़ना और सफेद धब्बे हैं खतरनाक, किसान तुरंत उठाएं ये कदम भारत 2 घंटे पहले 3
गोंडा जिले में धान की फसलों में पीलापन और सफेद धब्बों की समस्या देखी जा रही है, जिसे लेकर कृषि विशेषज्ञों ने उचित खाद प्रबंधन और वैज्ञानिक सलाह के आधार पर उपचार करने की सलाह दी है।

फसल में पीलापन और सफेद धब्बों से कैसे निपटें

उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के किसानों के लिए इन दिनों धान की खेती एक बड़ी चिंता का विषय बन गई है। खेतों में धान की पत्तियां पीली पड़ रही हैं और उन पर अजीब से सफेद धब्बे उभर रहे हैं। अगर किसान इस समस्या को नजरअंदाज करते हैं, तो यह न केवल पौधे के विकास को रोक सकती है, बल्कि भविष्य में पैदावार में भारी गिरावट का कारण भी बन सकती है। कृषि वैज्ञानिक डॉ. अंकित तिवारी के अनुसार, किसानों को घबराने के बजाय सही समय पर समस्या के मूल कारणों का पता लगाकर उनका वैज्ञानिक तरीके से समाधान करना चाहिए।

समस्या के संभावित कारण

कृषि वैज्ञानिक डॉ. अंकित तिवारी ने स्पष्ट किया है कि धान की पत्तियों पर दिखने वाले पीलापन और सफेद धब्बों के पीछे कई तरह के कारण हो सकते हैं। आमतौर पर, किसान इसे कोई एक बीमारी समझकर बिना सोचे-समझे किसी भी कीटनाशक का छिड़काव शुरू कर देते हैं, जो कि गलत है। इन लक्षणों के पीछे मुख्य रूप से निम्नलिखित कारण जिम्मेदार हो सकते हैं:

  • मिट्टी में नाइट्रोजन या जिंक जैसे पोषक तत्वों की भारी कमी।
  • फफूंद या अन्य फंगल संक्रमण का फैलना।
  • हानिकारक कीटों का फसल पर सीधा हमला।
  • लगातार नमी वाला मौसम और खेत में जलभराव की समस्या।

नाइट्रोजन और जिंक की भूमिका

डॉ. तिवारी ने बताया कि यदि फसल में नाइट्रोजन की कमी हो रही है, तो पौधे की पुरानी पत्तियां सबसे पहले पीली पड़ने लगती हैं, जिसके परिणामस्वरूप पूरे पौधे की वृद्धि दर काफी धीमी हो जाती है। वहीं, अगर मिट्टी में जिंक का अभाव है, तो पत्तियों पर सफेद या हल्के पीले रंग के धब्बे साफ दिखाई देने लगते हैं और पौधा धीरे-धीरे कमजोर होकर सूखने लगता है। ऐसी स्थिति में फसल को बचाने के लिए उर्वरकों का सही प्रबंधन आवश्यक है। यदि जिंक की कमी पाई जाती है, तो किसान 8 से 10 किलो प्रति एकड़ की दर से जिंक सल्फेट का प्रयोग कर सकते हैं। इससे पत्तियों के सफेद होने की समस्या का प्रभावी समाधान मिलता है।

उर्वरकों का मानक और सही प्रयोग

धान की बेहतर पैदावार के लिए संतुलित उर्वरक का प्रयोग अनिवार्य है। कृषि विज्ञान के अनुसार, 120:60:60 (नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश) का अनुपात प्रति हेक्टेयर के लिए एक सामान्य उर्वरक मानक माना जाता है। इस वैज्ञानिक मानक का पालन करते हुए, किसान प्रति एकड़ लगभग 50 किलो डीएपी (DAP) और 25 किलो पोटाश का उपयोग कर सकते हैं। नाइट्रोजन के प्रयोग को लेकर किसान अपनी सुविधा के अनुसार निर्णय लेते हैं, जिसमें कुछ रोपाई के समय खाद देते हैं तो कुछ पहली सिंचाई के बाद। यदि रोपाई के दौरान नाइट्रोजन देना है, तो प्रति बीघा 5 किलो की मात्रा को सबसे उपयुक्त माना गया है।

किसान क्या सावधानी बरतें

डॉ. अंकित तिवारी ने किसानों को सलाह दी है कि वे अपने खेतों का नियमित निरीक्षण करें। समस्या की पहचान करते समय ध्यान रखें कि क्या यह प्रभाव पूरे खेत में समान रूप से है या केवल कुछ विशिष्ट हिस्सों तक सीमित है।

  • संतुलित खाद: पोषक तत्वों की कमी होने पर केवल कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार ही उर्वरकों का प्रयोग करें।
  • कीट नियंत्रण: यदि लक्षण किसी बीमारी या कीट के हैं, तो अनुशंसित दवाओं का ही उपयोग करें।
  • जल प्रबंधन: खेतों में जरूरत से ज्यादा पानी न रुकने दें और जलभराव को नियंत्रित रखें।
  • निगरानी: अपनी फसल की हर दिन निगरानी करें ताकि किसी भी प्रकार के बदलाव की पहचान जल्दी हो सके।

अंत में, विशेषज्ञ का कहना है कि सही समय पर सही पहचान और उचित उपचार ही धान की फसल को होने वाले नुकसान से बचा सकता है। किसी भी गंभीर समस्या के सामने आने पर किसानों को तुरंत नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या अपने कृषि विभाग के अधिकारियों से संपर्क करना चाहिए। वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर ही किसान अच्छी पैदावार सुनिश्चित कर सकते हैं और अपनी मेहनत को बर्बाद होने से बचा सकते हैं।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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