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एक घंटा पहले
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दिवाली के मौके पर मानवता की बड़ी मिसाल
त्योहारों के मौसम में जहां हर घर में खुशियां मनाई जाती हैं, वहीं एक परिवार के लिए यह दिवाली गहरे दुख का सबब बन गई। सड़क हादसे का शिकार हुए 16 वर्षीय किशोर का निधन हो गया, लेकिन इस दुखद घड़ी में भी उसके माता-पिता ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने ऐसा फैसला लिया जिसने दूसरे तीन परिवारों के अंधेरे जीवन में रोशनी भरने का काम किया। अपने बेटे को खोने के बाद भी उन्होंने अंगदान करने की जो मिसाल पेश की, वह समाज के लिए एक प्रेरणा है। इस अंगदान के जरिए एक लिवर और दो किडनी का उपयोग करके तीन जरूरतमंद मरीजों को नया जीवनदान दिया गया है।
बिहार की स्वास्थ्य सेवा में नया अध्याय
इस पूरी प्रक्रिया की सबसे खास बात यह है कि बिहार के स्वास्थ्य इतिहास में पहली बार सरकारी सहायता के माध्यम से लिवर ट्रांसप्लांट को सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया है। राज्य सरकार की ओर से इस प्रक्रिया के लिए 15 लाख रुपये का अनुदान दिया गया, जिसने एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती को आसान बना दिया। आईजीआईएमएस यानी इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान में हुई यह उपलब्धि राज्य की चिकित्सा व्यवस्था के लिए एक मील का पत्थर मानी जा रही है।
प्रक्रिया और चयन की पूरी कहानी
आईजीआईएमएस के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. मनीष मंडल ने बताया कि मृतक किशोर का ब्लड ग्रुप ओ पॉजिटिव था। इस महत्वपूर्ण जानकारी के आधार पर अस्पताल में पहले से ही प्रतीक्षा सूची में शामिल मरीजों की पहचान की गई। लिवर प्रत्यारोपण के लिए आईजीआईएमएस और किडनी प्रत्यारोपण के लिए एम्स पटना में भर्ती मरीजों के परिजनों को तत्काल सूचित किया गया। जैसे ही सूचना मिली, मरीज के परिजन तुरंत अस्पताल पहुंचे और प्रत्यारोपण की प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया गया। इस तालमेल ने तीन जिंदगियों को मौत के मुंह से बाहर निकालने का रास्ता साफ किया।
सरकारी अनुदान से मिली बड़ी राहत
लिवर ट्रांसप्लांट एक अत्यंत महंगी और जटिल चिकित्सा प्रक्रिया है। अक्सर कई गरीब परिवार इलाज के भारी-भरकम खर्च के कारण उम्मीद छोड़ देते हैं। डॉ. मनीष मंडल ने स्पष्ट किया कि बिहार सरकार की तरफ से मिला 15 लाख रुपये का अनुदान गंभीर मरीजों के लिए एक वरदान साबित हुआ है। इस अनुदान की प्रक्रिया को लेकर लाभुक परिवार के सदस्य केशव आनंद ने कहा कि उन्हें सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ी। अस्पताल प्रशासन ने खुद आगे आकर सभी कागजी औपचारिकताएं पूरी कीं, जिससे उनके परिवार को बड़ी राहत महसूस हुई। नियमानुसार अब पात्र मरीज इस सरकारी सहायता का लाभ उठा सकते हैं।
किन परिस्थितियों में जरूरी होता है लिवर ट्रांसप्लांट
डॉ. मंडल ने विस्तार से समझाया कि लिवर ट्रांसप्लांट की नौबत तब आती है जब मरीज एंड स्टेज लिवर डिजीज यानी अंतिम चरण की लिवर बीमारी का सामना कर रहा होता है। इसका अर्थ यह है कि लिवर इतना खराब हो चुका है कि उसके ठीक होने की कोई गुंजाइश नहीं बची है। हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी, लिवर कैंसर, ऑटोइम्यून बीमारियां, गंभीर संक्रमण और अधिक नशे का सेवन जैसे कारक लिवर को पूरी तरह बर्बाद कर देते हैं। जब बीमारी अंतिम सीमा तक पहुंच जाती है और मेडिकल जांच में मरीज ट्रांसप्लांट के लिए पूरी तरह फिट पाया जाता है, तभी यह जटिल ऑपरेशन किया जाता है।
अंगदान को लेकर समाज में जागरूकता की जरूरत
डॉ. मनीष मंडल ने इस घटना के माध्यम से समाज में अंगदान के प्रति व्यापक जागरूकता फैलाने का आह्वान किया है। उन्होंने बताया कि सड़कों पर होने वाले हादसों में हर साल हजारों लोग दम तोड़ देते हैं। इनमें से कई मरीजों को गहन चिकित्सा के बाद ब्रेन डेड घोषित कर दिया जाता है। यदि ऐसे मामलों में परिवारजन सहानुभूति दिखाते हुए अंगदान के लिए सहमति दें, तो कई अनमोल जिंदगियां बचाई जा सकती हैं। उन्होंने भावुक होकर कहा कि 16 वर्षीय मोनू ने दिवाली के समय जो उदाहरण पेश किया है, वह अन्य परिवारों के लिए उम्मीद की किरण है। किसी अपने को खोने का दर्द दुनिया का सबसे बड़ा दुख है, लेकिन उसी दर्द के बीच अंगदान का लिया गया निर्णय किसी दूसरे परिवार की मुस्कान को सुरक्षित रख सकता है। यह रोशनी आगे भी बनी रहनी चाहिए और अंगदान के प्रति झिझक खत्म होनी चाहिए।
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