घुटनों से आने वाली कट-कट की आवाज क्या गठिया का है संकेत या सिर्फ उम्र का तकाजा? विशेषज्ञ से समझें पूरी बात जीवनशैली 3 घंटे पहले 4
सीढ़ियों पर चढ़ते समय या उठते-बैठते घुटनों से आने वाली आवाज को अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन ऑर्थोपेडिक सर्जन का कहना है कि यह ऑस्टियोआर्थराइटिस का शुरुआती संकेत हो सकता है। जानिए कब आपको डॉक्टर के पास जाना चाहिए और हड्डियों के स्वास्थ्य को कैसे बेहतर रखें।

घुटनों की आवाज: उम्र का असर या बीमारी?

दैनिक जीवन में अक्सर हम ऐसी समस्याओं से दो-चार होते हैं जिन्हें हम उम्र का सामान्य हिस्सा मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। सीढ़ियां चढ़ते समय घुटनों से कट-कट की आवाज आना, देर तक बैठने के बाद अचानक खड़े होने में कठिनाई होना या फर्श पर पालथी मारकर बैठने में दर्द महसूस करना, ऐसी ही कुछ आम समस्याएं हैं। कई लोग इसे महज हड्डियों के घिसने की प्रक्रिया समझकर छोड़ देते हैं, तो कुछ इसे बढ़ती उम्र का स्वाभाविक परिणाम मान लेते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर बार घुटने से आने वाली आवाज गठिया या ऑस्टियोआर्थराइटिस का ही संकेत होती है?

इस विषय पर अधिक स्पष्टता पाने के लिए हमने पटना स्थित एआईओआर यानी AIOR सुपर स्पेशियलिटी यूनिट के अनुभवी ऑर्थोपेडिक सर्जन और रोबोटिक एक्सपर्ट डॉ. आशीष सिंह से विस्तृत चर्चा की। डॉक्टर का मानना है कि घुटनों की बनावट और कार्यप्रणाली को समझना इस समस्या के समाधान की पहली कड़ी है।

घुटने की बनावट और आवाज का कारण

डॉ. आशीष सिंह के अनुसार, घुटने का जोड़ तीन मुख्य कंपार्टमेंट्स से मिलकर बना होता है। इनमें घुटने का अगला हिस्सा जिसे पेटेलोफेमोरल कहा जाता है, अंदरूनी हिस्सा मीडियल कंपार्टमेंट और बाहरी हिस्सा लेटरल कंपार्टमेंट के नाम से जाना जाता है। जब घुटने से कट-कट की आवाज आती है, तो इसके पीछे कई वैज्ञानिक कारण हो सकते हैं। अक्सर पटेला यानी घुटने की चकरी का अपनी सही जगह पर सुचारू रूप से न चल पाना, जिसे मेडिकल भाषा में 'पटेला मैलट्रैकिंग' कहा जाता है, आवाज का मुख्य कारण बनता है। साथ ही, घुटने के आसपास की मांसपेशियों में असंतुलन भी जोड़ के मूवमेंट के दौरान आवाज पैदा कर सकता है।

हालांकि, यह स्वीकार करना जरूरी है कि घुटनों से कट-कट की आवाज आना ऑस्टियोआर्थराइटिस का एक शुरुआती लक्षण हो सकता है। फिर भी, केवल आवाज को सुनकर ही यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मरीज को गठिया है या उसकी हड्डियां बुरी तरह घिस चुकी हैं। किसी भी अंतिम निदान के लिए शारीरिक परीक्षण और मेडिकल जांच बेहद आवश्यक है।

सावधान रहने योग्य अन्य संकेत

सिर्फ आवाज आना ही एकमात्र समस्या नहीं है। डॉ. आशीष सिंह ने उन प्रमुख लक्षणों की ओर इशारा किया है जिन पर व्यक्ति को गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। यदि घुटनों की आवाज के साथ-साथ निम्नलिखित समस्याएं भी हो रही हैं, तो विशेषज्ञ की सलाह लेना अनिवार्य है:

  • सीढ़ियां चढ़ने और उतरने में घुटनों पर दबाव महसूस होना।
  • काफी देर तक बैठने के बाद उठते समय घुटनों में जकड़न या दर्द का अनुभव होना।
  • भारतीय शैली के शौचालयों का उपयोग करने में घुटनों का साथ न देना।
  • जमीन पर पालथी मारकर बैठने में असमर्थता या बैठने के बाद उठने में तकलीफ होना।
  • केवल घुटनों में ही नहीं, बल्कि हाथों या अन्य जोड़ों में भी दर्द या सूजन की शिकायत।

ध्यान रखें कि इन लक्षणों का मतलब हमेशा गठिया नहीं होता, लेकिन ये संकेत शरीर की ओर से एक चेतावनी होते हैं कि जोड़ों की देखभाल का समय आ गया है।

वजन और जीवनशैली का प्रभाव

उम्र के साथ हड्डियों और जोड़ों में बदलाव होना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। ऑस्टियोआर्थराइटिस की स्थिति में जोड़ के बीच की कार्टिलेज प्रभावित होने लगती है। इस स्थिति में शरीर का बढ़ता वजन घुटनों के लिए सबसे बड़ा दुश्मन साबित होता है। अधिक वजन होने से घुटनों पर अतिरिक्त भार पड़ता है, जिससे कार्टिलेज तेजी से घिसने लगती है।

डॉ. सिंह की सलाह है कि वजन को नियंत्रित रखना ही जोड़ों के स्वास्थ्य की सबसे बड़ी कुंजी है। साथ ही, मांसपेशियों को मजबूत बनाने वाले व्यायामों को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाना चाहिए। हालांकि, इन व्यायामों का चयन घुटने की मौजूदा स्थिति और दर्द की तीव्रता के आधार पर ही होना चाहिए। जरूरत पड़ने पर एक कुशल फिजियोथेरेपिस्ट की सहायता ली जा सकती है ताकि व्यायाम के दौरान जोड़ों पर अनावश्यक तनाव न पड़े।

हड्डियों की सेहत और उपचार के विकल्प

जोड़ों को लंबे समय तक स्वस्थ रखने के लिए संतुलित आहार का सेवन करना बहुत जरूरी है। हड्डियों की मजबूती के लिए शरीर में कैल्शियम और विटामिन डी का पर्याप्त स्तर होना अनिवार्य है। यदि घुटनों में दर्द या आवाज की समस्या लगातार बनी हुई है, तो शुरुआती अवस्था में ही चिकित्सक से परामर्श लें। समय रहते जीवनशैली में बदलाव, वजन प्रबंधन और सही उपचार पद्धति अपनाने से बीमारी को गंभीर होने से रोका जा सकता है।

ऑस्टियोआर्थराइटिस की पहचान होने का मतलब यह नहीं है कि इलाज के रास्ते बंद हो गए हैं। आधुनिक चिकित्सा पद्धति में कई विकल्प उपलब्ध हैं। गंभीर मामलों के अलावा, व्यायाम, फिजियोथेरेपी और दवाइयों के माध्यम से दर्द को प्रभावी ढंग से प्रबंधित किया जा सकता है। इसके अलावा, कुछ चुनिंदा मरीजों के लिए पीआरपी (PRP), बोन मैरो एस्पिरेट कंसंट्रेट और एसीपी मैक्स जैसी रीजनरेटिव मेडिसिन तकनीकें काफी सहायक सिद्ध होती हैं। पटना के एआईओआर सुपर स्पेशियलिटी यूनिट जैसी अत्याधुनिक सुविधाओं वाले केंद्रों में आज के समय में ये उपचार उपलब्ध हैं, जिसके लिए मरीजों को बिहार से बाहर जाने की आवश्यकता नहीं है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

आपकी प्रतिक्रिया?

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!

फेसबुक वार्तालाप