हरियाणा
3 घंटे पहले
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डिजिटल अरेस्ट का अनोखा मामला और पुलिस की लचर थ्योरी
साइबर अपराध के बढ़ते मामलों के बीच हरियाणा की गुरुग्राम पुलिस का एक ऐसा कारनामा सामने आया है, जिसे सुनकर कोई भी हैरान रह जाएगा। गुरुग्राम की अतिरिक्त सत्र अदालत ने 44 लाख रुपये के एक कथित डिजिटल अरेस्ट और साइबर फ्रॉड के मामले में आरोपी को जमानत दे दी है। इस पूरे मामले में अदालत ने हरियाणा पुलिस की जांच के ढीले-ढाले रवैये और कार्यशैली पर बेहद तीखे सवाल खड़े किए हैं। हैरानी की बात यह है कि पुलिस ने जिस आरोपी को इस बड़े घोटाले के मुख्य चेहरे के रूप में पेश किया, उसके बैंक खाते में इस ठगी की रकम का एक भी पैसा नहीं गया था। पुलिस का पूरा मामला केवल इस बात पर टिका था कि ठगी के लिए इस्तेमाल किया गया मोबाइल नंबर आरोपी के नाम पर था।
अदालत का फैसला और जमानत की शर्तें
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश डॉ. गगन गीत कौर ने इस अनोखे मामले की सुनवाई करते हुए 17 सितंबर 2026 को अपना फैसला सुनाया। अदालत ने मामले के आरोपी जोगिंदर को नियमित जमानत दे दी है। कोर्ट ने जोगिंदर को 50,000 रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के एक जमानती के आधार पर तुरंत रिहा करने का आदेश जारी किया है।
यह पूरा मामला गुरुग्राम के मानेसर स्थित साइबर अपराध पुलिस स्टेशन में दर्ज किया गया था। इस मामले की प्राथमिकी यानी FIR नंबर 0344, दिनांक 19 दिसंबर 2025 को दर्ज की गई थी। पुलिस ने इस मामले में भारतीय न्याय संहिता की कई गंभीर धाराएं लगाई थीं, जिनमें मुख्य रूप से निम्नलिखित धाराएं शामिल थीं:
- धारा 318(4) (धोखाधड़ी)
- धारा 319 (पहचान बदलकर धोखाधड़ी करना)
- धारा 336(2) और 336(3) (जालसाजी और फर्जी दस्तावेज तैयार करना)
- धारा 338 (विश्वासघात और धोखाधड़ी)
- IT Act की धारा 66D (कंप्यूटर संसाधनों का उपयोग करके धोखाधड़ी)
इन तमाम गंभीर धाराओं के बावजूद, कोर्ट ने पाया कि पुलिस के पास आरोपी के खिलाफ पुख्ता सबूतों का भारी अभाव था, जिसके बाद जोगिंदर को जमानत दे दी गई।
आखिर कैसे शुरू हुआ ठगी का यह खेल?
अदालत के आधिकारिक आदेश में दर्ज विवरण के अनुसार, इस पूरे मामले के शिकायतकर्ता राम गणेश हैं। राम गणेश ने पुलिस को अपनी शिकायत में बताया था कि 8 दिसंबर 2025 को उनके पास एक अनजान मोबाइल नंबर से फोन आया था। फोन करने वाले व्यक्ति ने खुद को टेलीकॉम कंपनी एयरटेल के गुरुग्राम मुख्यालय का एक बड़ा अधिकारी बताया।
कथित एयरटेल अधिकारी ने राम गणेश को डराते हुए कहा कि बेंगलुरु में उनके नाम पर एक लैंडलाइन कनेक्शन चल रहा है। इतना ही नहीं, उस अधिकारी ने यह भी दावा किया कि इस लैंडलाइन नंबर का इस्तेमाल देश विरोधी और विभिन्न अवैध गतिविधियों को अंजाम देने के लिए किया जा रहा है।
वीडियो कॉल पर डिजिटल अरेस्ट और लाखों की चपत
शिकायतकर्ता को डराने के बाद, जालसाजों ने उसे तुरंत वॉट्सऐप के जरिए जोड़ा। वहां उन्हें कुछ ऐसे लोगों से रूबरू कराया गया जिन्होंने खुद को पुलिस अधिकारी और अन्य उच्च सरकारी विभागों के अधिकारी बताया। इन फर्जी अधिकारियों ने राम गणेश को डराते हुए कहा कि उनके आधार कार्ड का इस्तेमाल करके देश के कई अलग-अलग राज्यों में फर्जी बैंक खाते खोले गए हैं।
इन फर्जी खातों के माध्यम से करोड़ों रुपये की मनी लॉन्ड्रिंग, अवैध हथियारों की खरीद-फरोख्त और नशीली दवाओं (ड्रग्स) की तस्करी जैसे संगीन अपराधों को अंजाम दिया गया है। इसके बाद, जालसाजों ने पीड़ित को वीडियो कॉल पर लगातार अपनी निगरानी में रखा, जिसे आजकल की भाषा में डिजिटल अरेस्ट कहा जाता है।
पीड़ित को इस कदर डरा दिया गया कि वह उनके जाल में पूरी तरह फंस गया। जालसाजों ने कथित फंड वेरिफिकेशन यानी पैसों की जांच के नाम पर पीड़ित से रकम ट्रांसफर करने को कहा। घबराए हुए राम गणेश ने दो बार में कुल 44 लाख रुपये ट्रांसफर कर दिए। उन्होंने पहली बार में 34 लाख रुपये और दूसरी बार में 10 लाख रुपये ट्रांसफर किए। बाद में जब उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ, तब तक वह पूरी तरह लुट चुके थे और उन्हें समझ आया कि वे एक सुनियोजित साइबर फ्रॉड का शिकार बन चुके हैं।
पुलिस का अजीब दावा और आरोपी का बचाव
जब इस मामले की जांच साइबर पुलिस को सौंपी गई, तो पुलिस ने पाया कि जिस मोबाइल नंबर से पीड़ित राम गणेश को पहला कॉल आया था, वह नंबर सरकारी दस्तावेजों में जोगिंदर नाम के एक व्यक्ति के नाम पर दर्ज था। इसी एकमात्र सबूत के आधार पर हरियाणा पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए 18 जून 2026 को जोगिंदर को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।
हालांकि, जब यह मामला अदालत के सामने पहुंचा, तो बचाव पक्ष के वकील ने पुलिस की इस कहानी की धज्जियां उड़ा दीं। बचाव पक्ष ने कोर्ट को बताया कि आरोपी जोगिंदर ने इस फ्रॉड से काफी पहले, यानी 26 अक्टूबर 2025 को ही वह SIM और मोबाइल फोन किसी अज्ञात व्यक्ति को महज 370 रुपये में बेच दिया था।
बचाव पक्ष ने इसके समर्थन में ऑनलाइन पैसे के लेनदेन के सबूत भी कोर्ट के सामने पेश किए। वकील ने दलील दी कि जब SIM और मोबाइल अक्टूबर में ही बेच दिया गया था, तो दिसंबर में हुई ठगी के लिए जोगिंदर को कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? ठगी की वारदात SIM बेचने के लगभग डेढ़ महीने बाद हुई थी, जिससे यह साफ होता है कि इस अपराध में जोगिंदर की कोई सीधी भूमिका नहीं थी।
करोड़ों की ठगी की रकम कहां गई?
इस मामले में सबसे चौंकाने वाला खुलासा तब हुआ जब अदालत ने पैसों के लेनदेन की जांच की$. अदालत ने अपने लिखित आदेश में साफ तौर पर दर्ज किया कि पीड़ित द्वारा ट्रांसफर किए गए कुल 44 लाख रुपये में से 34 लाख रुपये "रीशेप क्लिनिक" के खाते में गए थे। वहीं, बचे हुए 10 लाख रुपये "पैंशिया नेटवर्क्स प्राइवेट लिमिटेड" नामक कंपनी के खाते में ट्रांसफर किए गए थे।
जांच के दौरान पुलिस जोगिंदर के किसी भी बैंक खाते में इस अपराध की रकम का एक भी पैसा ट्रांसफर होने का सबूत पेश नहीं कर सकी। इसके अलावा, पुलिस आरोपी से किसी भी प्रकार की कोई नकदी या अन्य आपत्तिजनक सामान बरामद करने में भी नाकाम रही थी।
इस पर टिप्पणी करते हुए माननीय न्यायाधीश ने कहा कि भले ही आरोपी के नाम पर पंजीकृत मोबाइल नंबर का इस्तेमाल इस अपराध में हुआ हो, लेकिन यह परीक्षण (ट्रायल) के दौरान तय किया जाएगा कि आरोपी का इस ठगी के पैसों से कोई वास्तविक संबंध था या नहीं।
काम का बोझ अधिक होने का बहाना और कोर्ट की फटकार
सुनवाई के दौरान जब अदालत ने जांच अधिकारी से पूछा कि क्या उन्होंने उन बैंक खातों की जांच की है जिनमें ठगी के 44 लाख रुपये ट्रांसफर हुए थे, तो जांच अधिकारी ने बेहद हैरान करने वाला जवाब दिया। अधिकारी ने कहा कि जिन बैंकों में पैसे ट्रांसफर हुए थे, वे बैंक बेंगलुरु में स्थित हैं। चूंकि उनके पास काम का बोझ बहुत ज्यादा था, इसलिए वे अभी तक बेंगलुरु जाकर उन खातों की जांच नहीं कर पाए हैं।
पुलिस अधिकारी के इस गैर-जिम्मेदाराना जवाब को सुनकर अदालत दंग रह गई। अतिरिक्त जिला सत्र न्यायाधीश गगन गीत कौर ने इस बयान पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की। कोर्ट ने पुलिस की इस दलील को बेहद गैर-पेशेवर और गैर-जिम्मेदाराना करार दिया। अदालत ने कहा कि मुख्य आरोपी और ठगी की रकम प्राप्त करने वाले बैंक खाताधारकों की जांच को ठंडे बस्ते में डालना और केवल SIM कार्ड धारक को जेल में बंद रखना न्यायसंगत नहीं है।
अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए आदेश की एक प्रति गुरुग्राम के पुलिस आयुक्त (पुलिस कमिश्नर) को भेजने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वरिष्ठ अधिकारियों को यह पता होना चाहिए कि उनके विभाग के अधिकारी डिजिटल अरेस्ट जैसे संवेदनशील और बड़े साइबर अपराधों की जांच किस लापरवाह तरीके से कर रहे हैं।
अदालत ने अंत में कहा कि इस मामले में चार्जशीट पहले ही दाखिल की जा चुकी है, इसलिए आरोपी को और अधिक समय तक सलाखों के पीछे रखने का कोई तार्किक आधार नहीं बनता है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि जमानत देने का मतलब यह नहीं है कि मामले के गुण-दोष पर अंतिम फैसला आ गया है, इसका फैसला मुकदमे की पूरी सुनवाई के बाद ही होगा।
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