बिहार
एक घंटा पहले
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गया की पहचान बना पैराडाइज सिनेमाघर
बिहार के गया शहर में स्थित पैराडाइज सिनेमाघर किसी विरासत से कम नहीं है। लगभग 70 वर्ष पुराने इस सिनेमाघर की अपनी एक अलग कहानी है। यह शहर के उन चुनिंदा स्थानों में से है, जहां आज भी ठेला चालक, रिक्शाचालक और गरीब मजदूर वर्ग के लोग बड़ी संख्या में फिल्म देखने पहुंचते हैं। आज के आधुनिक दौर में जब गया के अन्य सभी सिनेमाघर बंद हो चुके हैं या वहां बड़े मॉल और व्यावसायिक इमारतें बन चुकी हैं, पैराडाइज सिनेमाघर ने अपने अस्तित्व को संजोए रखा है। कभी गया शहर में कुल आठ सिनेमाघर हुआ करते थे, लेकिन समय के बदलाव के साथ वे सभी इतिहास के पन्नों में सिमट गए।
टिकट की बदलती दरें
एक दौर ऐसा भी था जब गया के आम नागरिक अपने पूरे परिवार के साथ फिल्मों का आनंद लेने के लिए इसी हॉल का रुख करते थे।1960 से 2000 के दशकों के बीच यह स्थान मनोरंजन का सबसे प्रमुख केंद्र हुआ करता था। उस समय का आलम यह था कि फिल्मों के टिकट महज 1 से डेढ़ रुपये की मामूली कीमत पर उपलब्ध थे। पुरानी यादों को ताजा करें तो वह दौर ऐसा था जब लोग बिना किसी बड़ी आर्थिक चिंता के मनोरंजन कर पाते थे। हालांकि, समय बीतने के साथ चीजें बदल गई हैं और आज के दौर में मल्टीप्लेक्स का बोलबाला है, जहां की महंगी टिकटें आम आदमी की पहुंच से बाहर हैं।
मौजूदा दौर और भोजपुरी फिल्मों का जलवा
पैराडाइज सिनेमाघर आज भी अपने संचालन को जारी रखे हुए है, हालांकि इसे चलाने के लिए मालिकों को काफी संघर्ष करना पड़ रहा है। वर्तमान में इस सिनेमाघर में टिकट की कीमत 70 रुपये और 90 रुपये है। यहां बैठने की व्यवस्था के आधार पर दाम तय किए गए हैं, जहां नीचे बैठने वाले दर्शकों को कम शुल्क देना पड़ता है, वहीं बालकनी की सुविधा के लिए थोड़ा अधिक किराया देना होता है। यह सिनेमाघर आज मुख्य रूप से भोजपुरी फिल्म प्रेमियों के लिए एक मात्र विकल्प बना हुआ है। जिन लोगों के पास स्मार्टफोन या इंटरनेट जैसी आधुनिक सुविधाएं नहीं हैं, उनके लिए यह हॉल मनोरंजन का एक अहम जरिया है।
प्रबंधन का नजरिया और चुनौती
सिनेमाघर के मैनेजर नवीन श्रीवास्तव बताते हैं कि पहले के समय में यहां हाउसफुल के बोर्ड लगे रहते थे और टिकट खिड़की पर दर्शकों की जबरदस्त भीड़ होती थी। मजदूर वर्ग के लोगों का आज भी यहां बड़ी संख्या में आना जारी है, लेकिन दर्शकों की कुल संख्या में पहले की तुलना में गिरावट आई है। अशोक सिंह का मानना है कि ओटीटी और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर फिल्मों की आसान उपलब्धता के कारण दर्शकों ने सिनेमाघरों से दूरी बना ली है। उनका यह भी मानना है कि यदि सरकार इस दिशा में थोड़ा ध्यान दे और प्रोत्साहन मिले, तो पुराने सिनेमाघरों के प्रति लोगों का जुड़ाव फिर से लौट सकता है। वर्तमान में यह सिनेमाघर केवल एक इमारत नहीं, बल्कि गया के उन तमाम मेहनतकश लोगों की भावनाओं से जुड़ा हुआ है जिनके लिए यह मनोरंजन का सबसे सुलभ और सस्ता जरिया है।
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