जानवरों पर शोध के नए ड्राफ्ट पर मचा बवाल, गौरी मौलेखी ने दी चेतावनी- भारत बन जाएगा रिसर्च का डस्टबिन
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एक घंटा पहले
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नए ड्राफ्ट से पशु कल्याण और शोध के नियमों को लेकर चिंताएं
भारत में पशु कल्याण कानूनों के क्षेत्र में पिछले करीब 30 वर्षों से सक्रिय पशु कल्याण कार्यकर्ता गौरी मौलेखी ने हाल ही में जारी किए गए ड्राफ्ट पर कड़ी आपत्ति जताई है। उनका मानना है कि यह नया मसौदा न केवल जानवरों के लिए हानिकारक है, बल्कि यह विज्ञान और देश के औद्योगिक मानकों पर भी प्रतिकूल असर डालेगा। मौलेखी के अनुसार, इस ड्राफ्ट में मौजूद प्रावधान मौजूदा सुरक्षा तंत्र को पूरी तरह से दरकिनार कर देते हैं, जिससे यह सवाल खड़ा होता है कि क्या इसे बनाने वालों के पास कानूनों की उचित समझ का अभाव है या फिर इसे कुछ खास उद्योगों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।
संस्थानों को मिली खुद को नियंत्रित करने की अनियंत्रित छूट
इस ड्राफ्ट का सबसे विवादित पहलू वह प्रावधान है जिसके तहत प्रयोगशालाओं को यह तय करने की स्वतंत्रता दी जा रही है कि उन्हें किस प्रयोग के लिए सरकारी अनुमति की जरूरत है और किसे वे खुद ही मंजूरी दे सकते हैं। गौरी मौलेखी ने इसे हितों के टकराव का एक प्रमुख उदाहरण बताया है। उनके मुताबिक, प्रस्तावित 6 सदस्यों वाली समिति में 4 सदस्य उसी संस्थान के होंगे, जहां शोध किया जा रहा है। बाहरी विशेषज्ञों की संख्या मात्र 2 होने के कारण, संस्थान के लोग आसानी से अपने पक्ष में फैसले ले सकते हैं। इससे स्वतंत्र निगरानी पूरी तरह खत्म हो जाएगी और संस्थानों में मनमानी बढ़ेगी।
प्रयोगों के लिए जानवरों का चयन और प्रोटोकॉल में बदलाव
किसी भी वैज्ञानिक प्रयोग से पहले एक कठोर प्रोटोकॉल का पालन किया जाता है। इसमें जानवरों की संख्या, प्रक्रिया, दवाओं का विवरण और वैज्ञानिक आधार तय किया जाता है। पहले यह अनिवार्य था कि जांच की जाए कि क्या जानवरों के बिना कोई वैकल्पिक तरीका मौजूद है। हालांकि, नए ड्राफ्ट के अनुसार, कम दर्द वाले प्रयोगों की अनुमति देने का अधिकार प्रयोगशालाओं के पास खुद होगा। इसके अलावा, रजिस्टर्ड ब्रीडर्स से जानवर न मिलने पर फार्म एनिमल्स, पक्षियों और मछलियों को खुले बाजार से पकड़ने की अनुमति देना भी चिंताजनक है। मौलेखी का मानना है कि इससे पालतू जानवरों और स्थानीय वन्यजीवों को पकड़कर प्रयोगशालाओं में भेजने का बड़ा खतरा पैदा हो गया है, जिससे संक्रामक बीमारियों के कारण शोध के परिणाम भी प्रभावित हो सकते हैं।
जानवरों को दिए जाने वाले अमानवीय दर्द के उदाहरण
मौलेखी ने उन दर्दनाक प्रक्रियाओं का विवरण दिया है जिनसे जानवरों को गुजरना पड़ता है। उन्होंने बताया कि हड्डियों की दवा की जांच के लिए खरगोशों की हड्डियां तोड़ी जाती हैं और टॉक्सिसिटी जांच में एलडी-50 जैसे टेस्ट किए जाते हैं, जिसमें दवाओं की इतनी खुराक दी जाती है कि आधे जानवर मर जाते हैं। आंखों की जलन जांचने के लिए खरगोशों की आंखों में दवाएं डाली जाती हैं और बंदरों के सिर पर दबाव डालकर उनके हेलमेट की क्षमता मापी जाती है। इन सबमें जानवरों को अत्यधिक मानसिक और शारीरिक पीड़ा का सामना करना पड़ता है, जिसे नजरअंदाज करना अनुचित है।
पांच साल तक बार-बार प्रयोग और एनेस्थीसिया का अभाव
नियमों की आलोचना करते हुए मौलेखी ने कहा कि अब एक ही जानवर पर 5 साल तक निरंतर प्रयोग किए जा सकेंगे। पहले यह अनिवार्य था कि प्रयोग के दौरान एनेस्थीसिया या दर्द कम करने वाली दवाओं का उपयोग हो, लेकिन नए ड्राफ्ट में यह सुरक्षा कवच हटा लिया गया है। जानवरों की मानसिक पीड़ा भी एक बड़ा मुद्दा है, क्योंकि उन्हें डर, तनाव, अकेलापन और अपने परिवार से दूर होने का गहरा सदमा लगता है। लंबे समय तक भूखा रखना या उनकी प्राकृतिक गतिविधियों को रोकना भी शारीरिक दर्द से कम नहीं है, जिसे इस ड्राफ्ट में कहीं भी स्थान नहीं दिया गया है।
अंतरराष्ट्रीय मानकों की तुलना में भारत की स्थिति
यूरोपीय संघ के वर्ष 2010 के कानूनों का उदाहरण देते हुए मौलेखी ने बताया कि वहां जानवरों के पुनर्वास और उनकी संख्या को कम करने पर कितना जोर दिया जाता है। इसके विपरीत, भारत का नया ड्राफ्ट प्रयोगशालाओं को अत्यधिक छूट देता है। उन्होंने आशंका जताई है कि जिन प्रयोगों पर विदेशों में कड़े प्रतिबंध हैं, वे भारत में धड़ल्ले से होंगे। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि इससे भारत शोध की दुनिया का 'डस्टबिन' बन जाएगा और प्रयोगशालाएं 'टॉर्चर चेंबर' की तरह काम करेंगी।
निरीक्षण की प्रक्रिया में ढील और गड़बड़ियां
पहले प्रयोगशालाओं में कभी भी अचानक निरीक्षण किया जा सकता था, लेकिन नए ड्राफ्ट में पूर्व सूचना देने का प्रावधान रखा गया है। मौलेखी के मुताबिक, इससे प्रयोगशालाओं को साक्ष्य नष्ट करने और कमियां छिपाने का मौका मिलेगा। उन्होंने अपना एक अनुभव साझा किया, जब एक बड़े मेडिकल कॉलेज में 27 मरे हुए सांप मिले थे, जिसमें एक 19 फुट लंबी मादा किंग कोबरा भी शामिल थी। अचानक निरीक्षण के कारण ही इस तरह की लापरवाही उजागर हो पाई थी, जो पूर्व सूचना मिलने पर कभी संभव नहीं होती।
सरकार से सुझाव भेजने की अपील
मौलेखी ने स्पष्ट किया है कि भारत के पास एआई और सिमुलेशन जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाकर जानवरों पर निर्भरता कम करने का सुनहरा अवसर है। उन्होंने नागरिकों से आग्रह किया है कि वे 5 नवंबर तक सरकार को अपने सुझाव और आपत्तियां भेजें। उन्होंने जोर दिया कि वैज्ञानिक अनुसंधान को आगे बढ़ाने के लिए उद्योगों, विशेषज्ञों और आम जनता के साथ व्यापक चर्चा जरूरी है ताकि नियम ऐसे बनें जो देश को वैज्ञानिक प्रगति में वैश्विक स्तर पर अग्रणी बनाएं, न कि उसे पीछे ले जाएं।
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