अब पाताल से भी खोज निकाले जाएंगे भगोड़े, 9 साल में 274 अपराधियों की वतन वापसी राष्ट्रीय राजनीति एक घंटा पहले 5
भारत सरकार ने विदेश भागने वाले अपराधियों पर अपना शिकंजा और अधिक कस दिया है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 2019 से अब तक 36 देशों से 274 भगोड़ों को वापस लाया गया है, जबकि पहले सालाना केवल 4 अपराधी ही प्रत्यर्पित हो पाते थे।

भगोड़ों के लिए बंद हो रहे हैं विदेश के रास्ते

कानून से बचने के लिए देश की सीमाएं लांघकर विदेशों में शरण लेने वाले अपराधियों के लिए अब स्थितियां पहले जैसी नहीं रहीं। भारत की सुरक्षा एजेंसियां अब पहले के मुकाबले कहीं अधिक सक्रिय और प्रभावी हो गई हैं। गृह मंत्रालय द्वारा साझा किए गए ताजा आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2019 से लेकर जुलाई 2026 तक की संक्षिप्त अवधि में ही भारत ने 36 विभिन्न देशों से कुल 274 भगोड़े अपराधियों को वापस लाने में बड़ी सफलता हासिल की है। यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि भारत अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी बात रखने और अपराधियों को न्याय के कटघरे में खड़ा करने में पूरी तरह सक्षम है।

गौर करने वाली बात यह है कि स्थिति में यह बड़ा बदलाव तब आया है जब हम पिछले आंकड़ों पर नजर डालते हैं। एक समय था जब प्रत्यर्पण की प्रक्रिया बेहद धीमी और कागजी जटिलताओं से भरी हुआ करती थी। उस दौर में, विशेष रूप से संप्रग शासनकाल के दौरान, सालाना औसतन मात्र चार अपराधी ही भारत वापस लाए जा पाते थे। आज यह संख्या बढ़कर सालाना 40 से 70 के बीच पहुंच गई है। केवल वर्ष 2025 में 70 अपराधी वापस लाए गए, वहीं 2026 के पहले सात महीनों में ही 45 भगोड़े अपने किए की सजा पाने के लिए भारत लौट चुके हैं।

बदलाव की बयार: तकनीक और इच्छाशक्ति

एक दौर था जब आर्थिक अपराधी या बड़े घोटालेबाज देश का पैसा लेकर विदेश में चैन की जिंदगी जीते थे। वे अक्सर खुद को सुरक्षित महसूस करते थे और भारतीय कानून को एक सीमा के बाहर जाकर चुनौती देने में सफल रहते थे। हालांकि, बीते कुछ वर्षों में केंद्र सरकार ने अपनी रणनीतियों में आमूलचूल परिवर्तन किया है। अब अपराधी इस गलतफहमी में नहीं रह सकते कि देश से बाहर जाते ही वे भारतीय न्याय प्रणाली की पहुंच से दूर हो गए हैं।

पहले की स्थिति और आज के दौर में जमीन-आसमान का अंतर है। पुरानी व्यवस्था में प्रत्यर्पण संधियों का अभाव था, कानूनी प्रक्रियाएं अत्यंत जटिल थीं और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण कई अनुरोध वर्षों तक लंबित पड़े रहते थे। वर्ष 2004 से 2013 के बीच की सुस्त रफ्तार इसका जीता-जागता उदाहरण है। इसके अतिरिक्त, आर्थिक अपराधियों पर नकेल कसने के लिए कोई ठोस कानून नहीं था, जिससे वे संपत्ति बेचकर या उसे छिपाकर आसानी से निकल जाते थे।

कानूनी सुधार और आधुनिक कूटनीति

भारत सरकार ने 2014 के बाद से इस दिशा में कई साहसिक कदम उठाए हैं। वर्ष 2018 में फ्यूजिटिव इकोनॉमिक ऑफेंडर्स एक्ट (FEOA) लागू करना एक बड़ा मील का पत्थर साबित हुआ, जिसके तहत देश से भागने वाले आर्थिक अपराधियों की संपत्ति जब्त करने का प्रावधान किया गया। इसके बाद 2019 में एनआईए एक्ट और यूएपीए में संशोधन ने विदेशी नेटवर्क और व्यक्तिगत आतंकवादियों पर दबाव बढ़ा दिया।

हाल ही में 2024 में लागू हुई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में 'ट्रायल इन एब्सेन्सिया' यानी अनुपस्थिति में मुकदमा चलाने का जो प्रावधान जोड़ा गया है, उसने तो खेल ही बदल दिया है। अब अगर कोई भगोड़ा विदेश में बैठकर सोचता है कि उस पर मुकदमा नहीं चलेगा, तो वह गलत है। अब वह विदेश में बैठकर भी कानूनी कार्यवाही का सामना करने के लिए मजबूर है।

त्रिकोणीय रणनीति और BHARATPOL का दम

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस सफलता के पीछे एक 'त्रिकोणीय रणनीति' का उल्लेख किया है, जिसमें वैश्विक पहुंच, मजबूत समन्वय और स्मार्ट कूटनीति शामिल है। जनवरी 2025 में 'भारतपोल' (BHARATPOL) का लॉन्च इस दिशा में एक क्रांतिकारी कदम रहा है। इसके माध्यम से 1400 से अधिक एजेंसियां अब इंटरपोल के साथ सीधे जुड़ गई हैं। सूचनाओं के आदान-प्रदान में पहले जहां हफ्तों लग जाते थे, अब वही काम महज 3 से 10 दिनों में हो जाता है।

ऑपरेशन त्रिशूल भी इन सफलताओं का एक बड़ा कारण है। सैटेलाइट इनपुट, डिजिटल फुटप्रिंट्स और कड़ी निगरानी का उपयोग करते हुए, एजेंसियां उन भगोड़ों का पता लगा रही हैं जिन्होंने अपनी पहचान या ठिकाने बदल लिए हैं। इंटरपोल द्वारा जारी 'रेड कॉर्नर नोटिस' की संख्या में भी भारी उछाल आया है। पिछले तीन वर्षों में कुल 401 रेड कॉर्नर नोटिस जारी किए गए हैं। साथ ही, पीएमएलए के सख्त क्रियान्वयन से 2019-2026 के बीच भगोड़ों की 17,874 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की गई है और 18,762 करोड़ रुपये की राशि वसूल की गई है।

अपराधियों का वर्ग और बड़ी सफलताएं

गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, इन 274 भगोड़ों में अपराधों की एक विस्तृत सूची शामिल है। इनमें 62 हत्या, डकैती और हिंसक अपराधों के आरोपी हैं, 53 यौन अपराध या पॉक्सो केस के मामले हैं, 42 संगठित अपराधों और गैंगस्टरों से संबंधित हैं, 45 अन्य अपराधों के, 18 मानव तस्करी या अपहरण के, 17 आतंकवाद या राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों के, 16 मादक पदार्थों की तस्करी के, 12 तस्करी, जाली मुद्रा या साइबर अपराधों के, और 9 वित्तीय धोखाधड़ी के आरोपी हैं। इनमें तहव्वुर हुसैन राणा का अमेरिका से प्रत्यर्पण सबसे चर्चित सफलताओं में से एक रहा है, जो 26/11 मुंबई हमले की साजिश में शामिल था।

अभी भी बाकी हैं कुछ बड़े नाम

सफलताओं के इस सफर के बावजूद कुछ बड़े नाम अभी भी कानून की गिरफ्त से दूर हैं। विजय माल्या का मामला ब्रिटेन में कानूनी प्रक्रियाओं के कारण लंबित है। पीएनबी घोटाले का आरोपी नीरव मोदी ब्रिटिश जेल में है और उसके प्रत्यर्पण की औपचारिकताएं चल रही हैं। वहीं, मेहुल चोकसी की गिरफ्तारी के बाद उसके प्रत्यर्पण के प्रयास निरंतर जारी हैं। नितिन संडेसरा, चेतन संडेसरा और संजय भंडारी जैसे कई अन्य आर्थिक अपराधी भी अभी कानून से बाहर हैं, लेकिन सरकार का दावा है कि उन पर दबाव लगातार बढ़ रहा है।

दाऊद और पुराने नेटवर्क की विफलता

भारत से अपराध कर भागने की परंपरा पुरानी है। दाऊद इब्राहिम का नाम इसमें सबसे ऊपर आता है, जिसने 1980 के दशक से ही दुबई और कराची को अपना ठिकाना बनाया। इकबाल मिर्ची जैसे ड्रग-बैरन और छोटा राजन जैसे गैंगस्टर भी इसी श्रेणी में आते हैं। एक समय था जब रवि पुजारी जैसे लोग भी फर्जी पासपोर्ट के सहारे विदेश में घूमते थे, लेकिन उन्हें भी सेनेगल से गिरफ्तार कर वापस लाया गया। टाइगर मेमन और मसूद अज़हर जैसे नाम भी इसी सूची का हिस्सा रहे हैं।

निष्कर्ष: आम जनता के लिए मायने

भगोड़ों की वापसी केवल एक सरकारी उपलब्धि नहीं है। यह उन पीड़ित परिवारों के लिए न्याय की किरण है जिन्होंने अपनों को खोया है। जब हत्यारे या बलात्कारी वापस आते हैं, तो पीड़ितों को राहत मिलती है। जब आर्थिक अपराधी बैंकों का पैसा लौटाते हैं या उनकी संपत्ति जब्त होती है, तो यह देश के टैक्सपेयर और जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा है। चुनौतियां अब भी हैं, लेकिन सरकार की दिशा और स्पष्ट है। अब भगोड़ों के लिए संदेश साफ है कि वे कहीं भी छिप जाएं, भारतीय कानून की पहुंच उन तक होकर रहेगी।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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