'भारत भाग्य विधाता' रिव्यू: इंसानियत बचाने वाले अनसुने नायकों की रूहानी दास्तान मनोरंजन एक महीने पहले 24
26/11 मुंबई हमले की पृष्ठभूमि पर बनी 'भारत भाग्य विधाता' उन गुमनाम किरदारों को सामने लाती है जिन्होंने बिना हथियार, सिर्फ हिम्मत और सूझबूझ से मौत को मात दी। कामा अस्पताल की नर्सों और स्टाफ की यह कहानी दर्शकों को भीतर तक झकझोर देती है।

26 नवंबर 2008 को हुआ मुंबई आतंकी हमला भारतीय इतिहास के सबसे दर्दनाक अध्यायों में गिना जाता है। इस त्रासदी को लेकर बॉलीवुड में कई फिल्में और वेब सीरीज बन चुकी हैं, लेकिन इन ज्यादातर कहानियों का केंद्र ताज होटल, ट्राइडेंट या फिर साहसी पुलिस अधिकारी ही रहे हैं। इसी जमे-जमाए ढर्रे को तोड़ती है निर्देशक मनोज तपारिया की नई फिल्म 'भारत भाग्य विधाता', जो इस हफ्ते सिनेमाघरों में पहुंची है।

इतिहास के शोर में दबे किरदारों की आवाज़

यह फिल्म उन चेहरों की कहानी कहती है जिन्हें इतिहास के शोर ने अपने भीतर दबा लिया। ये वे लोग थे जिनके पास न कोई हथियार था और न ही कोई औपचारिक प्रशिक्षण, फिर भी अपनी समझदारी और अदम्य हौसले के दम पर इन्होंने मौत को मात दे दी। फिल्म इन्हीं अनसुने नायकों के संघर्ष को परदे पर जीवंत करती है।

कामा अस्पताल की हिम्मत की मिसाल

कहानी का दिल कामा अस्पताल की उन बहादुर नर्सों और स्टाफ के इर्द-गिर्द धड़कता है, जिन्होंने आतंक की उस काली रात में अपनी जान की परवाह किए बिना दूसरों की जिंदगी बचाई। उनकी यह असाधारण हिम्मत दर्शकों को भीतर तक हिला देती है और इंसानियत पर भरोसे को और गहरा कर जाती है।

इंसानियत को जिंदा रखने वाली दास्तान

'भारत भाग्य विधाता' सिर्फ एक हमले की कहानी नहीं, बल्कि उस इंसानियत की रूहानी दास्तान है जो सबसे कठिन घड़ी में भी जिंदा रही। यह फिल्म याद दिलाती है कि असली नायक हमेशा सुर्खियों में नहीं होते—कई बार वे गुमनामी के अंधेरे में रहकर ही इतिहास रच जाते हैं।

आन्या कपूर पाबना के मनोरंजन रिपोर्टर हैं, जो बॉलीवुड, ओटीटी और टेलीविजन की खबरें कवर करते हैं। फिल्मों, वेब सीरीज, सेलिब्रिटी और बॉक्स ऑफिस पर उनकी पैनी नजर रहती है। वे मनोरंजन जगत की हलचल को रोचक अंदाज में दर्शकों तक लाते हैं।

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