विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी पर जरूर पढ़ें यह व्रत कथा, दूर होंगे सभी कष्ट धर्म एक घंटा पहले 3
आश्विन माह की विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी का व्रत भगवान गणेश को समर्पित है। इस दिन व्रत कथा का पाठ करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, जिससे साधक को पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी का महत्व

हिंदू पंचांग के अनुसार, आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। यह पावन दिन पूर्णतः प्रथम पूज्य भगवान गणेश की आराधना के लिए समर्पित है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखते हैं और गणपति की पूजा करते हैं, उनके जीवन के तमाम कष्ट मिट जाते हैं और घर में सुख, शांति तथा समृद्धि का वास होता है। इस विशेष दिन पर भक्त गणेश जी के विघ्नराज स्वरूप की विधिवत पूजा करते हैं। संकष्टी चतुर्थी के उपवास का पारण चंद्रोदय के पश्चात चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही किया जाता है। यदि आप भी इस व्रत को कर रहे हैं, तो धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसका पूर्ण फल पाने के लिए पौराणिक कथा का पाठ करना अनिवार्य माना गया है।

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा

धार्मिक ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार, एक बार बाणासुर की पुत्री उषा सो रही थी और उसी दौरान उसने सपने में अनिरुद्ध को देखा। सपने में अनिरुद्ध को देखने के बाद वह उनके प्रेम में इतनी विह्वल हो गई कि उसे कहीं भी चैन नहीं मिल रहा था। व्याकुलता में उसने अपनी सहेली चित्रलेखा से तीनों लोकों में रहने वाले सभी पुरुषों के चित्र बनवाने को कहा। जब उसने चित्रों में अनिरुद्ध को देखा, तो उसे पहचान लिया और चित्रलेखा से बताया कि यही वह व्यक्ति है जो मेरे स्वप्न में आया था और जिसके साथ मेरा विवाह हुआ था। उसने अपनी सहेली से आग्रह किया कि वह अनिरुद्ध को किसी भी तरह ढूंढ निकाले, वरना वह विरह में अपने प्राण त्याग देगी। अपनी सहेली की बात मानकर चित्रलेखा ने हर स्थान पर खोजबीन शुरू की और अंत में वह द्वारकापुरी पहुँची। चित्रलेखा मायावी विद्या में निपुण थी, उसने वहाँ अनिरुद्ध को पहचाना और रात के समय सोते हुए अनिरुद्ध का पलंग सहित अपहरण कर लिया। इसके बाद वह उन्हें अपने साथ बाणासुर की नगरी ले गई।

श्रीकृष्ण और लोमश ऋषि का संवाद

उधर, प्रद्युम्न अपने पुत्र के वियोग में अत्यंत बीमार पड़ गए। पौत्र अनिरुद्ध के अचानक गायब हो जाने से भगवान श्रीकृष्ण बहुत व्याकुल हुए। रुक्मिणी भी इस घटना से अत्यंत दुखी थीं और रोते हुए श्रीकृष्ण से पूछने लगीं कि क्या हमारे प्रिय पौत्र का किसी ने हरण किया है, या वह कहीं स्वेच्छा से चला गया है। रुक्मिणी ने कहा कि यदि वह वापस नहीं आया तो मैं शोकाकुल होकर प्राण त्याग दूँगी। यह स्थिति देख श्रीकृष्ण यादवों की सभा में गए, जहाँ उन्हें लोमश ऋषि के दर्शन हुए। श्रीकृष्ण ने ऋषि को पूरी घटना सुनाई और पूछा कि आखिर अनिरुद्ध कहाँ है। लोमश ऋषि ने ध्यान लगाकर बताया कि अनिरुद्ध का अपहरण बाणासुर की पुत्री उषा की सहेली चित्रलेखा ने किया है और वह उसे बाणासुर के महल में बंदी बनाकर रखे हुए है।

व्रत का प्रभाव और विजय

लोमश मुनि ने श्रीकृष्ण को आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का व्रत रखने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि यदि आप इस दिन विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी का अनुष्ठान करेंगे, तो आपको आपका पौत्र अवश्य मिल जाएगा। श्रीकृष्ण ने ऋषि के परामर्श का पालन करते हुए पूरे विधि-विधान से यह व्रत रखा। इस व्रत के दिव्य प्रभाव से उन्हें बाणासुर पर विजय प्राप्त हुई और उन्होंने युद्ध में बाणासुर की हजारों भुजाओं को काट डाला। इस प्रकार व्रत के पुण्य प्रभाव से श्रीकृष्ण को सफलता मिली। विद्वानों का मानना है कि यह व्रत जीवन की समस्त विपत्तियों को नष्ट करने वाला है और इसकी महिमा का वर्णन कर पाना अत्यंत कठिन है।

प्रिया नायर पाबना की लाइफस्टाइल एवं फैशन एडिटर हैं, जो फैशन, ब्यूटी और लाइफस्टाइल ट्रेंड्स कवर करती हैं। रिश्तों, संस्कृति और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े विषयों पर भी वे लिखती हैं। उनका लेखन आधुनिक और भारतीय जीवनशैली का संतुलन पेश करता है।

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