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एक घंटा पहले
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आयुध पूजा का महत्व और उद्देश्य
विजयादशमी का दिन धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। इस दिन विशेष रूप से आयुध पूजा का विधान है, जिसके अंतर्गत व्यक्ति अपने कार्यक्षेत्र में प्रयोग किए जाने वाले औजारों, औद्योगिक मशीनों, वाहनों और विभिन्न शस्त्रों की विधि-विधान से पूजा करता है। मान्यताओं के अनुसार, यदि विजयादशमी के दिन आजीविका के साधनों और वाहनों का पूजन किया जाए, तो कार्यक्षेत्र में उन्नति के मार्ग प्रशस्त होते हैं। साथ ही, इससे दुर्घटनाओं से सुरक्षा मिलती है और व्यापार में सफलता के नए अवसर प्राप्त होते हैं।
आयुध पूजा 2026: शुभ मुहूर्त
इस वर्ष आयुध पूजा का आयोजन 20 अक्टूबर 2026 को किया जा रहा है। शास्त्रों के अनुसार, अस्त्र-शस्त्रों की पूजा के लिए विजय मुहूर्त का समय सर्वाधिक शुभ फलदायी माना गया है। इस दिन विजय मुहूर्त की शुरुआत दोपहर 1 बजकर 59 मिनट पर होगी और इसका समापन दोपहर 2 बजकर 45 मिनट पर होगा। इसके अतिरिक्त, जो भक्त अपराह्न के समय पूजा करना चाहते हैं, उनके लिए शुभ अवधि दोपहर 1 बजकर 14 मिनट से लेकर दोपहर 3 बजकर 30 मिनट तक रहेगी।
पूजा की चरणबद्ध विधि
- सर्वप्रथम अपने सभी व्यावसायिक मशीनों, औजारों और वाहनों की भली-भांति सफाई करें।
- पूजन सामग्री और उपकरणों को पवित्र करने के लिए उन पर थोड़ा गंगाजल छिड़कें।
- सभी उपकरणों, शस्त्रों और गाड़ियों पर हल्दी, कुमकुम या रोली और चंदन का तिलक लगाएं।
- वाहनों के आगे के हिस्से पर शुभ लाभ का प्रतीक स्वास्तिक का चिह्न बनाएं।
- उपकरणों और वाहनों को गेंदे के फूलों की माला से सजाएं।
- गाड़ी के स्टीयरिंग या मशीन के हैंडल पर रक्षासूत्र यानी कलावा बांधना शुभ माना जाता है।
- धूप और दीप प्रज्वलित करने के बाद मां दुर्गा, प्रभु श्री राम और भगवान विश्वकर्मा का स्मरण करें।
- भगवान को फल, मिठाई और नारियल का भोग लगाएं।
- वाहन पूजन के अंतिम चरण में वाहन के सामने साबुत नारियल को घुमाकर फोड़ें।
आयुध पूजा के विशेष मंत्र
पूजा के दौरान निम्नलिखित मंत्रों का उच्चारण करना अत्यंत कल्याणकारी माना गया है:
- शस्त्र देवता पूजनम्, रक्षा कर्ता पूजनम्
- ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥
शस्त्र पूजा के पीछे की पौराणिक मान्यताएं
पौराणिक कथाओं में शस्त्र पूजा का गहरा आधार है। कहा जाता है कि नौ दिनों के कठिन संघर्ष के बाद मां दुर्गा ने महिषासुर जैसे दुष्ट राक्षस का अंत किया था, जिसके उपरांत समस्त देवी-देवताओं ने उन शस्त्रों का पूजन किया था जिनसे विजय प्राप्त हुई थी। एक अन्य मान्यता के अनुसार, भगवान श्री राम ने लंका पर आक्रमण करने से पूर्व और विजय प्राप्त करने हेतु मां अपराजिता तथा अपने अस्त्र-शस्त्रों की विधिपूर्वक आराधना की थी। यही कारण है कि विजयादशमी के दिन रावण वध और लंका पर विजय पाने के प्रतीक के रूप में आज भी आयुध पूजा की परंपरा का निर्वहन किया जाता है।
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