आशा दशमी 2026: व्रत की शुभ तिथि, पूजा करने का सही तरीका और नियमों की पूरी जानकारी धर्म एक महीने पहले 53
आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को आशा दशमी के रूप में मनाया जाता है, जिसमें दस दिशाओं की देवियों की पूजा का विशेष विधान है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने सुखद दांपत्य जीवन और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए व्रत रखती हैं।

आशा दशमी का धार्मिक महत्व

हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को आशा दशमी का पावन पर्व मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस विशेष दिन पर दस दिशाओं की देवी मानी जाने वाली 'आशा देवियों' की आराधना की जाती है। ऐसा माना जाता है कि इन देवियों की विधि-विधान से पूजा करने से भक्तों के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है। मुख्य रूप से सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और खुशहाल वैवाहिक जीवन के लिए इस दिन व्रत का पालन करती हैं। यह व्रत न केवल मनोकामनाओं को पूरा करने वाला माना गया है बल्कि जीवन की तमाम बाधाओं को दूर करने में भी सहायक है। जिन महिलाओं के पति उनसे दूर रहते हैं, उनके लिए भी यह व्रत वैवाहिक सुख और पुनर्मिलन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

आशा दशमी व्रत की सटीक तिथि और समय

इस वर्ष आशा दशमी व्रत के लिए तिथियों का विवरण कुछ इस प्रकार है। पंचांग की गणना के अनुसार आषाढ़ शुक्ल दशमी तिथि का आरंभ 23 जुलाई को सुबह 7 बजकर 03 मिनट पर हो रहा है। वहीं यह तिथि 24 जुलाई 2026 को सुबह 9 बजकर 12 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि की मान्यता को आधार मानते हुए आशा दशमी का व्रत 24 जुलाई, शुक्रवार के दिन रखा जाना उचित होगा।

पूजा करने की विस्तृत विधि

आशा दशमी के दिन पूजा-अर्चना करने के लिए निम्नलिखित चरणों का पालन करना चाहिए:

  • व्रत वाले दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि से निवृत हो जाएं।
  • स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद पवित्र मन से व्रत का संकल्प लें।
  • पूजा स्थल को साफ करके वहां एक चौकी पर लाल रंग का कपड़ा बिछाएं और माता पार्वती की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
  • देवी को रोली, चंदन, अक्षत और ताजे फूलों से सुसज्जित करें। इसके साथ ही धूप और दीप प्रज्वलित करें।
  • देवी को खीर का भोग अर्पित करें और दस दिशाओं की देवियों का ध्यान करते हुए उनका आह्वान करें।
  • पूजन के दौरान आशा दशमी व्रत कथा का पाठ अवश्य करें या इसे ध्यानपूर्वक सुनें।
  • अंत में अपने परिवार के मंगल की कामना करें। पूजा संपन्न होने के बाद अपनी सामर्थ्य अनुसार गरीबों या जरूरतमंदों को दान दें।
  • पूजन के पश्चात सात्विक भोजन ग्रहण करके व्रत खोलें।

व्रत के मुख्य नियम और उद्यापन

आशा दशमी के व्रत को करने के लिए कुछ विशेष नियम बताए गए हैं। इस व्रत को कम से कम छह महीने या फिर एक से दो वर्ष तक लगातार करने का विधान है। हालांकि इसे आषाढ़ शुक्ल पक्ष से शुरू करना सबसे श्रेष्ठ माना गया है, लेकिन भक्त किसी भी अन्य शुक्ल पक्ष से भी इसे आरंभ कर सकते हैं। व्रत के समापन पर इसका उद्यापन करना अनिवार्य है। व्रत के नियमों के अंतर्गत इस दिन सुहागिन महिलाओं के साथ मिलकर रात के समय जागरण करना फलदायी माना गया है। साथ ही ब्राह्मणों को भोजन कराना और निर्धनों की सहायता करना इस व्रत का प्रमुख अंग है।

प्रिया नायर पाबना की लाइफस्टाइल एवं फैशन एडिटर हैं, जो फैशन, ब्यूटी और लाइफस्टाइल ट्रेंड्स कवर करती हैं। रिश्तों, संस्कृति और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े विषयों पर भी वे लिखती हैं। उनका लेखन आधुनिक और भारतीय जीवनशैली का संतुलन पेश करता है।

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