संसद में आने वाले नए बिलों से विपक्ष में मची हलचल, मोदी सरकार की तैयारी से बढ़ी बेचैनी राष्ट्रीय राजनीति 2 घंटे पहले 2
संसद के मानसून सत्र के दौरान 11 से 13 अगस्त तक का समय बेहद अहम है, जहां सरकार के संभावित विधेयकों को लेकर पक्ष और विपक्ष पूरी तरह अलर्ट मोड में आ गए हैं। एफसीआरए संशोधन और परिसीमन जैसे बड़े मुद्दों पर सरकार और विपक्ष के बीच आर-पार की स्थिति बनी हुई है।

संसद में बड़े बदलाव की आहट

संसद का मानसून सत्र अब अपने सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव की ओर बढ़ रहा है। आगामी 11 अगस्त से 13 अगस्त तक की अवधि को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि संसद के भीतर कुछ बड़ा होने वाला है, जिसने विपक्षी गठबंधन को पूरी तरह से सतर्क कर दिया है। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने विधायी एजेंडे को लेकर पूरी तरह तैयार है, जिसके जवाब में भारतीय जनता पार्टी ने अपने सभी सांसदों के लिए तीन दिनों का व्हिप जारी कर दिया है। यह निर्देश दिया गया है कि सभी सांसद इन तारीखों के दौरान सदन में अनिवार्य रूप से उपस्थित रहें।

विपक्ष ने भी अपनी रणनीति में बदलाव किया है और अपने सदस्यों को संसद पहुंचने के कड़े निर्देश दिए हैं। पिछले कुछ समय से एफसीआरए यानी विदेशी चंदा विनियमन कानून में संशोधन और परिसीमन विधेयक को लेकर जो अटकलें लगाई जा रही थीं, वे अब और अधिक गहरा गई हैं। हालांकि इन विधेयकों को लेकर सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन यह स्पष्ट है कि सरकार इन दोनों विषयों को अपनी शीर्ष प्राथमिकताओं में मानकर चल रही है।

विपक्ष की रणनीति और विरोध के स्वर

विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस, ने एफसीआरए संशोधन बिल का पुरजोर विरोध करने का ऐलान किया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने इस संबंध में अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनकी पार्टी विदेशी चंदे से जुड़े इस कानून में बदलाव का विरोध करेगी। उन्होंने संकेत दिया है कि विपक्षी गठबंधन के अन्य दलों के साथ चर्चा के बाद ही इस विषय पर अंतिम फैसला लिया जाएगा। हालांकि, विपक्षी खेमे में सब कुछ एक जैसा नहीं दिख रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मोदी सरकार की ओर से पेश किए जाने वाले संभावित बिलों को लेकर विपक्ष में आपसी तालमेल की कमी स्पष्ट नजर आ रही है। जहां एक ओर कांग्रेस कड़ा रुख अपना रही है, वहीं अन्य दलों के सांसद सरकार के रुख को देखते हुए अपने पत्ते खोलने से बच रहे हैं।

एनसीपी का पीएम मोदी से मुलाकात का कार्यक्रम

इस बीच, शरद पवार गुट की एनसीपी के 8 लोकसभा सांसदों का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करने का कार्यक्रम चर्चा का विषय बना हुआ है। 10 अगस्त को होने वाली इस मुलाकात को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। जब इस बारे में सुप्रिया सुले से सवाल किया गया, तो उन्होंने कहा कि देश के प्रधानमंत्री से मिलना उनका संवैधानिक दायित्व है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी विषय पर नीतिगत चर्चा के लिए प्रधानमंत्री से मिलना एक सामान्य प्रक्रिया होनी चाहिए, न कि उसे गॉसिप का विषय बनाना चाहिए। हालांकि, महाराष्ट्र की राजनीति में इस मुलाकात को लेकर काफी हलचल है और इसे भविष्य के समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है।

परिसीमन और सत्ता का गणित

संसद में चर्चा का केवल एक ही मुद्दा एफसीआरए नहीं है, बल्कि परिसीमन यानी डिलिमिटेशन का मुद्दा भी बहुत बड़ा है। परिसीमन का सीधा असर आने वाले दशकों की राजनीतिक ताकत पर पड़ने वाला है। दक्षिण भारत के राज्यों को यह डर सता रहा है कि यदि जनसंख्या को ही सीटों के बंटवारे का एकमात्र आधार बनाया गया, तो उनका प्रभाव संसद में कम हो सकता है। उत्तर भारत के राज्यों की तुलना में दक्षिण भारत के कई राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण पर बेहतर परिणाम हासिल किए हैं, जिसका खामियाजा उन्हें सीटों की संख्या कम होने के रूप में भुगतना पड़ सकता है।

बीजेपी सांसद मनोज तिवारी ने इस तर्क का खंडन करते हुए कहा कि लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व का आधार आबादी ही होना चाहिए। उन्होंने उदाहरण दिया कि उनके अपने संसदीय क्षेत्र में 26 लाख से अधिक मतदाता हैं, जबकि कई क्षेत्रों में यह संख्या 40 लाख तक पहुंच चुकी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि समय के साथ परिसीमन नहीं हुआ, तो जनता के साथ न्याय नहीं होगा। यह मुद्दा आने वाले समय में राजनीतिक लड़ाई का बड़ा केंद्र बनने वाला है, जहां सत्ताधारी दल विकास और प्रतिनिधित्व की बात कर रहा है, वहीं विपक्ष इसे अपने वोट बैंक और राजनीतिक अस्तित्व पर प्रहार के रूप में देख रहा है।

सरकार का विधायी एजेंडा और प्राथमिकताएं

संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि एफसीआरए संशोधन और परिसीमन जैसे बिल सरकार की प्राथमिकता हैं। भले ही तारीखों की घोषणा अभी बाकी हो, लेकिन सरकार की मंशा इन महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने की है। मानसून सत्र के दौरान सरकार ने अब तक 8 बिल पेश किए हैं, जिनमें से 5 को सदन ने मंजूरी दे दी है। आने वाले दिनों में चार और महत्वपूर्ण बिल पेश किए जाने हैं, जिनमें ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक, खान एवं खनिज संशोधन विधेयक, केरल का नाम बदलने संबंधी विधेयक और बहु-राज्य सहकारी समिति संशोधन विधेयक शामिल हैं।

अब सबकी निगाहें 11, 12 और 13 अगस्त पर टिकी हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार वाकई कोई ऐसा मास्टरस्ट्रोक खेलने जा रही है जो विपक्ष के सभी दांवों को बेअसर कर देगा। विपक्ष की हताशा इस बात से स्पष्ट है कि वे सरकार के हर कदम को शक की नजर से देख रहे हैं, लेकिन सरकार ने अपनी संख्या बल और तैयारी के साथ सदन की कार्यवाही को आगे बढ़ाने का पक्का इरादा कर लिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले तीन दिन देश की संसदीय राजनीति के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं, जहां सरकार अपने एजेंडे को अंजाम तक पहुंचाना चाहेगी, वहीं विपक्ष किसी भी कीमत पर अपनी जमीन बचाने की जद्दोजहद में जुटा रहेगा।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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