भारत
4 घंटे पहले
2
विचारों
भारत में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार में छपी रिपोर्ट के बाद इस मुद्दे पर बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, शिवसेना यूबीटी और आम आदमी पार्टी जैसी प्रमुख विपक्षी पार्टियों ने इस मामले पर प्रेस कॉन्फ्रेंस करके चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। इस विवाद में केजरीवाल और अखिलेश यादव जैसे दिग्गज नेताओं ने भी मोर्चा खोल दिया है। अब इस पूरे घमासान पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए भारत निर्वाचन आयोग ने एक आधिकारिक वक्तव्य जारी किया है। चुनाव आयोग ने स्पष्ट रूप से कहा है कि आयोग के भीतर सभी काम देश के संविधान के दायरे में रहकर किए जाते हैं और सभी निर्णय पूर्ण बहुमत और सर्वसम्मति के साथ लिए गए हैं। आयोग ने यह भी कहा कि कुछ लोग केवल चुनिंदा प्रशासनिक नोट्स को दिखाकर आधी-अधूरी तस्वीर पेश करने की कोशिश कर रहे हैं।
चुनाव आयोग ने जारी किया आधिकारिक स्पष्टीकरण
विपक्षी दलों के आरोपों का जवाब देने के लिए भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने एक विस्तृत प्रेस नोट जारी किया है। इस नोट में आयोग ने अपनी कार्यप्रणाली को स्पष्ट करते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदु सामने रखे हैं:
- संविधान के तहत कार्य: ECI भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत काम करने वाली एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। आयोग के भीतर लिखित नोट तैयार करना, उन पर आपसी चर्चा करना और आंतरिक तौर पर नियंत्रण एवं संतुलन (चेक एंड बैलेंस) बनाए रखना एक पूरी तरह से सामान्य और स्वस्थ प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
- कानूनी प्रक्रियाओं का पालन: आयोग द्वारा समय-समय पर जारी किए गए सभी आधिकारिक आदेश और निर्णय पूरी कानूनी प्रक्रियाओं के तहत लिए गए हैं। ये सभी फैसले The Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023 के प्रावधानों के पूरी तरह अनुकूल हैं।
- सुझावों की सामान्य प्रक्रिया: किसी भी नीति या ड्राफ्ट को अंतिम रूप देने के दौरान आयोग के सदस्यों द्वारा उठाए गए सवाल या दिए गए सुझाव मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए की जाने वाली एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं।
- विचार-विमर्श में अलग राय होना स्वाभाविक: किसी भी लोकतांत्रिक संस्था में किसी विषय पर विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय आना बिल्कुल स्वाभाविक है। यह अंतिम निर्णय लेने से पहले की एक आवश्यक प्रक्रिया है। आयोग के तीनों आयुक्तों में से किसी एक को ही नहीं, बल्कि हर एक अधिकारी को अपने रचनात्मक सुझाव देने का पूरा अधिकार है।
- पूरी तस्वीर को छिपाने का प्रयास: पिछले 10 महीनों के दौरान लिखे गए केवल कुछ आंतरिक नोट्स को सार्वजनिक करना और बाकी के सर्वसम्मत फैसलों को नजरअंदाज करना पूरी तस्वीर को नहीं दिखाता है। पिछले एक साल के कार्यकाल में आयोग ने लगभग 40 नई पहल की हैं और कई महत्वपूर्ण चुनाव सुधारों को लागू किया है। इसमें देश भर में चलाया गया विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR भी शामिल है। ये सभी फैसले आयोग द्वारा सर्वसम्मति से लिए गए थे।
- सफल चुनावों का रिकॉर्ड: आयोग ने हाल ही के समय में बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुदुचेरी, असम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में बेहद चुनौतीपूर्ण और बड़े स्तर के चुनावों को सफलतापूर्वक संपन्न कराया है।
- डेटा सुरक्षा के कड़े मानक: ECI के डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे कि ECINet, अत्यंत कड़े डेटा सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत संचालित होते हैं। मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया पूरी तरह से कानूनी अधिकारों के तहत स्थानीय स्तर पर ERO और DEO द्वारा ही की जाती है।
- संवैधानिक दायित्वों के प्रति प्रतिबद्धता: चुनाव आयोग देश में लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखने और अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों को पूरी ईमानदारी और निष्पक्षता के साथ निभाने के लिए दृढ़ संकल्पित है।
आखिर क्यों मचा है यह सियासी बवाल?
इस पूरे विवाद की शुरुआत एक अंग्रेजी समाचार पत्र 'इंडियन एक्सप्रेस' की एक रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद हुई। इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया को लेकर दो चुनाव आयुक्तों, एसएस संधू और डॉक्टर विवेक जोशी ने गंभीर आपत्तियां जताई थीं। रिपोर्ट के अनुसार, इन दोनों चुनाव आयुक्तों ने 10 महीने के कार्यकाल के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को 14 बार पत्र लिखकर अपनी असहमति दर्ज कराई थी। उनकी मुख्य आपत्ति फॉर्म-6 में किए जा रहे बदलावों और ECInet सॉफ्टवेयर की कार्यप्रणाली को लेकर थी।
अखबार की इस रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों द्वारा बार-बार जताई गई आपत्तियों को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने दरकिनार कर दिया और अपनी व्यक्तिगत मर्जी से SIR की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। जैसे ही यह खबर सार्वजनिक हुई, देश के राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मच गया। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, शिवसेना का उद्धव ठाकरे गुट, टीएमसी का ममता बनर्जी गुट और आम आदमी पार्टी के नेता तुरंत आक्रामक हो गए और उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यशैली पर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए। फिलहाल, आयोग के इस नए स्पष्टीकरण के बाद देखना होगा कि विपक्ष का इस पर क्या रुख रहता है।
Comments
0 comment