एल नीनो का सबसे खौफनाक रूप दिखना अभी बाकी, संयुक्त राष्ट्र की बड़ी चेतावनी- दिसंबर में चरम पर पहुंचेगा वैश्विक संकट राष्ट्रीय राजनीति 6 घंटे पहले 3
संयुक्त राष्ट्र के विश्व मौसम संगठन (WMO) ने आगाह किया है कि एल नीनो दिसंबर में अपने चरम पर होगा, जिससे भारत सहित पूरी दुनिया में सूखा, विनाशकारी बाढ़ और रिकॉर्ड तोड़ गर्मी का संकट गहरा सकता है।

त्योहारों के सीजन के बीतने के साथ ही दुनिया पर एक बड़ा प्राकृतिक संकट मंडराने लगा है। संयुक्त राष्ट्र की मौसम संबंधी संस्था ने एक ऐसी चेतावनी जारी की है जिसने पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों और सरकारों की चिंता बढ़ा दी है। दरअसल, प्रशांत महासागर में सक्रिय हुआ एल नीनो (El Nino) आगामी महीनों में अपना सबसे भयावह रूप दिखाने जा रहा है। सितंबर तक दुनिया जिस मौसमी संकट को लेकर परेशान थी, वह तो बस एक शुरुआत थी। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस संकट का असली चरम आना अभी बाकी है, जो दिसंबर के महीने में पूरी तरह सामने आ जाएगा।

संयुक्त राष्ट्र के विश्व मौसम संगठन (WMO) के अनुसार, इस साल के अंत में एल नीनो अत्यंत मजबूत स्थिति में पहुंच जाएगा। इसके प्रभाव से दुनिया के कई हिस्सों में जहां एक तरफ विनाशकारी बाढ़ और मूसलाधार बारिश का कहर टूटेगा, वहीं दूसरी ओर कई देशों को भीषण सूखे और रिकॉर्ड तोड़ गर्मी का सामना करना पड़ सकता है। मौसम विभाग के विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार एल नीनो का असर पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा विनाशकारी हो सकता है और इसका असर लंबे समय तक बना रहेगा।

दिसंबर में चरम पर पहुंचेगा संकट का दौर

संयुक्त राष्ट्र की संस्था WMO ने अपनी हालिया चेतावनी में साफ किया है कि वर्तमान में जारी एल नीनो की स्थिति अभी थमी नहीं है। यह आने वाले समय में और अधिक आक्रामक रुख अख्तियार करने वाली है। अक्टूबर से दिसंबर के दौरान यह अपने चरम स्तर पर पहुंच जाएगी, जिसके कारण दुनिया के अधिकांश हिस्सों में तापमान सामान्य से काफी अधिक रहने की आशंका है।

इस बड़े बदलाव के कारण वैश्विक स्तर पर हवाओं और बारिश के सामान्य चक्र में भारी फेरबदल देखने को मिलेगा। जहां कुछ इलाकों में पानी की एक-एक बूंद के लिए हाहाकार मचेगा, वहीं कुछ क्षेत्रों में भारी जलप्रलय जैसी स्थिति बन सकती है। WMO की महासचिव सेलेस्टे साउलो का कहना है कि एल नीनो अब पूरी तरह से स्थापित हो चुका है और लगातार मजबूत हो रहा है। वैज्ञानिकों के पूर्वानुमानों के अनुसार, इसके फरवरी 2027 तक बने रहने की संभावना लगभग 100 प्रतिशत है। यह स्थिति साल 1950 के बाद दर्ज की गई सबसे भीषण एल नीनो घटनाओं में से एक हो सकती है। यह संकट काल फरवरी के बाद भी जारी रहकर 2027 के वसंत ऋतु तक खिंच सकता है।

क्या होता है एल नीनो और कैसे बिगड़ता है मौसम का मिजाज?

एल नीनो एक जटिल प्राकृतिक समुद्री और वायुमंडलीय घटना है, जो सामान्यतः हर दो से सात साल के अंतराल पर दोहराई जाती है। इस चक्र के मुख्य रूप से तीन चरण होते हैं:

  • गर्म चरण (एल नीनो): इसमें समुद्र का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है।
  • सामान्य चरण: इसमें मौसमी स्थितियां सामान्य बनी रहती हैं।
  • ठंडा चरण (ला नीना): इसमें समुद्र का तापमान सामान्य से कम हो जाता है।

इस चक्र के दौरान भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की सतह का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है, जिससे पूरी दुनिया के मौसम का संतुलन बिगड़ जाता है। हाल के महीनों में प्रशांत महासागर के तापमान में बहुत तेजी से बढ़ोतरी देखी गई है। आंकड़ों के अनुसार, अगस्त के महीने में नीनो 3.4 क्षेत्र का तापमान सामान्य से करीब 2.5 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया था। समुद्र के इस बढ़ते तापमान के कारण मानसून कमजोर पड़ता है, जिससे भारत सहित कई एशियाई और अफ्रीकी देशों में बारिश में भारी कमी आती है और सूखे की स्थिति पैदा होती है।

भारत पर मंडराया सूखे और जल संकट का खतरा

भारत में भी एल नीनो का असर साफ तौर पर दिखने लगा है। इस साल देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान सामान्य से करीब 13 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। बारिश की इस भारी कमी के कारण देश के कई राज्यों में कृषि और पेयजल का संकट खड़ा हो गया है।

विशेष रूप से महाराष्ट्र और कर्नाटक के कई हिस्सों में बारिश न होने के कारण सूखा घोषित करना पड़ा है। जलाशयों में पानी का स्तर चिंताजनक रूप से नीचे गिर गया है। हालात को नियंत्रित करने और भविष्य के संकट से निपटने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने कई जिलों में पानी की आपूर्ति में सीधे 10 प्रतिशत की कटौती लागू कर दी है। यदि आगामी महीनों में एल नीनो का असर और तीव्र होता है, तो रबी की फसलों और पीने के पानी की उपलब्धता पर इसका बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

यूरोप और अन्य देशों में भी मचा हाहाकार

एल नीनो का कहर सिर्फ एशिया तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर वैश्विक स्तर पर देखा जा रहा है। महासागरों के गर्म होने के कारण इस साल यूरोप में इतिहास की सबसे गर्म गर्मियां दर्ज की गईं। फ्रांस, स्पेन और ब्रिटेन जैसे देशों में तापमान ने पिछले सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए।

गर्मी का आलम यह था कि यूरोप की जीवनरेखा मानी जाने वाली डेन्यूब, राइन और टेम्स जैसी बड़ी और ऐतिहासिक नदियां पूरी तरह से सूखने के कगार पर पहुंच गईं। कई नदियों में पानी का स्तर इतना कम हो गया कि उनमें केवल नाममात्र का जल प्रवाह बचा। जलवायु वैज्ञानिकों ने आगाह किया है कि आने वाले महीनों में मौसम में और बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। ऐसे में दुनिया भर की सरकारों और आम लोगों को इस प्राकृतिक आपदा का सामना करने के लिए पहले से तैयार रहने की सलाह दी गई है।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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