राजनीति विज्ञान आर्ट्स है या साइंस? जानें अरस्तू द्वारा इसे 'मास्टर साइंस' कहे जाने की वैज्ञानिक वजह करियर 5 घंटे पहले 3
राजनीति विज्ञान में कोई लैब या टेस्ट ट्यूब नहीं होती, फिर भी इसे विज्ञान माना जाता है। समझिए इसके क्रमबद्ध अध्ययन, कारण-प्रभाव संबंध और सामाजिक प्रयोगों से जुड़ी ठोस वैज्ञानिक वजहें।

जब भी विज्ञान शब्द का नाम सामने आता है, आमतौर पर लोगों के मन में प्रयोगशालाएं, टेस्ट ट्यूब, रासायनिक घोल और जटिल गणितीय सूत्र तैरने लगते हैं। यही कारण है कि जब राजनीति विज्ञान को विज्ञान की श्रेणी में गिनाया जाता है, तो बहुत से लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि इसमें भला लैब या केमिकल का क्या काम। चुनाव, सरकारी तंत्र, कानून निर्माण और नेताओं की बयानबाजी को कला, इतिहास या समाजशास्त्र का हिस्सा मान लेना बेहद आम बात है। लेकिन UPPSC PCS जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के इंटरव्यू में हाल ही में शामिल हुए उम्मीदवारों से अक्सर यह सवाल पूछा गया है कि इस विषय के नाम के साथ विज्ञान क्यों जुड़ा है। महान दार्शनिक अरस्तू ने भी राजनीति विज्ञान को 'मास्टर साइंस' का दर्जा दिया था।

1. क्रमबद्ध और व्यवस्थित अध्ययन पद्धतियां

किसी भी विषय को विज्ञान घोषित करने के लिए सबसे प्राथमिक कसौटी उसका व्यवस्थित और क्रमबद्ध अध्ययन होना है। राजनीति विज्ञान इस मानक पर पूरी तरह खरा उतरता है। इस विषय के अंतर्गत राज्य की उत्पत्ति, शासन के ढांचे, कानूनों के निर्माण और नागरिकों के अधिकारों का अध्ययन किसी मनगढ़ंत कहानी की तरह नहीं, बल्कि ऐतिहासिक आंकड़ों और तथ्यों के आधार पर किया जाता है।

इसके अंतर्गत विश्लेषण करने के लिए एक तय प्रक्रिया का पालन होता है। सबसे पहले डेटा एकत्र किया जाता है, फिर उसका वर्गीकरण होता है और आखिर में तर्कसंगत वैज्ञानिक निष्कर्ष निकाले जाते हैं।

2. कार्य और कारण का गहरा संबंध

भौतिक शास्त्र जैसे प्राकृतिक विज्ञानों की ही तरह राजनीति विज्ञान में भी कारण और प्रभाव (Cause and Effect) का बेहद गहरा संबंध देखने को मिलता है। समाज और शासन तंत्र में घटने वाली हर राजनीतिक घटना के पीछे कोई न कोई ठोस कारण जरूर मौजूद होता है।

इसे एक व्यावहारिक उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है। यदि किसी देश में बेरोजगारी और महंगाई बहुत तेजी से बढ़ती है, तो यह स्थिति एक कारण के रूप में उभरती है। इसका सीधा प्रभाव यह देखने को मिलता है कि आम जनता या तो चुनाव में सरकार के खिलाफ मतदान करती है या फिर देश में क्रांति और जनआंदोलन शुरू हो जाता है। राजनीतिक विश्लेषक इसी कारण और प्रभाव के पैटर्न को समझकर यह आकलन करते हैं कि कोई नया कानून या नीति समाज पर कैसा असर डालेगी।

3. समाज ही बनती है सबसे बड़ी प्रयोगशाला

अक्सर लोग सोचते हैं कि राजनीति विज्ञान में लैब या एक्सपेरिमेंट संभव नहीं हैं। हालांकि, सच्चाई यह है कि इस विषय के लिए पूरा समाज ही एक विशाल प्रयोगशाला के रूप में कार्य करता है।

जब भी कोई देश अपनी शासन व्यवस्था में बड़ा बदलाव लाता है, उदाहरण के लिए राजतंत्र को समाप्त करके लोकतंत्र को अपनाना या फिर कोई नया संविधान लागू करना, तो वह वास्तव में एक बड़ा राजनीतिक प्रयोग ही होता है। इसी तरह जब सरकारें कोई नई जनकल्याणकारी योजना या नया टैक्स सिस्टम लागू करती हैं, तो उसके परिणामों का अवलोकन और सुपरविजन किया जाता है, जो किसी वैज्ञानिक प्रयोग के परिणामों को परखने जैसा ही है।

4. आंकड़ों के आधार पर पूर्वानुमान की संभावना

चूंकि राजनीति विज्ञान का मुख्य विषय **मानव स्वभाव** और उसका सामाजिक आचरण है, इसलिए इसमें रसायन विज्ञान की तरह **100 प्रतिशत सटीक भविष्यवाणी** कर पाना संभव नहीं होता। इंसान का स्वभाव और मूड परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहता है, लेकिन इसके बावजूद आंकड़ों के अध्ययन से सटीक रुझानों और पूर्वानुमानों का पता लगाया जा सकता है।

  • चुनावी विश्लेषण: चुनाव के समय आने वाले ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल डेटा और जनमत के आधार पर ही यह पूर्वानुमान लगाते हैं कि किस राजनीतिक दल का पलड़ा भारी रहने वाला है।
  • भविष्य की नीतियां: राजनीतिक विचारक डेटा और ऐतिहासिक रुझानों को देखकर पहले ही यह बताने में सक्षम होते हैं कि किसी देश की विदेश नीति या आर्थिक नीति का आने वाले समय में क्या परिणाम निकलेगा।

5. विशुद्ध प्राकृतिक विज्ञान नहीं, बल्कि एक सामाजिक विज्ञान

इस पूरे विषय को गहराई से समझने के लिए यह अंतर जानना बहुत जरूरी है कि राजनीति विज्ञान को 'सामाजिक विज्ञान' कहा जाता है, न कि 'प्राकृतिक विज्ञान'। प्राकृतिक विज्ञान के नियम पूरी तरह से स्थिर और सार्वभौमिक होते हैं।

उदाहरण के तौर पर गुरुत्वाकर्षण का नियम दुनिया के हर कोने में एक समान काम करता है। इसके विपरीत, राजनीति के नियम अलग-अलग देशों, संस्कृतियों और परिस्थितियों के हिसाब से बदल सकते हैं। यही वजह है कि राजनीति विज्ञान एक अत्यंत गतिशील और निरंतर विकसित होने वाला विज्ञान है, जो वैज्ञानिक सिद्धांतों और व्यवस्थित पद्धतियों पर पूरी तरह आधारित है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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