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2 घंटे पहले
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गांव की दहलीज से IIT तक का सफर
हरियाणा के रेवाड़ी जिले में स्थित एक छोटा सा गांव है धामलावास। इस गांव के बेटे गौरव यादव ने अपनी मेहनत और दृढ़ निश्चय के दम पर वह मुकाम हासिल किया है, जो उनके गांव में अब तक किसी ने नहीं देखा था। गौरव ने न केवल JEE Main और JEE Advanced जैसी कठिन परीक्षाओं को पास किया, बल्कि IIT कानपुर में दाखिला लेकर अपने गांव के पहले आईआईटीयन होने का गौरव भी प्राप्त किया। गौरव की यह कहानी उन सभी छात्रों के लिए प्रेरणा है जो सुविधाओं के अभाव में बड़े सपने देखने से डरते हैं। आज गौरव IIT कानपुर के कैंपस में एक चमकता हुआ चेहरा हैं, लेकिन यहां तक पहुँचने का उनका रास्ता चुनौतियों और अनिश्चितताओं से भरा रहा था।
बहन से मिला प्रेरणा का पहला अंकुर
गौरव को इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा यानी JEE के बारे में तब पता चला जब वे 11वीं कक्षा में पढ़ रहे थे। उन दिनों उनकी बड़ी बहन खुद JEE की तैयारी में जुटी हुई थीं। बहन के संघर्ष और पढ़ाई को देखकर ही गौरव के मन में इस परीक्षा के प्रति उत्सुकता जगी। उन्होंने समझा कि IIT में जाने का रास्ता इसी परीक्षा से होकर गुजरता है। जब उन्हें इस परीक्षा की महत्ता और इसकी भविष्य की संभावनाओं के बारे में समझ आया, तो उन्होंने भी कमर कस ली। 12वीं कक्षा की शुरुआत में ही उन्होंने ऑनलाइन माध्यम से अपनी तैयारी का श्रीगणेश किया।
बिना सीनियर के चुनौतीपूर्ण तैयारी
गौरव के लिए तैयारी का सफर बिल्कुल भी आसान नहीं था। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि धामलावास गांव में उनके आसपास ऐसा कोई सीनियर मौजूद नहीं था, जिसने पहले कभी JEE की परीक्षा दी हो या IIT तक पहुँचा हो। जब किसी विद्यार्थी के पास मार्गदर्शन करने वाला कोई नहीं होता, तो उसे यह तक नहीं पता चलता कि उसकी तैयारी सही दिशा में है या नहीं। गौरव के साथ भी ऐसा ही था; उनके पास न तो कोई ऐसा साथी था जिसके साथ वे जटिल सवालों पर चर्चा कर सकें और न ही कोई ऐसा व्यक्ति जिससे वे परीक्षा की रणनीति को लेकर सलाह ले सकें।
तैयारी के दौरान कई बार उनके मन में यह ख्याल आया कि शायद उन्हें घर छोड़कर किसी शहर में जाकर ऑफलाइन कोचिंग लेनी चाहिए थी। लेकिन, गौरव ने घर पर परिवार के साथ रहकर मिलने वाले भावनात्मक सहयोग और सुख-सुविधाओं को प्राथमिकता दी। परिवार का साथ होने के कारण वे पढ़ाई के तनाव को बेहतर तरीके से झेल सके। हालांकि, अकेले पढ़ाई करने के कारण अक्सर मन में संदेह पैदा होता था, लेकिन उन्होंने ऑनलाइन कोचिंग शिक्षकों के मार्गदर्शन को ही अपना सबसे बड़ा सहारा बनाया।
माता-पिता का अटूट विश्वास और समर्थन
गौरव की सफलता में उनके माता-पिता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनके पिता रेवाड़ी जिला अदालत में एक वकील के रूप में कार्यरत हैं, जबकि उनकी मां एक कुशल गृहिणी हैं। एक ऐसे माहौल में जहां अक्सर करियर को लेकर परिवार का दबाव होता है, गौरव के माता-पिता ने उन्हें पूरी आजादी दी। उन्होंने गौरव पर किसी विशेष पेशे को चुनने का कोई दबाव नहीं डाला और उनके हर निर्णय का समर्थन किया। गौरव मानते हैं कि करियर को लेकर मिली इस स्वतंत्रता ने उन्हें अपने लक्ष्य के प्रति अधिक केंद्रित रहने में मदद की। आज भी जब वह अपने गांव को याद करते हैं, तो उन्हें अपने परिवार और दादी की सबसे अधिक याद आती है, जिन्होंने उनके हर छोटे-बड़े फैसले में उनका उत्साहवर्धन किया था।
सीएससी और एआई को छोड़कर सिविल इंजीनियरिंग का चुनाव
जब गौरव की JEE में सफलता के बाद JoSAA काउंसलिंग की प्रक्रिया शुरू हुई, तो उनके पास देश के बेहतरीन इंजीनियरिंग कॉलेजों में पढ़ाई करने के कई विकल्प थे। उस दौरान कंप्यूटर साइंस (CSE) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी शाखाएं छात्रों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय थीं। हालांकि, गौरव ने भीड़ का हिस्सा न बनते हुए कोर इंजीनियरिंग में अपनी रुचि दिखाई और 'सिविल इंजीनियरिंग' को अपना विषय चुना।
इस चुनाव के पीछे एक बहुत ही व्यावहारिक कारण था। गौरव ने अपने बचपन में गुरुग्राम को एक सामान्य जगह से बड़े मेट्रोपॉलिटन हब में बदलते हुए देखा था। उनके आंखों के सामने खेतों की जगह गगनचुंबी इमारतें खड़ी हुईं, सड़कें बनीं और बड़े पैमाने पर ढांचागत विकास हुआ। यह बदलाव उन्हें बहुत आकर्षित करता था। उन्हें यह विचार बहुत पसंद आया कि एक सिविल इंजीनियर के काम का परिणाम सीधे जमीन पर दिखाई देता है, चाहे वह एक सड़क हो, पुल हो या कोई शानदार इमारत। इसलिए, उनके लिए यह सिर्फ एक ब्रांच का चुनाव नहीं था, बल्कि अपनी रुचि और अपने आसपास के परिवेश से जुड़ी हुई एक स्वाभाविक पसंद थी।
IIT कानपुर की नई और कठिन दुनिया
जुलाई 2023 में गौरव ने IIT कानपुर के कैंपस में कदम रखा। यह उनके जीवन का सबसे बड़ा बदलाव था। एक तरफ परिवार का साथ था और दूसरी तरफ एक बिल्कुल नई और आधुनिक दुनिया। शुरुआती कुछ सप्ताह उनके लिए बेहद कठिन रहे। कैंपस में पढ़ाई की गति बहुत तेज थी और हॉस्टल का जीवन उनके घर के माहौल से पूरी तरह भिन्न था। मेस के खाने से लेकर रहने के तौर-तरीकों तक, हर चीज़ नई थी। लेकिन, समय के साथ उन्होंने इन चुनौतियों को स्वीकार कर लिया और कैंपस के सामाजिक जीवन में घुलने-मिलने लगे।
जिम्मेदारी और प्रेरणा का संगम
वर्तमान में 20 साल के गौरव IIT कानपुर में बीटेक सिविल इंजीनियरिंग के चौथे वर्ष के छात्र हैं। उनकी दिनचर्या काफी व्यस्त रहती है। सुबह 9 बजे से उनकी कक्षाएं और लैब का काम शुरू हो जाता है। दोपहर के बाद का समय वह केवल किताबों तक सीमित नहीं रखते; वे 'स्टूडेंट्स जिमखाना' (Students’ Gymkhana) के अध्यक्ष की बड़ी जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं। इस भूमिका में उन्हें छात्रों की समस्याओं को सुनना, उनके समाधान निकालना और कैंपस में होने वाले कार्यक्रमों का संचालन करना पड़ता है।
शाम का समय वे अपने दोस्तों के साथ कैंपस के हरियाली भरे माहौल में बिताते हैं, जो उन्हें पढ़ाई के तनाव से मुक्त रखता है। गौरव का सबसे नेक काम यह है कि आज वह उन छात्रों के लिए एक मार्गदर्शक बन गए हैं, जो उन्हीं की तरह छोटे गांवों से आते हैं और JEE का सपना देखते हैं। जो कमी उन्होंने अपने समय में महसूस की थी, वे चाहते हैं कि आज के नए छात्र उसे महसूस न करें। गौरव अपनी मेहनत और सफलता के माध्यम से साबित कर चुके हैं कि यदि संकल्प पक्का हो, तो संसाधनों का अभाव कभी भी आपकी मंजिल के आड़े नहीं आ सकता।
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