भारत
10 घंटे पहले
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राज्य का प्रशासनिक बोझ घटाने की तैयारी
सरकारी खजाने पर पड़ रहे दबाव को कम करने और फिजूलखर्ची पर लगाम लगाने के मकसद से हिमाचल प्रदेश सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने घोषणा की है कि राज्य सरकार अब भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी IAS, भारतीय वन सेवा यानी IFS और भारतीय पुलिस सेवा यानी IPS अधिकारियों के पदों की संख्या में कटौती करेगी। इस नीतिगत बदलाव के जरिए सरकार अपनी नौकरशाही को छोटा लेकिन अधिक प्रभावी बनाना चाहती है।
कितनी होगी पदों में कटौती
प्रस्तावित योजना के अनुसार, राज्य में आईएएस अधिकारियों के कैडर को 153 से घटाकर 130 करने का लक्ष्य रखा गया है। इसका मतलब है कि आईएएस अधिकारियों की संख्या में सीधे तौर पर 23 पदों की कमी आएगी। इसी तरह, भारतीय वन सेवा के अधिकारियों की संख्या को 118 से घटाकर 83 करने का फैसला लिया गया है, जो 35 पदों की कटौती है। अधिकारियों के मुताबिक, आईपीएस अधिकारियों के कैडर में कितनी कमी की जाएगी, इसका आंकड़ा अभी तय होना बाकी है।
हमें अधिकारियों की फौज नहीं चाहिए
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का मानना है कि राज्य में जरूरत से ज्यादा अधिकारी तैनात हैं। उन्होंने कहा कि आईएएस अधिकारियों की संख्या को 110 तक ले जाना उनका लक्ष्य है, लेकिन अभी इसे 130 पर लाया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कहा कि हिमाचल प्रदेश को अधिकारियों की एक विशाल फौज की आवश्यकता नहीं है। उन्हें ऐसे अफसरों की जरूरत है जो सरकार की जनहितैषी नीतियों और विकास योजनाओं को जमीनी स्तर पर कुशलतापूर्वक लागू कर सकें। सीएम के अनुसार, इस कदम से सरकारी राजस्व के खर्चों में करीब 100 से 150 करोड़ रुपये की बड़ी बचत होने की उम्मीद है।
केंद्रीय प्रतिनियुक्ति और आगामी कदम
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि कोई अखिल भारतीय सेवा का अधिकारी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति का विकल्प चुनता है, तो उसे तुरंत अनुमति दी जाएगी। फिलहाल राज्य के 20 से ज्यादा आईएएस और 12 से ज्यादा आईपीएस और आईएफएस अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर हैं। सरकार जल्द ही पदों की संख्या घटाने का औपचारिक प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास भेजेगी। इसके साथ ही, केंद्र से यह आग्रह भी किया जाएगा कि राज्य को और अधिक केंद्रीय सेवा अधिकारी आवंटित न किए जाएं। सरकार का मानना है कि एक अधिकारी पर वेतन, महंगाई भत्ता और स्टाफ समेत अन्य सुविधाओं के रूप में सालाना 40 से 50 लाख रुपये का खर्च आता है, जिसे नियंत्रित करना अब जरूरी हो गया है।
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