कुख्यात डकैत जगन गुर्जर का अंत, चंबल की गलियों में कभी खौफ का दूसरा नाम था यह अपराधी राजस्थान 2 महीने पहले 41
चंबल के बीहड़ों में आतंक का पर्याय रहे डकैत जगन गुर्जर की अजमेर जेल में मौत हो गई है, जिसके बाद उसके अपराधों के लंबे दौर की फिर चर्चा शुरू हो गई है।

बीहड़ का वह नाम जिससे कांपते थे लोग

चंबल के दुर्गम इलाकों में एक समय जगन गुर्जर का इतना खौफ था कि उसका नाम भर ही लोगों की धड़कनें बढ़ा देता था। उसका आपराधिक जीवन राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में चर्चा का विषय बना रहा। उसके जीवन का मोड़ एक निजी प्रतिशोध के साथ आया, जिसने उसे कानून से दूर अपराध की अंधेरी दुनिया में धकेल दिया।

बदले की आग और अपराध की शुरुआत

जगन गुर्जर के अपराध की दुनिया में कदम रखने की दास्तान 1994 में शुरू हुई, जब उसने अपने जीजा की हत्या का बदला लेने की कसम खाई। इसके बाद 1999 में मोहन गुर्जर की हत्या के बाद उसने सीधे तौर पर गैंग की पूरी कमान अपने हाथों में ले ली। हत्या, अपहरण और लूट जैसी संगीन वारदातों ने उसे पुलिस की 'मोस्ट वांटेड' सूची में शीर्ष पर खड़ा कर दिया।

बार-बार अपराध की ओर वापसी

जगन गुर्जर का रिकॉर्ड रहा कि उसने अपने पूरे आपराधिक सफर के दौरान कुल तीन बार आत्मसमर्पण किया। हालांकि, हर बार वह किसी न किसी कारण से फिर से जुर्म की दुनिया में वापस लौट आता था। वसुंधरा राजे के धौलपुर महल को धमकी देने का मामला हो या फिर 2019 की बड़ी वारदातें, वह लगातार सुर्खियों में बना रहा। यहां तक कि 2022 में एक विधायक को धमकी देकर उसने फिर से कानून को चुनौती दी थी।

एक खौफनाक अध्याय का समापन

अजमेर की हाई सिक्योरिटी जेल में जगन गुर्जर की मृत्यु के साथ ही चंबल के इतिहास का एक अत्यंत विवादित और खौफनाक अध्याय हमेशा के लिए समाप्त हो गया है। पुलिस और प्रशासन के लिए लंबे समय तक सिरदर्द बने रहे इस डकैत का अंत उसके अपराधों के सफर पर विराम लगा गया है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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